आश्रम व्यवस्था एक मूल्यांकन - Ashram system an evaluation

आश्रम व्यवस्था एक मूल्यांकन - Ashram system an evaluation


आधुनिक भारत में आश्रम व्यवस्था किस स्तर तक व्यवहारिक है? किस स्तर तक सिद्धांतिक है? स्पष्टत: समझने के लिए इस व्यवस्था का मूल्यांकन करना होगा। उपर्युक्त विवरण स्पष्ट है कि आश्रम व्यवस्था ने एक लंबे समय तक हिंदू सामाजिक संगठन को प्रभावित किया है। र एक हिंदू के जीवन को व्यवस्थित बनाए रखने में योगदान दिया। इस संदर्भ में एक प्रश्न यह है कि इन आश्रमों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण आश्रम कौन सा है? वैसे तो सभी आश्रमों का अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि एक आश्रम दूसरे के लिए पृष्ठभूमि तैयार करता है फिर भी हम यह कह सकते हैं कि अन्य तीनों आश्रमों की तुलना में गृहस्थ आश्रम अधिक महत्वपूर्ण है। ब्रह्मचर्य आश्रम का काल होता है,

इसका संबंध शिक्षा प्राप्त करने से ही है। वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रम में व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयत्न करता है। गृहस्थ आश्रम में ही व्यक्ति तीन पुरुषार्थ धर्म, अर्थ एवं काम की पूर्ति करता है। अन्य आश्रम इसी आधार के सहारे जीवन प्राप्त करते हैं। अतः गृहस्थ आश्रम ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। एक प्रश्न यह भी किया जाता है कि आश्रम व्यवस्था में भारतीय समाज को किस सीमा तक प्रभावित किया?


इन प्रश्नों के उत्तर विवादास्पद है। कुछ विद्वानों का मत है कि यह सैद्धांतिक व्यवस्थाएं हैं, व्यवहार में इनका पालन नहीं होता। कुछ विद्वान इसके विपरीत मत प्रकट करते हैं। महाभारत में आश्रम व्यवस्था के अनेक स्थानों पर उल्लेख मिलता है। इस व्यवस्था में ऋषि, मुनियों, धार्मिक लोगों एवं कुछ राजाओं को बहुत प्रभावित किया है। बहुत से लोग घर छोड़कर सन्यासी नहीं बनते फिर भी आश्रम व्यवस्था में बताए गए कर्तव्य एवं दायित्व के प्रति सजग थे

एवं उनका पालन करते थे। इस संदर्भ में एक प्रश्न यह भी होता है कि क्या आधुनिक भारत में इसका कोई व्यवहारिक महत्व है? इसका उत्तर नकारात्मक ही होगा आश्रम व्यवस्था उस युग की देन है जब पुरुषार्थ, कर्म, धर्म, पुनर्जन्म एवं वर्ण व्यवस्था का महत्व था और यह भारतीय समाज के आधार थे। वर्तमान में यह आधार कमजोर हुए हैं। अतः इनके साथ साथ आश्रमों की उपयोगिता भी समाप्त हुई है आश्रम व्यवस्था में व्यक्ति की आयु समान कर प्रत्येक आश्रम की अवधि 25 वर्ष में की गई है। किंतु अब औसत आयु 65 वर्ष हो गई है इस दृष्टि से तो व्यक्ति वानप्रस्थ सन्यास आश्रम के कर्तव्यों को पूरा नहीं कर सकता ब्रह्मचर्य आश्रम में व्यक्ति जिस प्रकार की शिक्षा प्राप्त करता था वह आधुनिक औद्योगिक व वैज्ञानिक दृष्टि से अनुरूप अनुपयुक्त है। आज जो वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा दी जाती है और जो प्रयोग कराए जाते हैं यह प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था में संभव ही नहीं था। इसके अतिरिक्त परंपरागत शिक्षा केवल ज्ञान के लिए थी। जबकि आज की शिक्षा का उद्देश्य रोजी-रोटी कमाना भी है। आज की बदली हुई परिस्थिति में भारतीयों के लिए आश्रमों का कोई व्यवहारिक महत्व नहीं रह गया है। इन्हें हम इस युग की मांग के अनुरूप भी नहीं कर सकते।