आश्रम व्यवस्था: अर्थ एवं परिभाषा - Ashram System: Meaning and Definition

आश्रम व्यवस्था: अर्थ एवं परिभाषा - Ashram System: Meaning and Definition


डॉ. पी. एन. प्रभु के अनुसार" आश्रम शब्द मौलिक रूप से संस्कृति के श्रम धातु से बना है जिसका अर्थ है उद्योग अथवा परिश्रम करना। इस उत्पत्ति के अनुसार आश्रम का अर्थ है-


(1) वह स्थान जहां पर परिश्रम प्रयत्न या उद्योग किया जाता है। 


( 2 ) इस प्रकार के परिश्रम या उद्योग के लिए की जाने वाली क्रिया, इस प्रकार आश्रम व्यवस्था एक


"क्रिया स्थल" माना गया है। शाब्दिक रूप से आश्रम का अर्थ रुकने' अथवा "विश्राम करने के स्थान" पर है जहां रोककर व्यक्ति स्वयं को आगे की यात्रा के लिए तैयार करता है। इस प्रकार आश्रम स्वयं लक्ष्य नहीं बल्कि लक्ष्य प्राप्ति का साधन है। दूसरे शब्दों में आश्रम व्यवस्था का अर्थ उस व्यवस्था से है, जिसमें व्यक्ति अनेक कार्यात्मक अफसरों पर विश्राम करता हुआ अंतिम लक्ष्य "मोक्ष की ओर बढ़ता है।

हिंदू आश्रम व्यवस्था चार स्तरों में विभाजित है और प्रत्येक स्तर में व्यक्ति को भिन्न-भिन्न दायित्व निर्वाह का आदेश किया गया है इसके उपरांत यह सभी अफसर एक दूसरे से संबद्ध रहकर लक्ष्य की पूर्ति में सहायक होते हैं। आश्रम व्यवस्था में पुरुषार्थ के सिद्धांत की पूर्ण अभिव्यक्ति मिलती है। व्यक्ति के संपूर्ण दायित्व को इस सिद्धांत के माध्यम से प्राप्त है, किया गया है पुरुषार्थ चार हैं. क्रमश: धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष व्यक्ति इन चारों दायित्वों का निर्वाह तभी कर सकता है, जब वह अपना मानसिक शारीरिक नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास में विभिन्न आश्रमों में रहता हुआ व्यक्ति इसी गुणों का विकास करना है। डॉ. के. एम. कपाड़िया (मैरिज एंड फैमिली इन इंडिया, पेज 27) ने लिखा है कि हिंदू आश्रम व्यवस्था में पुरुषार्थ सिद्धांत की वास्तविक अभिव्यक्ति की गई है। यह प्रणाली हिंदू जीवन की प्राथमिकता पर आधारित क्रमबद्ध एवं सुनियोजित तरीकों को व्यक्त करती है आश्रम व्यवस्था की कुछ परिभाषाएं निम्नलिखित हैं-


महाभारत में वेद व्यास ने लिखा है कि "जीवन के चार आश्रम व्यक्तित्व के विकास की चार सीढ़ियां हैं जिन पर क्रम से चलते हुए व्यक्ति ब्रह्म की प्राप्ति करता है"

(महाभारत, शांति वर्ष 241/15)


मनोरमा जौहरी:- आश्रम का तात्पर्य तपस्वियों की कुटिया (वह स्थान जहां तपस्वी तब का अभ्यास करते हैं) विद्यालय अथवा मानव जीवन की चार अवस्थाएं हैं। (मनोरमा जौहरी, वर्ण व्यवस्था, पेज 87 )


शिवपूजन सहाय:- व्यक्ति के दो पक्ष होते हैं एक वह जिसमें व्यक्ति समाज के संपर्क में सामाजिक प्राणी के रूप में रहता है या फिर वह जिसमें व्यक्ति केवल अपने तक ही सीमित होकर रहता है। दूसरा पक्ष जिसमें व्यक्ति स्वयं की दृष्टि से विकास करता हुआ आगे बढ़ता है आश्रम कहलाती है।

(शिवपूजन सहाय. हिंदू सामाजिक समस्याएं, पेज 73) 


डॉ. के. एम. कपाडिया:- हिंदू दार्शनिक संसार की वास्तविकता और क्रियात्मक जीवन की अनिवार्यता अस्पष्टता स्वीकार करते हैं। आश्रम व्यवस्था इसी दर्पण की मौलिक उपलब्धि है।

(डॉक्टर कपाड़िया मैरिज एंड फैमिली इन इंडिया) 


डॉ. पी. एन. प्रभु के अनुसार उन्होंने आश्रम व्यवस्था की निम्न परिभाषाएं दी है


(1). आश्रम संस्कृत शब्द क्रम से लिया गया है। इस उत्पत्ति के अनुसार आश्रम का अर्थ है- वह स्थान जहां प्राप्त या उपयोग किया जाता है तथा इस प्रकार के प्रयत्न या उद्योग की क्रिया। 


(2). साहित्यिक दृष्टिकोण से आश्रम एक बिराम अवस्था या पड़ाव है इस प्रकार आश्रम शब्द एक अवस्था की ओर संकेत करता है जहां व्यक्ति पवित्रता में विश्राम के लिए रुक जाता है तथा अगली यात्रा के लिए तैयारी करता है।