वैयक्तिक अध्ययन की आधारभूत मान्यताएँ - Basic Assumptions of Individual Learning

वैयक्तिक अध्ययन की आधारभूत मान्यताएँ - Basic Assumptions of Individual Learning


वैयक्तिक अध्ययन विधि, जिसका प्रमुख प्रयोजन एक अथवा कुछ इकाइयों का सर्वांगीण अध्ययन के आधार पर सम्पूर्ण समूह अथवा क्षेत्र की विशेषताओं के विषय में अवगत होना होता है, वान्य रूप से कुछ त्रुटिपूर्ण प्रतीत हो सकता है, परन्तु यह विधि कुछ ऐसी मान्यताओं पर आधारित है जिनको समझकर इस प्रकार की आशंकाओं का निराकरण किया जा सकता है। इस दृष्टि से वैयक्तिक अध्ययन की आधारभूत मान्यताओं पर दृष्टिपात कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है, जो निम्नलिखित है-


1. वैयक्तिक अध्ययन की सर्वप्रमुख मान्यता यह है कि सभी व्यक्तियों के व्यवहारों में उनकी विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार भिन्नता होने के बाद भी मानव स्वभाव में कुछ मौलिक एकता विद्यमान रहती है, जिसके माध्यम से सभी व्यक्तियों के व्यवहारों को समझा जा सकता है।

इस विषय पर आल्पोर्ट (1942) के विचार महत्वपूर्ण है, जिसने यह प्रतिपादित किया कि मानव प्रकृति से संबंधित कुछ विशेषताएँ ऐसी होती हैं जिन्हें सभी व्यक्तियों तथा एक समूह के प्रत्येक सदस्य पर लागू किया जा सकता है। इस आधार पर वैयक्तिक अध्ययन विधि के माध्यम से किसी इकाई अथवा एक विशेष समूह की विशेषताओं को समझना एक वैज्ञानिक विधि कहा जा सकता है।


2. वैयक्तिक अध्ययन विधि इस मान्यता पर भी आधारित रहती है कि, प्रत्येक मानव व्यवहार कुछ विशेष परिस्थितियों से प्रभावित होता है। अतः यदि एक विशेष परिस्थिति के अन्तर्गत किसी व्यक्ति अथवा समूह के सदस्य के व्यवहार को समझ लिया जाये तो उसी परिस्थिति में अन्य व्यक्ति एवं समूह भी उसी प्रकार का व्यवहार करते हुए पाये जायेंगे। इस सन्दर्भ में यह भी सत्य है कि परिस्थितियों में पुनरावृत्ति होती रहती है। इस अर्थ में, विभिन्न स्थानों एवं विभिन्न समय पर उत्पन्न होने वाले मानव व्यवहारों का अनुमान लगाया जा सकता है।


3. वैयक्तिक अध्ययन की यह भी मान्यता है कि मानवीय क्रियाओं एवं व्यवहारों पर समय तत्व' का भाव अनिवार्य रूप से परिलक्षित होता है। इस सन्दर्भ में यह समझना आवश्यक है कि जो घटना आज वर्तमान में घटित हो रही है. उसका बीजारोपण आज काफी समय पूर्व किसी न किसी कारक के प्रभाव से हो चुका होता है। अतः वैयक्तिक अध्ययन विधि के माध्यम से किसी विशेष घटना को प्रभावित करने वाले कारकों को एक विशेष अवधि अथवा समय के सन्दर्भ में समझा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर यह कहा जा सकता है कि किसी समाजिक समस्या, क्रान्ति अथवा युद्ध की स्थिति केवल तात्कालिक दशाओं से उत्पन्न नहीं होती बल्कि इनका बीजारोपण काफी पहले हो चुका होता है।


4. वैयक्तिक अध्ययन की एक महत्वपूर्ण मान्यता है कि किसी सामाजिक इकाई का सम्यक् अध्ययन उसे सर्वांगीण रूप से देखकर ही प्राप्त किया जा सकता है, न कि उसके किसी एक अथवा कुछ अन्यत्र पहलुओं के आधार पर।

यहाँ यह समझना आवश्यक प्रतीत होगा कि बहुत सी इकाईयों के एक अथवा दो पक्षों का अध्ययन करने से अधिक अच्छा है कि एक या दो इकाइयों के सभी पहलूओं का समग्र रूप में अध्ययन कर निष्कर्ष प्राप्त कर लिया जाये।


5. वैयक्तिक अध्ययन की उपयुक्तता इस मान्यता पर आधारित है कि मानवीय व्यवहार एवं सामाजिक क्रियायें इतनी जटिल होती हैं कि उन्हें केवल अवलोकन अथवा साक्षात्कार 86 के माध्यम से समुचित रूप से समझा नहीं जा सकता, अपितु किसी सामाजिक इकाई के व्यवहारों, मनोवृत्तियों, प्रेरणाओं एवं प्रक्रियाओं पर सम्यक् दृष्टि प्राप्त करने हेतु उनका वैयक्तिक एवं समग्र अध्ययन करना आवश्यक होता है। इसी सन्दर्भ में जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है कि वैयक्तिक अध्ययन को एक सामाजिक सूक्ष्मदर्शक यंत्र की संज्ञा भी प्रदान की गई है।