स्वतंत्रता पश्चात भारतीय शिक्षा व्यवस्था (1947 के पश्चात) - Indian education system after independence (after 1947)
स्वतंत्रता पश्चात भारतीय शिक्षा व्यवस्था (1947 के पश्चात) - Indian education system after independence (after 1947)
स्वतंत्रता के उपरान्त भारतीय शिक्षा के विकास में नये युग की शुरूआत हुई। भारतीय संविधान में शिक्षा के महत्व को भली भांति स्वीकार किया तथा देश की आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुरूप शिक्षा सम्बन्धी उत्तरदायित्वों को केन्द्र एवं राज्यों के मध्य अनुकूल ढंग से विभाजित कर दिया जिससे केन्द्र एवं राज्य अपने-अपने स्तर पर शिक्षा का नियोजन करके शैक्षिक विकास को सुनिश्चित कर सकें। स्वतंत्रता के पश्चात एक प्रमुख समस्या शिक्षा प्रणाली का पुनर्गठन तथा शिक्षा के अवसरों का विस्तार करना था। सभी को निःशुल्क शिक्षा देना अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा, निरक्षरता, माध्यमिक शिक्षा में गुणात्मक सुधार, विज्ञान तकनीकी शिक्षा का विस्तार, लड़कियो, पिछड़ो, अ.जा/अ.जा.जा. व अल्पसंख्यकों के शैक्षिक विकास को सुनिश्चित करना तथा मातृभाषा, प्रादेशिक भाषा व राष्ट्रभाषा के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने जैसी अनेक समस्यायें भारत के शिक्षाविदों के समाने थी।
इन सब समस्याओं को हल करने के लिए भारत सरकार ने समय समय पर कई आयोग एवं समितियों का गठन किया जिनकी सिफारशों पर अमल करके भारतीय शिक्षा व्यवस्था में निरन्तर सुधार किया जा रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात् सन 1948 में डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का सन् 1952 में डॉ. लक्ष्मण स्वामी मुदलियर की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा का आयोग तथा सन् 1964 में डॉ. दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग का गठन विभिन्न स्तरों की शिक्षा समस्याओं का अध्ययन करने तथा उनका समाधान निकालने के लिए किया. इसी प्रकार केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने कई समितियों का गठन भी किया। सन 1968 तथा सन् 1986 में घोषित नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति तथा सन् 1979 में तैयार किया गया शिक्षा का मसौदा भी भारतीय शिक्षा के विकास के कुछ दिलचप्स मोड़ है। सन् 1986 व सन् 1992 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए कार्यान्वयन कार्यक्रम भी तैयार किये गये। सन् 1992 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कुछ संशोधन भी किये गये। सन् 2018-19 में नई शिक्षा नीति आने की सम्भावना है जिनकी तैयारी चल रही है।
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