भावात्मकता बनाम भावात्मक तटस्थता का संबंध - affectiveness vs affective neutrality

भावात्मकता बनाम भावात्मक तटस्थता का संबंध - affectiveness vs affective neutrality


भूमिका-निष्पादन में होने वाली दुविधा से है जहाँ किसी विशिष्ट स्थिति के विषय में मूल्यांकन की अपेक्षा होती है। संवेगात्मक दृष्टि से या कुछ हद तक संवेगात्मक तटस्थता से स्थिति का किस सीमा तक मूल्यांकन किया जाए? समाज में जिन अधिकांश भूमिकाओं को करने की हमसे अपेक्षा की जाती है। इनमें चुनाव की हमारे सामने कठिन समस्या पैदा होती है। उदाहरण के लिए आप बच्चे और माँ के संबंधों को लें। इसमें अत्यधिक भावात्मक उन्मुखता होती है, लेकिन इसके साथ अनुशासन भी जरूरी है। इस प्रकार बहुत से अवसरों पर अपने बच्चे के समाजीकरण के संदर्भ में माँ को भावात्मक तटस्थता की भूमिका निभानी पड़ती है. लेकिन माँ और बच्चे के संबंध में अनिवार्य रूप में भावात्मकता भूमिका प्रधान है। इसकी तुलना में डॉक्टर और रोगी के संबंधों में भावात्मक तटस्थता दिखाई देती है। इसमें डॉक्टर की भूमिका की विशेषता है। सही डॉक्टरी उपचार के लिए भावात्मक तटस्थता आवश्यक है। यह बात विशेष रूप से वहाँ और भी जरूरी है। जहाँ शल्य क्रिया (चीर-फाड़) की जरूरत होती है. परंतु पारसन्स के अनुसार भूमिका निष्पादन की सभी स्थितियों में चुनाव की दुविधा और इसकी अभिव्यक्ति या वचनबद्धता की मात्रा रहती है।