पूर्व-समाजीकरण - Anticipatory Socialization
पूर्व-समाजीकरण - Anticipatory Socialization
प्रसंग-समूह व्यवहार सिद्धांत की दूसरी आधारभूत अवधारणा पूर्व-समाजीकरण की अवधारणा है। भावी भूमिका के लिए अपने आपको पहले से तैयार करना पूर्व-समाजीकरण है। परंपरागत भारतीय परिवार की लड़कियाँ बचपन से ही गुड़िया-गुड्डे का खेल खेलती है। उनका विवाह रचाती है, अपनी गुड़िया की विदाई करती है और रोती है। खेल-खेल में वह भावी वैवाहिक भूमिका के लिए पूर्व समाजीकृत होती है। यह सत्य भी समानत है। मर्टन को अपने इस सिद्धांत की नवीनता प्रमाणित करने के लिए अनेक अवधारणाएँ और शब्द रूपावलियों का सहारा लेना पड़ा है।
प्रसंग-समूह से मनोवैज्ञानिक नाता जोड़ लेने के बाद व्यक्ति अपनी भूमिका को परिवर्तित करता है और ऐसे योग्यताओं को अर्जित करता है। जिनमें वह प्रसंगसमूह का सदस्य सरलतापूर्वक हो जाए। प्रसंग-समूह के मूल्यों और लक्ष्यों को वह लगता है। यदि किसी किशोर का प्रसंग-समूह सेना में अफसर होना ही जाए तो वह पहले से उसके लिए अपने आपको समाजीकृत करना प्रारंभ कर देगा। महान सैनिक कमांडरों की जीवनी पढ़ेगा.
अकड़ कर चलेगा, साहसिक कार्य करेगा और अवसर पाते ही सेना में कमीशन पाने का प्रयास करेगा क्योंकि वह पहले से तैयार है इसलिए वह अपने प्रसंग-समूह (सेना) में अच्छी तरह समायोजित हो जाएगा। बिल्कुल उसी तरह जैसे गुड़िया खेलने वाली बालिका, समय आने पर ससुराली नई भूमिका में समायोजित हो जाती है। पूर्व-समाजीकरण के निम्नलिखित लाभ है।
● भावी भूमिका की तैयारी होती है और प्रसंग-समूह में पहुँच कर समायोजन शीघ्र, सुगम होता है।
ब.) पूर्व-समाजीकरण के कारण प्रसंग-समूह में जाने की प्रेरणा में कमी नहीं आने पाती।
अपनी प्रस्थिति से असंतुष्ट होकर, दूसरी प्रस्थिति में पहुँचने की प्रक्रिया, सामाजिक गत्यात्मकता के अंतर्गत रखा जा सकता है। सामाजिक श्रेणी क्रम में ऊपर चढ़ने के अवसर और नीचे उतरने की संभावनाएँ जितनी अधिक होंगी, सामाजिक गत्यात्मकता भी उतनी हो अधिक होगी। मर्टन इस सिद्धांत का व्यापक परिणाम यह भी हो सकता है कि सामाजिक असंतोष क्रांति का रूप नहीं लेगा। अगर अपने प्रसंग-समूह में पहुँचने के लिए असंतुष्ट लोगों को सुअवसर प्राप्त हो. तो लोग प्रसंग-समूह व्यवहार करना, क्रांति करने से सरल समझेंगे। इसलिए अमरीकी समाज मर्टन के प्रसंग-समूह व्यवहार सिद्धांत से अधिक आशाएँ रखता है।
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