पिछड़ी जाति - backward caste
पिछड़ी जाति - backward caste
पिछड़ी जातियां में वे जातियां सम्मिलित की गई हैं जो सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक रूप से कमजोर होती हैं। ए जातियां तथाकथिक जाति व्यवस्था में ब्राह्मणों व क्षत्रियों के बाद आती हैं तथा अस्पृश्य जातियों से उच्च मानी जाती हैं। भारतीय संविधान में अनेक प्रावधानों द्वारा अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए विभिन्न सुधारात्मक कदम उठाए गए। उनके सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक तथा राजनीतिक कल्याण हेतु अनेक कार्य किए गए, उनके लिए आरक्षण व्यवस्था का प्रावधान किया गया. जबकि अन्य पिछड़ी जातियों के लिए शिक्षा तथा रोजगार से जुड़े कदम उठाए गए। हालांकि बाद में पिछड़ी जातियों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था कर दी गई। पिछड़ी जातियों के लिए स्पष्ट परिभाषा का प्रायः अभाव पाया जाता है तथा ज्यादतर स्थानों पर इनकी व्याख्या पिछड़े वर्ग के रूप में करने का प्रयास किया गया है।
सुभाष कश्यप तथा विश्व प्रकाश गुप्ता द्वारा लिखित राजनीतिक कोश में पिछड़े वर्गों को इस प्रकार से परिभाषित किया गया है-
“पिछड़े हुए वर्गों का आशय समाज के उस वर्ग से है जो सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक निर्योग्यताओं के कारण समाज के अन्य वर्गों की अपेक्षाकृत नीचे के स्तर पर काबिज हो ।
यद्यपि संविधान में इस शब्द का प्रयोग अनेक स्थानों पर किया गया है, परंतु इसकी स्पष्ट परिभाषा कहीं भी नहीं दी गई है । जाति के संदर्भ में पिछड़े वर्ग माध्यम तथा व्यवसायी (स्वच्छ) जातियां हैं। आंद्रे बेते पिछड़े वर्गों के सार के रूप में कृषक वर्ग की व्याख्या की है। यह निश्चित ही जाति व्यवस्था की उच्च जातियों से शिक्षा, व्यवसाय तथा सरकारी नौकरियों में पिछड़े हुए लोगों का वर्ग है।
उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा सन् 1948 में अन्य पिछड़े वर्गों की शैक्षणिक सुविधाओं को सुदृढ़ करने के लिहाज से कुछ घोषणाएं की गई तथा इनमें राज्य की कुल 56 जातियों को शामिल किया गया। इनकी संख्या राज्य की कुल जनसंख्या का 65 प्रतिशत भाग थी। 1954 तक देश के 15 राज्यों में पिछड़े वर्गों के अनेक संगठन स्थापित हो गए तथा उनकी संख्या 88 के आस-पास तक पहुँच चुकी थी। पहली बार भारतीय स्तर पर 1950 में अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग महासंघ गठित हुआ। विभिन्न राज्यों द्वारा पिछड़े वर्गों की सूचियां बनायी गयी।
कर्नाटक राज्य सरकार द्वारा बनायी गयी सूची में ईसाई, मुसलमान, जैन आड़ सभी गैर-ब्रहम जातियों को इस वर्ग के अंतर्गत शामिल किया गया। इसी प्रकार महाराष्ट्र और तमिलनाडू में भी ब्रहम जातियों को छोड़कर सभी को पिछड़े वर्ग की अनुसूची में शामिल किया गया। विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग द्वारा 1948-49 में पिछड़े वर्ग के छात्रों को उनके अनुपात के अनुरूप के विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों में आरक्षण देने की बात को तवज्जो दिया।
जातियों के निर्धारण जैसे ही पिछड़ी जातियों का निर्धारण भी जन्म के आधार पर ही होता है। सरकार द्वारा जातियों को पिछड़ी घोषित कर देने के कारण सैद्धान्तिक रूप से इसमें शिक्षा तथा आर्थिक दृष्टि से समृद्ध लोग भी शामिल हो सकते हैं। इस प्रकार से इन लोगों को सरकारी प्रावधानों के तहत कुछ अन्य लाभ व सुविधाएं स्वतः ही प्राप्त होंगी। तथा कई बार ऐसा भी होता है कि जरूरतमंद को इन सुविधाओं से वंचित रहना पड़ जाता है। अतः यह कहा जा सकता है कि पिछड़ी जाति अथवा वर्ग की अवधारणा एक बृहत तथा जटिल समूह की अवधारणा है।
स्पष्ट तौर पर यह कहा जा सकता है कि पिछड़ी जातियों में वे लोग आते हैं जो ब्राह्मण से निम्न तथा अस्पृष्यों से उच्च प्रस्थिति वाले होते हैं अर्थात् ए इन माध्यम श्रेणी की जातियां होती हैं। इसके तहत वे सभी लोग आते हैं जो शिक्षा, व्यवसाय, व्यापार आदि क्षेत्रों में उच्च जातियों से पीछे रहते हैं। समान्यतः इनके पास भूमि का छोटा सा हिस्सा होता है तथा ए अपनी भूमि पर कृषि करते हैं। अतः यह माना जा सकता है कि इनके जीवनयापन का प्रमुख आधार कृषि कार्य होते हैं। पिछड़े होने के बाद भी इनमें सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक आधार पर कई खंडित समूह पाए जाते हैं।
भारतीय संविधान की धारा 340 में राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वह एक आयोग की नियुक्ति करेगा, जो देश के विभिन्न भागों में रहने वाले पिछड़ी जातियों की स्थिति के बारे में विवरण प्रस्तुत करेंगे। धारा 15(4) तथा 16 के तहत राज्य सरकारों को भी एक ऐसे ही आयोग के गठन का अधिकार दिया गया है. जो इन जातियों की सामाजिक, आर्थिक तथा शिक्षा संबंधी समस्याओं का जायजा ले सकें तथा विवरण प्रस्तुत कर सकें। इन आयोगों द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट के आधार पर ही इन जातियों से संबंधित सुविधाओं तथा संवैधानिक प्रयासों को संशोधित तथा क्रियान्वित किया जाएगा।
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