मनोवृत्ति की विशेषतायें - Attitude Characteristics
मनोवृत्ति की विशेषतायें - Attitude Characteristics
मनोवृत्तिके विभिन्न दृष्टिकोणों और उनकी विभिन्न परिभाषाओं तथा इसकी त्रिघटकीय संरचना से मनोवृत्तिकी कई विशेषताये स्पष्ट होती है। जिनका विवरण निम्नलिखित है-
(1) मनोवृत्तिअर्जित की जाती है: मनोवृत्तिव्यक्ति अपने जीवन काल में विकसित करता है। यह जन्मजात नहीं होती है। इन्हें व्यक्ति अपने जीवन के अनुभवों से निर्मित करता है। शिक्षण प्रशिक्षण इत्यादि कई प्रकार के माध्यमों से व्यक्ति की मनोवृत्तियों का विकास होता है। उदाहरण के लिये, कोई व्यक्ति यदि भारतीय जनता पार्टी को पसंद करता है तो यहां मनोवृत्तिउसमें जन्म जात नहीं होगी बल्कि उसमें यह अपने परिवार, समाज और उस पार्टी विशेष की विचारधारा तथा उसके नेताओं के बारे में जानकर विकसित होगी।
(2) मनोवृत्तिकिसी मनोवृत्ति-वस्तु के प्रति अनुक्रिया करने की एक तत्परता है मनोवृत्ति अनुक्रिया करने की एक तत्परता है न कि प्रतिक्रिया। यह अनुकूल अथवा प्रतिकूल कुछ भी हो सकती है।
(3) मनोवृत्तिअपेक्षाकृत स्थायी होती है: मनोवृत्तिकी एक मुख्य विशेषता यह भी है कि एक बार इनका निर्माण होने के बाद तुरंत परिवर्तित नहीं होती। इनमें परिवर्तन होता है लेकिन, इस परिवर्तन में समय लगता है। अर्थात ये अपेक्षाकृत स्थायी होती हैं। ये कुछ परिस्थितियों में अस्थायी होती हैं तथा अधिकांश परिस्थितियों में स्थायी होती है।
(4) मनोवृत्तिएक अमूर्त अवस्था है: इसे दूसरे व्यक्ति द्वारा मूर्त रूप में देखा नहीं जा सकता। यह एक मानसिक स्थिति है जिसके बारे में किसी के व्यवहारों के आधार पर जाना जा सकता है।
(5) मनोवृत्तिएक जटिल सम्प्रत्यय है: इसकी एक विशेषता इसकी जटिलता है। जैसा पहले भी बताया गया है कि यह तीन घटकों से मिलकर बनी होती है अथवा इसमें तीन घटक शामिल होते हैं। भावात्मक, व्यवहारात्मक, संज्ञानात्मक, इन घटकों की जटिलता के कारणमनोवृत्तिभी जटिल होती है।
( 6 ) मनोवृत्तिमें एक विशिष्ट दिशा होती है: मनोवृत्तिसकारात्मक या नकारात्मक अथवा अनुकूल या प्रतिकूल हो सकती है। ऐसा नहीं है कि किसी मनोवृत्ति वस्तु के प्रति किसी की मनोवृत्तिअनुकूल है और प्रतिकूल भी ।
(7) मनोवृत्ति में तीव्रता का गुण होता है: मनोवृत्तिअनुकूल हो या प्रतिकूल हो इसमें तीव्रता का गुण होता है। इसका अर्थ है कि मनोवृत्तिकिसी सीमा तक अनुकूल अथवा प्रतिकूल है। अर्थात किसी वस्तु के प्रति अधिक अनुकूल या कम अनुकूल मनोवृत्ति अथवा अधिक प्रतिकूल या कम प्रतिकूल।
(8) मनोवृत्तिअभिप्रेरित करती है: मनोवृत्तिमें अभिप्रेरणा का गुण होता है अर्थात यह व्यक्ति को मनोवृत्ति - वस्तु के प्रति जैसी उसकी मनोवृत्तिवैसा व्यवहार करने के लिये प्रेरित करती है। जैसे किसी व्यक्ति में संगीत के प्रति अनुकूल मनोवृत्तिहै तो वह व्यक्ति संगीत से जुड़ी चर्चाओं में भाग लेगा, संगीतकारों से संपर्क करने की कोशिश करेगा, संगीत सुनेगा इत्यादि।
(9) मनोवृत्तिव्यवहार को प्रभावित करती है: यद्यपि वे हमेशा हमारे प्रकट व्यवहार से परावर्तित नहीं होती, फिर भी हमारे मनोवृत्तिनिर्माण एवं विकास: व्यवहारों को प्रभावित करती हैं।
मनोवृत्ति अपेक्षाकृत स्थायी होती है। यह एक अर्जित या सीखी जाने वाली प्रवृत्ति है। सीखने या अधिगम के नियम इसकी व्याख्या करते हैं। इसमें कई तरह के कारकों का प्रभाव होता है। बच्चा जैसे जैसे अपनी विकास की अवस्थाओं में आगे बढ़ता जाता है. उसकी विभिन्न प्रकार की मनोवृत्तियों का निर्माण और परिवर्तन होता जाता है। यहां उन विभिन्न प्रक्रियाओं का वर्णन किया जा रहा है जिनके माध्यम से हम सीखते हैं।
(I) प्राचीन अनुबंधन: यह मनोविज्ञान का एकमूल नियम है। यह नियम या सिद्धांत रूसी शरीर शास्त्री इवान पी० पैवलव के प्रयोगों के फलस्वरूप आया। यह नियम साहचर्य पर आधारित है। इस नियम के अनुसार जब स्वाभाविक उद्दीपक को किसी अनुक्रिया उत्तपन्न करने वाले उद्दीपक के साथ बार बार उपस्थित किया जाता है तो वह स्वाभाविक उद्दीपक अनानुबंधित उद्दीपक अथवा अनुक्रिया उत्पन्न करने वाले उद्दीपक का स्थान ले लेता है।
अर्थात स्वाभाविक उद्दीपक अनानुबंधित उद्दीपक की तरह प्राणी में अनुक्रिया उत्पन्न करने लगता है। इस सिद्धांत या नियम से प्राणी मुख्य रूप से अनैच्छिक अर्थात वैसी अनुक्रियायें सीखता है जो उसके नियंत्रण में नहीं होती हैं। जैसे-लार साव. डरना, पसंद करना आदि। हम लोग दिन प्रतिदिन कई तरह की मनोवृत्तियों को इस नियम के आधार पर सीख लेते हैं। विज्ञापन कर्ता इस नियम का उपयोग अपने उत्पादों के प्रति लोगों की मनोवृत्तिसकारात्मक बनाने के लिये बड़ी कुशलता से करते हैं। इसमें उनकी विद्वत्ता या कुशलता यह है कि वे अपने उत्पाद के विक्रय के लिये लक्षित जनसंख्या को चुनते हैं और ये भी देखते हैं कि ये लक्षित जनसंख्या किस अभिनेता खिलाड़ी या व्यक्ति विशेष को पसंद करती है। यहाँ वह अभिनेता, खिलाड़ी या व्यक्ति – विशेष अनानुबंधित उद्दीपक की तरह होता है और उत्पाद स्वाभाविक उद्दीपक की तरह इसमें होता यह कि जो स्वाभाविक अनुक्रिया अपने पसंदीदा व्यक्ति के प्रति होती हैं वही उस उत्पाद के प्रति भी हो जाती है। यह ऐसा तब होता है जब बार-बार इनको एक साथ उपस्थित किया जाता है। उदाहारण के लिए शराब की बिक्री बढ़ाने के लिये कंपनी अपने उत्पाद पर किसी सुन्दर लड़की या महिला की फोटो लगाती हैं। प्राचीन अनुबंधन दो पथों द्वारा मनोवृत्तिको प्रभावित कर सकता है: प्रत्यक्ष पथ और अप्रत्यक्ष पथ (स्वेल्डेन्ट्स, वान ओसीलेयर, तथा जानीजेप्सकी. 2010)
(2) नैमितिक/ क्रियाप्रसूत अनुबंधन: नैमित्तिक या साधनात्मक अनुबंधन, अधिगम का एक अन्य महत्वपूर्ण नियम है।
इस नियम के अनुसार प्राणी कई तरह की अनुक्रियायें करता है लेकिन जिस अनुक्रिया के बाद उसे सुखद परिणाम मिलता है उसे वह बार-बार करता है। अथवा उसे करना चाहता है. ताकि अच्छा और सुखद परिणाम मिल सके। लेकिन, जब किसी अनुक्रिया के करने पर परिणाम सुखद नहीं मिलता अर्थात परिणाम में उसे दण्ड या कोई कष्टकर उद्दीपक मिलता है तो उस, अनुक्रिया को वह दोहराना नहीं चाहता अर्थात उस अनुक्रिया से व्यक्ति बचना चाहता हैं। दूसरे शब्दों में, इस नियम के अनुसार प्राणी परिणाम के आधार पर अनुक्रिया करना सीखता हैं। परिणाम सुखद तो अनुक्रिया दोहरायी जायेगी और यदि परिणाम दुखद तो अनुक्रिया दोहरायी नहीं जायेगी। दिन प्रतिदिन के जीवन में हम ऐसे अनेकों उदाहरण देखते हैं जो स्वयं अपने साथ भी घटित होते हैं जिनमें प्राणी उसी अनुक्रिया को दोहराता है जिसका उसे सुखद परिणाम मिलता है। उदाहरण के लिये कर्मचारी इसलिये अपने काम पर जाता है क्यों कि उसे वेतन मिलता है। छोटे-छोटे बच्चे जो स्कूल नहीं जाना चाहते, उनके माँ-बाप उनको बाजारघूमने को लालच या मनपसंद वस्तु देते हैं ताकि वह स्कूल जाये ठीक इसी प्रकार हमें दुःखद परिणाम अनुक्रिया को करने से रोकता है जैसे यदि कोई अपराध करता है तो उसे दण्ड दिया जाता है ताकि वह उस अपराध को न करे। मनोवृत्तिके निर्माण एवं विकास में इस नियम की बड़ी भूमिका है। बच्चे जब कोई ऐसी मनोवृत्तिदिखलाते हैं जिसे उनके आस पास वाले लोग (दोस्त, परिवार, शिक्षक) पसंद करते हैं, तो उनकी उस मनोवृत्तिकी प्रशंसा की जाती है या किसी अन्य प्रकार से उन्हें पुरस्कृत किया जाता है तो उनकी वह विशेष प्रकार की मनोवृत्तिविकसित हो जाती है।
(3) निरीक्षणात्मक अधिगम:यह नियम या सिद्धांत अल्बर्ट बैण्डूरा ने दिया। यह नियम कहता है कि व्यक्ति दूसरों की अनुक्रियाओं और उन अनुक्रियाओं पर दूसरों को मिलने वाले परिणाम के आधार पर सीखता है। जैसा कि पिछले अनुच्छेद में उदाहारणस्वरूप बताया गया है कि अपराध करने पर अपराधी को दण्ड दिया जाता है। इस प्रकार की व्यवस्था के दो उद्देश्यी हो सकते हैं पहला ये कि वो व्यक्ति इस तरह का व्यवहार या अनुक्रिया फिर से न करे जो कि क्रियाप्रसूत अनुबंधन पर आधारित है जबकि दूसरा उद्देश्य अपराधी व्यवहार पर दिया जाने वाला दण्ड दूसरे लोगों को यह सीखने में मदद करेगा कि इस तरह का व्यवहार नहीं करना है क्यों कि इस प्रकार के व्यवहार का परिणाम बुरा होता है। बच्चे अपने इर्द-गिर्द में उपस्थित लोगों अर्थात भाई-बहन, मित्र, माता-पिता, शिक्षक इत्यादि की जिस प्रकार की मनोवृत्तिदेखते हैं वैसी ही मनोवृत्तिवे स्वयं में विकसित कर लेते हैं।
(4) सूचना का प्रभाव: आजकल के दौर में हम सूचनाओं के विभिन्न माध्यमों से घिरे हुये हैं। हमारे चारों ओर से सूचनाओं की बमबारी सी होती रहती है। मनोवृत्तियों में परिवर्तन के लिये आवश्यक नहीं है
कि दूसरे की वास्तविक उपस्थितिहो। दूसरों के द्वारा दिया गया संदेश या सूचना हमारी मनोवृत्तिका निर्माण भी करती है और उनको परिवर्तित भी करती है। रेडियो, टेलिविजन, पुस्तकों, इंटरनेट इत्यादि ऐसे अनेक माध्यम या सोत हैं जो हमें सूचनायें देते रहते हैं। कोई व्यक्ति समाचार-पत्र में प्रकाशित किसी विद्वान का लेख पढ़कर, किसी सफल और महान व्यक्ति की जीवनी पढ़कर, किसी नेता का भाषण सुनकर अपनी मनोवृत्तिमें किस तरह से विकास करता है, ये हम प्रतिदिन देखते है। आजकल लोक सभा या विधान सभा के चुनाव में विभिन्न राजनैतिक दल अपने पक्ष में लोगों की मनोवृत्ति करने के लिए सूचना अभियांत्रिकी का सहारा ले रहे है।
(5) आवश्यकता: जहाँ से हमारी आवश्यकता की पूर्ति होती है, उसके प्रति हमारी मनोवृत्तिअनुकूल हो जाती है। यह व्यक्ति, वस्तु, विचार या घटना कुछ भी हो सकता है। रोजेन बर्ग (1956) के अध्ययनों में इस बात के साक्ष्य देखे जा सकते हैं।
(6) समूह से संबद्धता: प्रत्येक समूह के अपने मानक, विश्वास, रीति रिवाज तथा मूल्य होते हैं।
जो व्यक्ति समूह का सदस्य होता है उसे इनका पालन करना होता है। ऐसे में उसकी मनोवृत्तिसंबंधित समूह के सदस्यों की तरह बन जाती है। आपने देखा होगा कि धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों की मनोवृत्ति बाद में बदलकर विकसित हो जाती है। विवाह के बाद लड़की की मनोवृत्तिअपने अपने ससुराल के सदस्यों जैसे बन जाती है। कोई राजनैतिक दल को छोड़कर जब व्यक्ति दूसरे राजनैतिक दल की सदस्यता ले लेता है तो उसकी मनोवृत्तिदूसरे राजनैतिक दल के अन्यसदस्यों की तरह विकसित हो जाती है। इसमें संदर्भ समूह भी हो सकता है और प्राथमिक समूह भी / मनोवैज्ञानिकों ने इन दो प्रकार के समूहों में अन्तर किया है। प्राथमिक समूह ऐसा समूह होता है जिसके सदस्यों के बीच घनिष्ठता अधिक होती है। ऐसे समूह में सदस्यों की संख्या अधिक नहीं होती है। जैसे खेल की कोई टीम, परिवार, मित्र इत्यादि। प्राथमिक समूह के सदस्यों की मनोवृत्तिलगभग एक जैसी होती है। बच्चा जिस परिवार में जन्म लेता है, उस परिवार के सदस्यों की मनोवृत्तिकी जैसी मनोवृत्तिउसमें विकसित हो जाती है। एक समूह के सदस्यों की मनोवृत्तिमें एक रूपता होती है। प्राथमिक समूह चूंकि छोटा होता है अर्थात इसमें सदस्यों की संख्या कम होती है इसलिये इसके सदस्यों के मध्य अतः क्रिया भी अधिक और अच्छी होती है। जिस कारण इनकी मनोवृत्तिभी अपने सदस्यों की तरह विकसित होती है और उसमें समरूपता होती है।
दूसरा, संदर्भ समूह है जो मनोवृत्तिके निर्माण और विकास में भूमिका निभाता है।
यह एक ऐसा समूह है. जिसका व्यक्ति सदस्य नहीं भी हो सकता या उस समूह विशेष के मूल्य, मानक एवं लक्ष्य को अपना लेता है। ऐसा होने पर उसमें (व्यक्ति में) संदर्भ समूह के सदस्यों की तरह मनोवृत्तिविकसित हो जाती है। संदर्भ समूह मानकों के माध्यम से मनोवृत्तिका निर्माण करते हैं। उदाहरण के लिये, धार्मिक, राजनैतिक, व्यवसाय इत्यादि के प्रति मनोवृत्तिअक्सर इसी प्रकार के समूह के माध्यम से ही विकसित होती है।
(7) संस्कृतिः प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी संस्कृति में पलता बढ़ता है। व्यक्ति का सामाजीकरण उसी संस्कृति विशेष से होता है। संस्कृति अपने मानकर, मूल्य, परंपरायें रखती है। स्वाभाविक है कि जो व्यक्ति जिस संस्कृति में पला-बढ़ा हो उस संस्कृति का प्रभाव उसकी मनोवत्ति के विकास को प्रभावित करेगा। व्यक्ति की मनोवृत्तिउसके सांस्कृतिक प्रारूप के अनुसार विकसित होती है। संस्कृति के मानक कैसे हमारी मनोवृत्तिको विकसित करते हैं, यह पूर्व में बताये गये अधिगम के नियमों से संभव होता है। जैसे जब हम किसी को हाथ जोड़कर नमस्ते करते हुये देखते है तो हम भी ऐसा ही करने लगते हैं। क्योंकि इस तरह के व्यवहार को समाज या संस्कृति से मान्यता मिल चुकी होती है। अर्थात इन्हें संस्कृति स्वीकार करती है। मानवशास्त्री भीड़ (1935) के अध्ययन संस्कृति और मनोवृत्तिपर उल्लेखनीय हैं।
(8) रूढियाँ: रूढियाँमनोवृत्तिको विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
रूढियाँ किसी समूह विशेष की विशेषताओं से संबंद्ध व्यक्ति के विचार या मान्यताओं का एक समुच्चय होती है। इसमें व्यक्ति किसी विशेषता को पूरे समूह पर सामान्यीकृत करता है। जैसे नेता भ्रष्टाचारी होते है।
(9) व्यक्तित्व संबंधी कारक: ऐसादेखा गया है कि व्यक्ति उन मनोवृत्तियों को जल्दी अपना लेता है। जो उसके व्यक्तित्व के अनुकूल होती हैं। जैसे जो लोग ईमानदार होते हैं वे इमानदारी वाली मनोवृत्तिको स्वीकार कर लेते हैं। जो लोग आक्रामक प्रवृत्ति के होते हैं उन्हें आक्रामक लोग और इस तरह के व्यवहार पसंद आते हैं। कालांतर में, उनमें इस तरह की मनोवृत्तिविकासित हो जाती है।
( 10 ) व्यक्तिगत अनुभव : मनोवृत्तिके निर्माण में व्यक्तिगत अनुभव की भी बड़ी भूमिका होती है। हमारे इतिहास से इसके अनगिनत उदाहरण दिये जा सकते हैं। जैसे अंगुलीमाल डाकू एक महात्मा के संपर्क में आने के बाद अपने बुरे कामों को छोड़कर एक महात्मा बन गया। सम्राट अशोक कई लोगों की हत्या करने के बाद बौद्ध भिक्षु बन गया और अपने जीवन के अंतिम समय में एक सज्जन और साधारण व्यक्ति रहा/गोस्वामी तुलसीदास जी अपनी पत्नी को बहुत प्रेम करते थे। उनको अपनी पत्नी से इनता लगाव था कि अन्य कार्यों या विचारों के लिये उनके पास समय ही नहीं था, लेकिन पत्नी से वियोग के बाद वे एक प्रसिद्ध कवि बने और कई काव्यग्रंथों की रचना कर दी। यहाँ अपरोक्त उदाहरणों में मनोवृत्तिमें हुआ परिवर्तन उनके व्यक्तिगत अनुभव को दर्शाता है।
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