प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा (1818-1836) - Elementary education-initiation (1818-1836)

प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा (1818-1836) - Elementary education-initiation (1818-1836)


कार्ल मार्क्स जातीय रूप से यहूदी थे, पर उनके दादा एक डच रब्बी थे, जबकि उनकी पैतृक रेखा ने 1723 से ट्रायर्स के खरगोशों की आपूर्ति की थी. उनके दादा मीयर हेलवी मार्क्स ने एक भूमिका निभाई थी। उनके पिता हर्शेल के नाम से जाने वाले बच्चे रूप में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्राप्त करने के लिए पहली पंक्ति में थे और वह एक वकील बन गए और अपेक्षाकृत अमीर और मध्यम वर्ग के अस्तित्व में रहते थे, उनके परिवार के पास कई मोसेल अंगूर के मालिक थे अपने बेटे के जन्म से पहले और राइनलैंड में यहूदी मुक्ति के निरसन के बाद हर्शेल यहूदी धर्म से परिवर्तित होकर एशिया राज्य के इवेंजेलिकल चर्च में शमिल हो गए जो विनिश हर्शेल पर हेनरिक के जर्मन उपनाम को लेकर आए। जर्मन रोमांटिक कवि हेनरिक हेन के एक बार हटाए जाने पर मार्क्स तीसरा चचेरा भाई था, जो राइनलैंड में जर्मन यहूदी परिवार में पैदा हुआ था, जिसके साथ वह बाद के जीवन में लगातार संवाददाता बन गया। हेनरिक मार्क्स गैर धार्मिक प्रबुद्ध व्यक्ति थे. जो दार्शनिक इमानुअल कांत और वोल्टायर के विचारों में रुचि रखते थे। इसके पश्चात् सन् 1837 से मार्क्स ने बर्लिन विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करना आरंभ कर दिया। सन् 1841 में उन्होंने जेनेवा विश्वविद्यालय से पी-एच. डी. की उपाधि ग्रहण की।

अपनी विश्वविद्यालय शिक्षा के दौरान मार्क्स पर हीगेल के विचारों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा। इसका कारण यह था कि जिस समय मार्क्स उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहें थे उस समय विश्वविद्यालय में हीगेल के समर्थकों का गुट बहुत प्रभावशाली था। हीगेल के सार्थक दर्शन तथा तर्कपूर्ण विचारों ने मार्क्स को जल्दी ही अपनी ओर आकर्षित कर लिया।


आरंभ में मार्क्स का विचार किसी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में कार्य करने का था लेकिन यह अवसर प्राप्त न हो सकने के कारण मार्क्स ने सन् 1842 में राइन प्रांत (Rhine Province) की एक पत्रिका में संपादक के रूप में कार्य करना आरंभ कर दिया। इस पत्रिका के माध्यम से मार्क्स ने तत्कालीन जर्मनी में पाए जाने वाले राजनैतिक और धार्मिक उत्पीड़न के विरूद्ध क्रांतिकारी विचारक के रूप में मान्यता अवश्य मिलने लगी लेकिन सन् 1843 में उन्हें इस पत्रिका के संपादक पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसी वर्ष मार्क्स जर्मनी को छोड़कर पेरिस चले गए। यहीं सन् 1844 में उनकी भेंट फेडरिक एंगिल्स ( Friedrich Engels) से हुई। मार्क्स और एंगिल्स का यह वह ऐतिहासिक और बौद्धिक मिलन था जिसने संसार के सामने चिंतन के नए आयाम प्रस्तुत कर दिए।


कार्ल मार्क्स अपने प्रारंभिक जीवन से ही एक क्रांतिकारी विचारक, दार्शनिक लेखक थे। अपनी रचनाओं के द्वारा उन्होंने न केवल इतिहास को एक नया मोड़ दे दिया बल्कि एक ऐसे दृष्टिकोण को भी विकसित किया जिसके द्वारा समाज की संरचना तथा विभन्न वर्गों के संबंधों को नए सिरे से समझा जा सके। अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण उन्हें एक राज्य से दूसरे राज्य में भटकना पड़ा तथा अपने वैयक्तिक तथा पारिवारिक सुखों का त्याग करना पड़ा। असीम निर्धनता के बाद भी मार्क्स अपने उन विचारों को सैद्धांतिक रूप देने में लगे रहे जो उनके व्यावहारिक अनुभवों तथा जीवन के संघर्षो का परिणाम थे। यही कारण है कि मार्क्स के चिंतन में सैद्धांतिकता का पक्ष उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि समाज के पुनर्गठन की एक व्यवस्थित योजना का मार्क्स अपने जीवन पर्यंत कुछ न कुछ लिखते रहें। यह सच है कि पुस्तकों के रूप में उन्होंने अपने विचारों को बहुत कम व्यवस्थित करने का प्रयत्न किया लेकिन उन्होंने जो लेख, तथा पत्र लिखे वे आज भी मार्क्स के चिंतन के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। मार्क्स के नाम से जो पुस्तकें प्रकाशित हुई उन्हें पांडुलिपि का रूप देने में एंगेल्स ने ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मार्क्स की रचनाओं में जो कृतियाँ अधिक महत्त्वपूर्ण है, उनके सार तत्व को इस प्रकार समझा जा सकता है।