वैदिककालीन सामाजिक चिंतन - Vedic Social Thoughts

 वैदिककालीन सामाजिक चिंतन - Vedic Social Thoughts


वैदिककालीन सामाजिक चिंतन भारतीय सामाजिक चिंतन का आधार है। जो धर्म, दर्शन, आध्यात्मक, कल्पना, आदि पर आधारित था। इस सामाजिक चिंतन से उस समय की सामाजिक व्यवस्था, परिवार, विवाह, परंपरा, रीति-रिवाज, महिलाओं की स्थिति आदि के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। इस काल में सामाजिक व्यवस्था पितृसतात्मक थी समाज की इकाई सयुंक्त परिवार था। इस काल में वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति हो गयी थी। जो जन्म पर आधारित न होकर कर्म पर आधारित थी। विवाह संस्कार प्रचलित था जिसके अन्तर्गत अनुलोम विवाह एवं प्रतिलोम विवाह का वर्णन मिलता है। इस काल में महिलाओ की स्थिति अच्छी थी।

जिन्हें शैक्षिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक कार्यों में प्रतिभाग की स्वतंत्रता थी। वैदिककालीन ग्रंथों के बाद रामायण, महाभारत, पुराण, और मनुस्मृति जैसे ग्रंथों का विकास हुआ जिसमें समकालीन सामाजिक व्यवस्थाओं एवं संस्थाओं के विवरण के साथ-साथ वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, कर्म व्यवस्था, धर्म, रीति-रिवाज, परंपरा, विवाह, आदि का विस्तृत वर्णन मिलता है। महाभारत में वर्णों से जातियों की उत्पत्ति के संबंध में बताया गया है। वर्णों में अनुलोम विवाह के प्रचलन में आ जाने से उत्पन्न हुई संतान को माता-पिता में से किसी का भी वर्ण नही मिल सकता था इसलिए ऐसी संतानों को नयी जातियों में रखा गया।


पुराण - पुराण हिंदू धर्म के प्राचीन ग्रंथ है। जिसमें सामाजिक व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था, कर्मकांड, रीति-रिवाज, परंपराएं, आदि का विस्तृत उल्लेख मिलता है। पुराण का शाब्दिक अर्थ है प्राचीन या पुरानी कथा पुराणो की संख्या 18 है।