पितृसत्ता एक विश्लेषण - an analysis of patriarchy
पितृसत्ता एक विश्लेषण - an analysis of patriarchy
संपूर्ण विश्व में स्त्रीवादी आंदोलन ने एक नई सोच विकसित की जो आधुनिक दुनिया में स्त्री के अस्तित्व को लेकर तथा विकास में उसकी भूमिका को लेकर विचार विमर्श कर रही हैं। इस संदर्भ में 'सिल्विया वेबली' नामक स्त्रीवादी चिंतक ने 'थ्योराइजिंग पैट्री आरकी' नामक ग्रंथ के अंतर्गत व्याख्या करते हुए सामाजिक संरचना और व्यवहार के ऊपर 'पितृसत्ता' की व्याख्या की है। उनके अनुसार पितृसत्ता के जरिए की समस्याओं को एक खास समूह के अंतर्गत पहचाना जाने लगा है। इसे सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का पर वर्चस्व रहता है तथा वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं। पितृसत्ता के ढाँचे को देखना और समझना इसलिए भी आवश्यक है कि और पुरुष के बीच शक्ति असंतुलन के लिए वैज्ञानिकों ने जैविक कारण माने हैं। लेकिन अब यह धारणा भी निरर्थक साबित हो रही है। पुरुष की पहचान सिर्फ लिंग भेद के कारण ही नहीं है। यह अन्य कारणों से भी अलग-अलग होती है लिंग भेद की स्थिति पितृसत्ता के ढाँचे का एक हिस्सा है। गर्डालर्नर' नामक स्त्रीवादी चिंतक के अनुसार- ‘‘परिवार में स्त्रियों तथा बच्चों पर पुरुषों के वर्चस्व की अभिव्यक्ति पुरुषों के सामाजिक एकाधिकार का द्योतक है
इसका अभिप्राय है कि समाज की सभी महत्त्वपूर्ण संस्थाओं पर पुरुषों का नियंत्रण है और स्त्रियों की पहुँच वहाँ तक नहीं है। यद्यपि स्त्रियां सामाजिक विकास की प्रक्रिया में पुरुषों से कमतर नहीं हैं। वे उन सभी साधनों का उपयोग सहजता से करती हैं, जिन्हें पुरुषों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। फिर पितृसत्तात्मक ढाँचे में कैसे पुरुषों को स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ बताया जाता है तथा स्त्रियों को पुरुषों की संपत्ति के रूप में देखा जाता है?
पितृसत्तात्मक ढाँचे का विकास एक निश्चित समय में नहीं हुआ है। इतिहास में यदि हम देखें तो पुरुषों की विजय ने समाज पर एकाधिकार का जो दावा किया, वही कालांतर में पितृसत्ता का रूप बनता चला गई। लेकिन यह अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग स्थितियों में भिन्न तरीकों से हुआ है। जैसे- शहरी क्षेत्रों में पितृसत्ता का ढाँचा दूसरे तरह का था और आदिवासी क्षेत्रों में पितृसत्तात्मक व्यवस्था सबसे अलग थी।
स्त्रीवादी लेखिका ‘उमा चक्रवर्ती के अनुसार पितृसत्ता वर्ग, जाति, राज्य तथा विचारधारा के बीच का संबंध के स्थान, स्थितियों और भौगोलिक कारणों से भिन्न-भिन्न रहा है। इसलिए इतिहास में पितृसत्ता संबंधी उल्लेख तो मिलते हैं पर स्त्रियों के संदर्भ में इतिहास मौन रहता है। समाज में की स्थिति पुरुष के एकाधिकार में अस्तित्वहीन बना दी गई है। संतान उत्पत्ति के अतिरिक्त कहीं भी उसका वज़ूद नहीं है। पुरुषों ने संतान के नाम के साथ पिता का नाम तो जोड़ा पर स्त्रियों का नाम कहीं भी नहीं जोड़ा है। यहाँ तक कि परिवार व पति के साथ भी नहीं। मेगा हम्म' नामक स्त्रीवादी चिंतक ने पितृसत्ता के संदर्भ में लिखा है कि - यह एक पुरुषतंत्र है जो को सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक संस्थाओं के द्वारा गुलाम बनाकर रखता है। वे आगे लिखती हैं कि पिता सत्ता को नियंत्रित करता है। जबकि पिता तथा पति परिवार में पत्नी और बच्चों को नियंत्रण में रखते हैं। अतः पितृसत्ता का अर्थ समाज में पुरुष शक्ति के वर्चस्व से है। उमा चक्रवर्ती' कहती हैं कि- “पितृसत्ता व्यवस्था में जीवन के जिन पहलुओं पर पुरुष का नियंत्रण रहता है, वह सिर्फ उसकी प्रजनन क्रिया ही है। पितृसत्तात्मक सोच के अंतर्गत स्त्रियों को वस्तु के रूप में देखा जाता है।"
पितृसत्ता का जन्म कैसे हुआ? किस तरह से यह विकसित होकर लैंगिक भेद का रूप लेती गई?
कैसे यहाँ स्त्रियों को जाति के रूप में देखने की प्रवृत्ति बनी? यह विचारणीय विषय है। प्रमुख स्त्रीवादी चिंतक 'एन्ड्र विन्सेट' ने इसका प्रमुख कारण इतिहास लेखन में पुरुषवादी मानसिकता का होना बताया है। इतिहास में स्त्रियों को धार्मिक नियमों की किले बंदी में दबाकर रखा गई और उनकी पहचान को उपेक्षित किया गई। इतिहास स्वयं पितृसत्तात्मक ढाँचे का एक हिस्सा है। इसलिए संभवत: वह की स्थिति के प्रति उदासीन रहा है। सभी स्त्रीवादी चिंतक इस बात से एकमत हैं कि स्त्रियों के दमन और शोषण का कारण पितृसत्ता का ढाँचा है। वे इसे पुरुषों द्वारा समाज में स्त्रियों के लिए बनाई गई क़ानून व्यवस्था, रीतियाँ, शिक्षा, धर्म के रूप में देखती हैं। पितृसत्ता को वे स्त्रियों को नियंत्रित करने एवं उन पर शासन करने की व्यवस्था बताती हैं। इस रूप में उनका दृष्टिकोण कई बार आंदोलनों के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है। सभी स्त्रीवादी चिंतक स्त्रियों के स्वतंत्रता, समानता की पक्षघर हैं तथा पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों के प्रति विकृत नज़रिए का विरोध करती हैं।
उदारवादी स्त्रीवादियों ने स्त्रियों को समानता का अधिकार दिलाने के लिए क़ानूनी सुधारों की बात की।
स्त्रियों की शिक्षा, प्रशिक्षण तथा जीविकोपार्जन के लिए पुरुषों के समान अधिकार की वकालत की है। स्त्रियों को रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराने तथा उन्हें स्वावलंबी बनाने के लिए व्यवस्था में मौलिक परिवर्तन को ज़रूरी समझा। इसके विपरीत समाजवादी स्त्रीवादी चिंतकों ने स्त्रियों को संपत्ति में हक दिलाने, उनके यौन उत्पीड़न पर कठोर सजा का प्रावधान रखने के लिए सत्ता पर दबाव बनाया। स्त्रियों को विवाह संस्था के माध्यम से गुलाम बनाकर रखने की प्रवृत्ति को बलात्कार की संज्ञा दी। स्त्रियों को मुक्ति दिलाने के लिए राजनैतिक लड़ाई लड़ने का प्रस्ताव दिया। समाजवादी स्त्रीवादियों ने परंपरागत मान्यताओं का खंडन किया तथा उसके महिमा मंडन की प्रवृत्ति को पितृसत्तात्मक ढाँचे का हथियार बताया। सन 1960 के लगभग स्त्रियों ने पुरुषों से अलग दिखने का निर्णय लिया। पूरे विश्व में स्त्रियों ने विवाह संस्था का विरोध किया।
‘सुलास्मिथ पफायर स्टोन' ने 'द डायलेक्टिक्स ऑफ सेक्स में इसका जिक्र करते हुए कहा कि "स्त्रियों को समाज में सेक्स सिंबल के रूप में देखा जाता रहा है।
" वे कहती हैं कि स्त्री पैदा नहीं होती है, बल्कि उसको पितृसत्ता द्वारा निर्मित किया जाता है। पुरुषों को प्रकाशमय, सकारात्मक प्रभुत्वशाली, वस्तुनिष्ठ, मज़बूत दिखाया जाता है। वहीं स्त्रियों को अंधकारमय, भावुक, रहस्यमय गैर-ज़िम्मेदार, झगड़ालू और दुष्ट दिखाया जाता है। जबकि पुरुषों के अकर्मण्यता, दिखावा, आत्मकल्याण जैसे स्वभावों को नहीं दिखाया जाता है।
पितृसत्ता का ढाँचा इतना दृढ़ और गहराई तक अपनी जड़े जमा चुका है कि बिना संघर्ष और आमूलचूल, फेर बदल के इसको समाप्त कर पाना असंभव है। यहाँ हम पितृसत्ता के संबंध में विभिन्न विचारधाराओं से संबंधित स्त्रीवादी चिंतकों के विचार जानने की कोशिश करेंगे-
1) उदारवादी स्त्रीवादी - 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में इस तरह के चिंतन की परंपरा का उन्नयन हुआ।
जेंडर पर आधारित भेद, परिवार तथा समाज में स्त्रियों की दोयम दर्जे की स्थिति को तर्क संगत ठहराने वाली धारणाएँ स्त्रीवाद की देन थीं। यह विचारधारा स्त्रियों की समानता, क़ानूनी सुधार की माँग, समाज में विकास के समान अवसर की माँग, आदि से जुड़ी हुई थी। 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में पश्चिमी जगत में विज्ञान की प्रगति के साथ, नए-नए बदलाव होने लगे थे। इस काल में सामाजिक आर्थिक स्थितियों ने विस्थापन को भी जन्म दिया। अमेरिका और फ्रांस में औद्योगीकरण तथा शहरीकरण के कारण नई संरचना जन्म लेने लगी थी। तब पुरुषों के समान श्रम करने के बावज़ूद स्त्रियों को समान वेतन और सम्मान का दर्जा नहीं मिलता था। आजादी, समानता और न्याय संबंधी विचार पुरुषों तक ही सीमित थे। इसका स्त्रियों के उत्थान से कोई लेना देना नहीं था। उस समय 'जॉन स्टुअर्ट मिल और जेरेमी बेंथम' जैसे उदारवादी चिंतकों ने स्त्रियों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई। उन्होंने कहा कि मानव जाति का यह आधा हिस्सा नैतिक तौर पर पुरुषों के समान है। उन्होंने परिवार के कार्य और पारंपरिक प्रणालियों पर भी सवाल उठाए। 18वीं शताब्दी में स्त्रियों के ऊपर कई लेख लिखे गए। सभी लेखों में स्त्रियों की स्वतंत्रता, समानता, अधिकार तथा पितृसत्ता से मुक्ति की बात की गई थी। मेरी वोल्सटोन क्राफ्ट ने सन 1792 में लंदन में स्त्रियों के अधिकार के लिए जोरदार ढंग से आवाज उठाई। उन्होंने स्त्रियों पर आरोपित अयोग्यता का खंडन किया और इसे पुरुषवादी मानसिकता बताया ।
शुरुआती उदारवादी स्त्रीवादियों के विचार आगे की स्त्रीवादियों के विश्लेषण का आधार बने। पुरुषों के लिए हासिल अधिकार तथा विशेषधिकार के दायरे में स्त्रियों के लिए समानता के अवसर की तलाश तथा सुधारवादी दृष्टिकोणों के कारण आगे के स्त्रीवादी चिंतक इसकी आलोचना भी करते रहे। यद्यपि अपने युग में ये स्त्रीवादी विचार उग्र कहे जाते थे। सन 50-60 के दशक में उदारवादी स्त्रीवादी चिंतन काफी लोकप्रिय रहा। उन्होंने व्यक्तिगत अधिकारों, जो स्त्रियों से जुड़े हुए थे, उन्हें विशेष महत्त्व देना शुरू किया। पितृसत्ता के अंदर स्त्री और पुरुष के खेमे बंदी का भी इन्होंने विरोध किया। उदारवादी स्त्रीवादी चिंतक स्त्रियों को उत्पीड़ित करने वाली व्यवस्था से स्वतंत्र कराने के लिए तथा लैंगिक भेदभाव पर आधारित कानूनों और नियमों को हटाने की भी बात करते हैं, ताकि स्त्रियां पुरुषों के साथ समान रूप से प्रतिस्पर्धा कर सकें। उदारवादियों का यह भी कहना है कि अतीत में स्त्रियों के साथ जितने भी अन्याय हुए हैं। उन सभी का प्रतिकार होना चाहिए और पितृसत्तात्मक विचारधारा को सीधे चुनौती देना चाहिए।
आलोचना - उदारवादी स्त्रीवादी पितृसत्ता के खिलाफ केवल वैधानिक पहलुओं पर ही केंद्रित होकर रह गए।
इन्होंने वैचारिक दृष्टिकोण को प्रचारित करने में सुधारवादी एवं कल्याणकारी विचारों का सहारा लिया। परिणामतः राजनीति एवं रोज़गार की दुनिया में स्त्रियां उग्ररूप में न आ सकीं। सार्वजनिक रूप से कुछ सुविधाओं को प्राप्त करने की वकालत करने के कारण चिंतकों में इन आंदोलनों को समझौतावादी विचारधारा के रूप में समझा। अपनी कमज़ोरियाँ के कारण वे लैंगिक उत्पीड़न, श्रम के विभाजन एवं आर्थिक वर्गीय ढाँचे में स्त्रियों की स्थिति को अच्छी तरह नहीं समझा सके।
2) मार्क्सवादी स्त्रीवादी- मार्क्सवादी स्त्रीवाद का उदय मार्क्स के विचारों के साथ-साथ दिखाई देता है स्पष्ट तौर पर मार्क्स ने स्त्रीवाद की अलग से कहीं वकालत नहीं की है। वे स्त्री संबंधी सुधारवादी आंदोलनों को पूँजीवादी व्यवस्था के छलावे के रूप में देखते हैं। स्त्री के प्रति असमानता के भावबोध को वे वर्गीय अवधारणा में शोषण और अलगाव की प्रक्रिया में देखते हैं। जब मार्क्स वर्ग-संघर्ष की स्थिति का विश्लेषण करते हैं तब मार्क्सवादियों को समाज की वर्गीय अवधारणा में स्त्री की वास्तविक स्थिति का एहसास हुआ। वे पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के उत्पीड़न को मार्क्स की अवधारणा के अनुरूप समझने का प्रयास करते हैं।
सन 1884 में एंगेल्स की पुस्तक परिवार निजी, संपत्ति तथा राज्य की उत्पत्ति" में एंगेल्स ने स्त्रियों की उत्पीड़न की समस्या को बेहतर ढंग से समझाने की कोशिश की है। स्त्रियों के शोषण को एंजेल्स ने इतिहास के माध्यम से समझाने का प्रयत्न किया है। वे कहते है कि लोग जिन सामाजिक संस्थाओं के तहत जीते हैं वे दोनों प्रकार के उत्पादनों से जुड़ी हैं, जिससे एक तरफ श्रम के विकास की अवस्था है, तो दूसरी तरफ परिवार के विकास की अवस्था है। श्रम का विकास जितना कम होगा और उसके उत्पादन की मात्रा जितनी सीमित होगी, वहाँ संपत्ति भी सीमित होगी और सामाजिक प्रणालियाँ लिंग यौन संबंधों के हिसाब से निर्धारित होती दिखेंगी।"
मार्क्स के अनुसार प्रारंभिक अवस्था में स्त्रियां घरों के अंदर काम करती थीं। पुरुष घर के बाहर कार्यों में लगे रहते थे। पुरुषों का कार्य अधिक होने से उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई। इसी तरह पितृसत्तात्मक ढाँचे का विकास हुआ। एंगेल्स ने कहा कि स्त्रीवादियों को स्त्री की मुक्ति का प्रयास घर के बाहर निकलने के लिए करना होगा। घर के बाहर कार्य करते हुए स्त्रियां जब आर्थिक रूप से पुरुषों के समकक्ष आएगा तो उनका उत्पीड़न कम होगा और पित्तृसत्ता भी कमज़ोर पड़ती चली जाएगी।
मार्क्स का अतिरिक्त पूँजी का सिद्धांत स्त्रियों के शोषण से भी जोड़कर देखा जाने लगा। पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष को घर के बाहर अपने श्रम का पूरा मूल्य मिल जाता है पर घर के अंदर स्त्रियां जो कार्य करती हैं वह बिना पारिश्रमिक के होता है। इस तरह वे घर के अंदर पुनरुत्पादन के बावज़ूद शोषण का शिकार होती हैं। पितृसत्तात्मक समाज का ढाँचा ऐसा है कि स्त्रियां विवाह के पश्चात गृहस्थी के कार्य को बेगारी की तरह करती हैं। साथ ही पुरुष की यौन तुष्टि भी करती हैं। पितृसत्ता में इस सामाजिक व्यभिचार को मान्यता दी गई है। इसमें स्त्री के विरोध की कहीं गुंजाइश नहीं है। स्त्री को अपनी सेवाएँ निःस्वार्थ भाव से परिवार में देना ही है। इसे मर्यादा कहा गई है। यहाँ स्त्री की आकांक्षा, इच्छा, स्वतंत्रता एवं स्वावलंबन को उच्छश्रृंखलता का संबोधन दिया जाता है।
आलोचना - मार्क्सवादी स्त्रीवादी चिंतकों की यह कमज़ोरी थी कि वे स्त्रियों के शोषण का मुख्य कारण आर्थिक मानते हैं तथा समाज की वर्गीय संरचना में स्त्रियों को सर्वहारा वर्ग के समकक्ष रख कर देखते हैं, जबकि पितृसत्तात्मकता के पीछे आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक सभी कारण विद्यमान थे।
इसलिए किसी एक कारण को आधार मानकर स्त्री शोषण को व्याख्या करने से निश्चित निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सकता है।
3) समाजवादी स्त्रीवाद - समाजवादी स्त्रीवादी चिंतकों ने समाज की वर्गीय संरचना और स्त्रियों के शोषण को एक-दूसरे से जोड़कर देखा। उनके अनुसार विश्व के किसी भी समाज में पुरुषों को इसलिए विशेष महत्त्व मिलता है कि वे बाहरी दुनिया के संपर्क में रहकर व्यापार और वस्तुओं के उत्पादन में सहयोग करते हैं। जबकि घरेलू क्षेत्र में जहाँ स्त्रियों की गतिविधि बाहरी दुनिया के संपर्क में नहीं होती है वहाँ वे उत्पाद और व्यापार की प्रक्रिया से नहीं जुड़ पाती है, इसलिए वहाँ इनका महत्व कम हो जाता है। अतः पुरुषों का स्त्रियों पर आर्थिक रूप से समृद्ध होने के कारण नियंत्रण बना रहता है।
समाजवादी स्त्रीवादी चिंतक रेडिकल स्त्रीवादियों की भांति पितृसत्ता और पूँजीवाद को चुनौती देते हैं। वे वर्ग, नस्ल, नृजातीयता एवं धर्म के आधार पर पुरुष और स्त्रियों के बीच एक विभाजन रेखा भी मानते हैं।
समाजवादी स्त्रीवादी चिंतक स्त्रियों के उत्पीड़न की समाप्ति के लिए समाज में वर्ग एवं जेंडर की स्थिति को समाप्त करने की भी बात करते हैं। समाजवादी स्त्रीवादी लेनिन के उस प्रस्ताव की भी आलोचना करते हैं जिसमें वर्ग की अवधारणा के अंतर्गत ही स्त्री विमर्श की बात की जाती है। क्लारा जेटकिन ने जब वर्ग की बजाए लैंगिक और पारिवारिक मुद्दों पर स्त्री विमर्श की बात उठाई तब लेनिन ने इसका विरोध किया, क्योंकि यह वर्गीय अवधारणा के विरूद्ध था। यद्यपि मार्क्सवादी स्त्रीवादी श्रम के सिद्धांत के अनुसार यह मानते हैं कि - परिवार के अंदर स्त्री द्वारा किए गए कार्य का भी मूल्य होना चाहिए।' परिवार संस्था में राज्य अथवा अन्य संस्थाएँ पारिश्रमिक के लिए हस्तक्षेप करें। यद्यपि इस बहस में मार्क्सवादी स्त्रीवादी भी एकमत नहीं रहे। 'हर्ट मैन' ने मार्क्सवादी स्त्रीवाद की आलोचना करते हुए कहा कि स्त्रियां गृहस्थ जीवन में पुरुषों के लिए काम करती हैं या पूँजीवाद के लिए, यह कोई विवाद का विषय नहीं है। इसलिए स्त्रीवादी चिंतन के अंतर्गत हमें पितृसत्तात्मक समाज में लैंगिक समस्या को समझना चाहिए। 'हर्टमैन' ने पितृसत्ता को भौतिकवादी दृष्टिकोण से विश्लेषित किया है। इसका आधार स्त्रियों के श्रमशक्ति एवं यौनिकता आदि के ऊपर पुरुषों के नियंत्रण से संबंधित है।
भारत में मार्क्सवादी स्त्रीवादी चिंतकों ने यद्यपि स्त्रियों के उत्पीड़न को वर्ग संघर्ष की स्थिति में देखा है। लेकिन समाजवादी चिंतक इसे घर में काम करने वाली स्त्रियों के श्रम के शोषण के रूप में देखते हैं। वे पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध गृहस्थ जीवन में ही संघर्ष करने को कहते हैं। इन्होंने एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण के माध्यम से स्त्रियों के कामकाज के अवमूल्यन को दर्शाया। मारिया मिन्स' ने भारत में एक सर्वे के माध्यम से यह दिखाया कि किस तरह वैश्विक बाज़ार में लेस बनाने के भारतीय स्त्रियों के काम की यह कहकर कम कीमत लगाई गई कि यह समय बिताने के लिए किया गई कार्य है।" जब कि ठेकेदार बाज़ार में इसे अत्याधिक कीमत पर बेचता है और स्त्रियों को मामूली मज़दूरी में ही संतोष करना पड़ता है। चूँकि भारत में स्त्रियां असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं। अतः उनके कार्य का कभी भी उचित मूल्यांकन नहीं किया जाता है। समाजवादी विचारक स्त्रियों के शोषण और उत्पीड़न को समाज की प्रथम इकाई परिवार से मानते है और परिवार पितृसत्तात्मक व्यवस्था की मज़बूत इकाई है। इसलिए स्त्रियों के अधिकारों के लिए पितृसत्तात्मक व्यवस्था को खत्म करने पर जोर दिया जाता है।
आलोचना - यह समझना आवश्यक है कि स्त्रियों के शोषण का प्रारूप क्या-क्या है?
वह घर के भीतर जिस रूप में है क्या उसी रूप में घर के बाहर भी है। समाजवादी चिंतक यहाँ भ्रम की स्थिति पैदा करते हैं। घर के बाहर स्त्रियों का शोषण व्यापक स्तर पर है। समाजवादी चिंतक उसकी समाप्ति का विचार गृहस्थ जीवन के शोषण की समाप्ति से जोड़कर देखते हैं। पितृसत्ता घर और घर के बाहर दोनों स्थानों पर अपने वज़ूद में है। अतः संघर्ष दोनों जगह होना ज़रूरी है। समाजवादी चिंतक स्त्री के शोषण की एक पक्षीय व्याख्या करते हैं, जबकि शोषण बहुपक्षीय रहा है।
4) रेडिकल स्त्रीवाद इस विचारधारा के अंतर्गत समाज में आमूल चूल परिवर्तन की बात कही जाती है सन 60 के दशक में यह विचारधारा स्त्रीवाद की एक नई लहर के रूप में विकसित हुई। आस्ट्रेलिया और यूरोप में स्त्री उत्पीड़न के खिलाफ चल रहे आंदोलनों ने इस विचारधारा को नया आयाम दिया। सन 1967 में अमेरिका में प्रथम रेडिकल स्त्रीवादी संगठन अस्तित्व में आया। यह वामपंथी माओवादी विचारधारा से प्रभावित था। इनका मूल मंत्र था कि स्त्रियां अपना मौन छोड़कर अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों को उद्घाटित करें।
स्त्रियों की समस्याएँ निजी न होकर सभी स्त्रियों की होती है। इन्हें संगठित आंदोलन के माध्यम से ही खत्म किया जा सकता है। सन 60 के बाद रेडिकल स्त्रीवाद ने सामाजिक संरचना के अनुरूप अपनी विचारधारा का विश्लेषण प्रस्तुत किया, जिसमें यह दर्शाया गई की स्त्रियां विभिन्न तरह के कार्यों में संलग्न करने के लिए, पुरुषों के अधीन रखी गई है।' इस संरचना को हम पितृसत्तात्मक भी कह सकते हैं। 70 के दशक के बाद जैसे-जैसे यह आंदोलन फैलता गया रेडिकल स्त्रीवादियों ने जनन क्रिया, बच्चों के पालन पोषण, रसोई की ज़िम्मेदारी तथा घर गृहस्थी संबंधी कार्यों पर प्रश्न चिन्ह लगाना शुरु कर दिया। उन्होंने समलैंगिक संबंधों की वकालत शुरू कर दी और स्त्री-पुरुष विवाह की वैधानिकता का विरोध करने लगे। उनके अनुसार स्त्री वैवाहिक बंधन के माध्यम से अपरिचित पुरुष के साथ बलात्कार के लिए सौंप दी जाती है। उसकी इच्छा पर ध्यान नहीं दिया जाता है। वह संरक्षित वैश्यावृत्ति में संलग्न कर दी जाती है। जहाँ एक पुरुष उसे मातृत्व के लिए बाध्य करता है। यह पितृसत्ता के तहत संस्थाबद्ध रूप में होता है। यहाँ पुरुष ही तय करता है कि संतान पैदा की जाए। उसका पालन-पोषण किया जाए। स्त्रियों पर बस दैनिक कार्यों की ज़िम्मेदारी सौंप दी जाती है। जिस पर पूरा नियंत्रण पुरुष का ही होता है।
• रेडिकल स्त्रीवादी सामाजिक संरचना को स्त्रियों के लिए उत्पीड़न करने वाली संस्था के रूप में देखती हैं, जिसमें किसी स्त्री का मूल्यांकन उसके शारीरिक आकर्षण, स्वास्थ्य एवं संतान उत्पन्न करने की क्षमता के आधार पर किया जाता है।
इसी कारण वे कहती हैं कि पितृसत्ता के अंतर्गत शादी यौन गुलामी का एक तरीका है। इसके अलावा विवाह विषम यौन क्रियाओं को प्रस्तुत करता है। जो परिवार में स्त्रियों को ही एक-दूसरे से विभाजित कर देता है। अर्थात एक दूसरे के प्रति हीन भावना का पैदा होना है। जबरदस्ती मातृत्व की स्थिति में झोंक देना यौन गुलामी ही है। इससे छुटकारा पाने की पहली शर्त है कि विवाह को पितृसत्तात्मक संस्था से मुक्त किया जाए। केट मिलेट' नामक स्त्रीवादी चिंतक ने स्त्रियों के अपमान और उनके अवमूल्यन को पितृसत्ता के द्वारा निर्धारित एक कामुक प्रक्रिया बताया। 'केट मिलेट' ने अश्लील साहित्य को स्त्री शोषण के लिए प्रोत्साहित करने वाला साहित्य कहा। उनके अनुसार स्त्रियों की वेदना, अपमान, यंत्रणा यहाँ तक की उनकी हत्या को भी कामोत्तेजना में बदल दिया गई है। कैथलीन बेरी अश्लील साहित्य को सांस्कृतिक परपीड़क के रूप में परिभाषित करती हैं। विवाह जैसी पितृसत्तात्मक संस्था को नकारने के पीछे रेडिकल स्त्रीवादियों की सोच पुरुषों के वर्चस्व को खत्म करने से थी।
इसीलिए वे संतुष्टि के लिए समलैंगिक संबंधों की वकालत करती हैं। पितृसत्ता के जितने भी प्रतीक स्त्री उत्पीड़न के लिए ज़िम्मेदार थे। सभी की रेडिकल स्त्रीवादियों ने आलोचना की। यहाँ तक कि सौंदर्य प्रतियोगिता को भी वे स्त्रियों के वस्तुकरण का प्रतीक मानती है। आधुनिक विकास जो पर्यावरण की क्षति पहुँचा रहे हैं, जैसे - न्यूक्लीयर पावर प्लान्ट (नाभिकीय बिजली घर) को वे पुरुष लोभ और पर्यावरण के साथ बलात्कार का प्रतीक मानती है। पितृसत्ता को खत्म करने की रेडिकल स्त्रीवादियों के प्रयास ने एक नए विवाद को जन्म दिया जहाँ स्त्रीवादी मूल्यों के आधार पर नए समाज के बनने के रास्ते देखे जाने लगे।
आलोचना- पितृसत्ता के संबंध में रेडिकल स्त्रीवादी सिद्धांत विश्लेषणात्मक की बजाए वर्णनात्मक अधिक हो गई है। पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों के अधिकारों को दिलाने के लिए क्या प्रयास किया जाए। इस संदर्भ में उन्होंने कोई विचार व्यक्त नहीं किया है। एलिस जैगक' ने रेडिकल स्त्रीवाद के विचार, व्यवहार और समाज के क्रांतिकारी बदलाव के लिए किए जाने वाले प्रयासों को ही पर्याप्त नहीं माना, उनके अनुसार मातृत्व और यौन गुलामी की अवस्था के विश्लेषण में ही उन्होंने सारी शक्ति लगा दी।
रेडिकल स्त्रीवादी पितृसत्ता के उद्भव के कारणों को नहीं समझा पाए, आखिर पुरुष स्त्रियों को गुलाम क्यों बनाया? इस प्रश्न का उत्तर तलाश करना आवश्यक है।
समलैंगिकता की हिमायत करते हुए रेडिकल स्त्रीवादी यह भूल जाते हैं कि पितृसत्ता से मुक्ति का यह कोई विकल्प नहीं है। इससे पुरुष और स्त्री के आपसी संबंधों में असंतुलन बनेगा। बार-बार स्त्रियों की स्त्री विषय विशेषता और जनन क्षमता पर विचार करते हुए रेडिकल स्त्रीवादी यह भूल जाते हैं कि इससे नए तरह के एकाधिकार की स्थिति पैदा होगी। ऐलिस जैगर' आगे कहती हैं कि रेडिकल स्त्रीवादियों को चाहिए की वह स्त्री के जीवन पर नियंत्रण के पहलू को केंद्र में रखें, जिसमें स्त्रियां संस्कृति के सृजन को हासिल करने का प्रयास करती हैं। इस सिद्धांत के आलोचकों का यह भी कहना है कि रेडिकल स्त्रीवादी मध्यवर्गीय स्त्रियों के जीवन की समस्याओं को ही मुख्य आधार बनाती हैं, जबकि श्रमिक वर्ग, अश्वेत एवं तीसरी दुनियाँ की स्त्रियों की समस्याओं का बहुत कम जिक्र करती हैं। रेडिकल स्त्रीवादी स्त्रियों को निष्क्रिय, उत्पीड़न सहने वाली, दब्बू और अंतर्मुखी बताने का प्रयास करती हैं। जबकि इतिहास में ऐसी स्त्रियां भी हैं, जिन्होंने निरंतर संघर्ष कर समाज में स्त्रियों को उचित स्थान दिलाने का प्रयास किया है।
रेडिकल स्त्रीवादी सिद्धांतों की काफी आलोचना की गई है। लेकिन शक्ति संतुलन के प्रति उनकी जिज्ञासा, उनके विचार, समाज को एक नई दिशा दे सकते हैं। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों की स्थिति बेहतर कभी नहीं रही है। इस विचारधारा ने पहली बार स्त्री के अस्तित्व को पुरुष के समकक्ष रखने की चुनौती दी। उनका आर्थिक शोषण किया गई तथा लैंगिक भिन्नता के कारण पुरुष से कमतर आंका गई। पुरुषों के द्वारा स्त्रियों के श्रम का शोषण एक सार्वभौम प्रकृति है। सन 1980 की संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में बताया गई है कि विश्व की आबादी में स्त्रियों की संख्या आधी है। इनके काम के घंटे लगभग 2/3 तिहाई हैं। परंतु ये वैश्विक आमदनी का केवल 1 / 10 हिस्सा ही प्राप्त कर पाती हैं। यह वैश्विक संपत्ति के सौंवे हिस्से से भी कम है। चाहे विकसित देश हों या विकासशील सभी जगह स्त्रियों को पुरुषों से कम वेतन दिया जाता है। अंततः उन्हें पुरुषों पर ही आश्रित रहना पड़ता है। अतः समान वेतन, समान अवसर के द्वारा ही स्त्रियों को पितृसत्ता से मुक्ति मिल सकती है।
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