क्रिया के आधार - basis of action
क्रिया के आधार - basis of action
अपने क्रिया सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट करने के लिए पारसन्स ने आगे और भी व्याख्या प्रस्तुत की है। सामाजिक क्रिया व्यवस्था की व्याख्या के लिए पारसन्स ने कुछ व्यवस्थाओं की व्याख्याओं को भी आवश्यक माना है। इस दृष्टि से पारसन्स के क्रिया के निम्न आधार पर बताए हैं :
(I) व्यक्तित्व व्यवस्था
पारसन्स कहता है कि जीवनशास्त्रीय दृष्टि से व्यक्ति का जन्म इस संसार में अति असहाय अवस्था में होता है। सामाजिक अर्थ में उसमें किसी भी प्रकार की क्रिया करने की क्षमता नहीं होती है। इस प्रकार सामाजिक सावयव के अंग के रूप में व्यक्ति इस अवसथा में अन्य व्यक्तियों से सहायता लेता है। वह उनके संपर्क में आता है। उनके विचारों, भावनाओं, उद्देश्यों, आदतों तथा मूल्यों आदि का ज्ञान प्राप्त करता है। पारसन्स कहता है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास की यही प्रक्रिया है।
पारसन्स ने इस दृष्टि से व्यक्तित्व पर भी अपने इस सिद्धांत में प्रकाश डाला है। उसने लिखा है कि यह व्यक्तित्व व्यवस्था ही क्रिया व्यवस्था का आधारभूत है। व्यक्तित्व व्यवस्था को ही पारसन्स ने क्रियाव्यवस्था कहा है। उसके मतानुसार कर्ता क्या है? यह उसका व्यक्तित्व ही बतलासकता है। इसलिए पारसन्स कहता है कि व्यक्तित्व व्यवस्था का व्याख्या के अभाव में क्रिया व्यवस्था की वैज्ञानिक व्याख्या करना असंभव है।
(2) सामाजिक व्यवस्था
कर्ता की क्रिया का निर्धारण जैसा कि हम देख चुके हैं सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप होता है। इसलिए क्रिया व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था को पारसन्स से समान स्तर प्रदान किया है। सामाजिक व्यवस्था का व्यक्तित्व व्यवस्था से भी घनिष्ठ संबंध है। इस तथ्य को इंगित करते हुए पारसन्स लिखता है कि व्यक्ति सामाजिक परिस्थिति तथा व्यवस्था के संपर्क एवं प्रभाव में दो प्रकार से आता है। इनको हम सामाजिक तत्त्व और गैर-सामाजिक तत्व कह सकते हैं। सामाजिक तत्वों में समूह, समुदाय, आदि आते हैं।
गैर-सामाजिक तत्वों के अंतर्गत पारसन्स ने सांस्कृतिक व्यवस्था का उललेख किया है। इस प्रकार इन दोनों तत्वों के संपर्क में आने से व्यक्ति को सामाजिक परिस्थिति का ज्ञान होता है जिसके आधार पर व्यक्ति अपनी भावी क्रिया को रूप देता है।
इस प्रकार व्यक्तित्व व्यवस्था के अनुरूप सामाजिक व्यवस्था होती है। इन दोनों व्यवस्थाओं में पारस्परिक निर्भरताओं का संबंध है। ये दोनों व्यवस्थाएँ एक-दूसरे की पूरक होती हैं। सभी व्यक्तियों एक समान नहीं होता है। एक ही सामाजिक परिस्थिति में अपने-अपने व्यक्तित्व के अनुसार व्यक्ति क्रियाएँ करते हैं। इस प्रकार पारसन्स कहता है कि वैयक्तिक विभिन्नताओं के कारण व्यक्तित्व व्यवस्था में विभिन्नता विकसित हो जाती है। इस दृष्टि से साधनों एवं लक्ष्यों को विभिन्नताओं के प्रभाव को स्पष्ट करते हुए पारसन्स लिखता है कि यह आवश्यक नहीं कि सभी समय समान साधन उपलब्ध हों। समाज मं विभिन्न साधन एक क्रिया को करने के लिए हो सकते हैं। व्यक्ति उन विभिन्न साधनों में से चयन करता है जिसके द्वारा वह अपनी क्रियाओं को संचालित करता है। इन साधनों की विभिन्नता को पारसन्स ने प्रतिमानित विविधता (Pattern Variables) कहा है। पारसन्स कहता है कि साधनों और उद्देश्यों की विविधता के समान मूल्यों और आदर्शों में भी भिन्नता पाई जा सकती है। ये सभी प्रतिमानों की विविधता को प्रभावित करते हैं।
(3) संदर्भ संरचना
यह पारसन्स के क्रिया सिद्धांत में प्रयुक्त एक नवीन अवधारणा है।
पारसन्स ने संदर्भ संरचना के अंतर्गत विभिन्न तत्वों को समाविष्ट किया है। उसके अनुसार इन सभी तत्वों का विश्लेषण भी क्रिया व्यवस्था के विश्लेषण के लिए आवश्यक है। इन तत्वों का उल्लेख करते हुए पारसन्स ने बताया है कि कर्ता, समूह, और परिस्थिति ये सब संदर्भ संरचना के आवश्यक तत्त्व हैं। क्रिया व्यवस्था के इन महत्वपूर्ण तत्वों की प्रकृति बतलाते हुए पारसन्स लिखता है कि इनमें सभी में परस्पर संबंध पाया जाता है। इस प्रकार पारसन्स कहता है कि इन सभी संदर्भ तत्वों के परस्पर संबंधों के संदर्भ में ही क्रिया-व्यस्था की व्याख्या की जा सकती है।
पारसन्स का संदर्भ संरचना का विचार जैननिकी से मिलता है। जैननिकी ने लिखा है कि समाज के व्यक्तियों की क्रियाओं का अध्ययन सामाजिक क्रियाओं सामाजिक कार्यों, सामाजिक संबंधों, सामाजिक समूहों और सामाजिक व्यक्तियों के संदर्भ में ही हो सकता है। इस विचार को पारसन्स ने नया रूप देकर संदर्भ संरचना के नाम से विश्लेषित करने की चेष्टा की है।
इस प्रकार पारसन्स ने 1937 ई. में प्रकाशित होने वाली अपनी रचना में उपर्युक्त विचारों की विवेचना की है।
इन विचारों को क्रिया की संदर्भ संरचना (Frame of Reference of Action) कह सकते हैं। इस विवेचना के बाद पारसन्स ने अपने क्रिया सिद्धांत पर आगे और कार्य किया। 1952 ई. में उसकी दूसरी रचना प्रकाशित हुई। इस रचना का नाम पारसन्स ने (सोशल सिस्टम ( ( Social System) रखा। इस रचना में पारसन्स ने अपने क्रिया के सिद्धांत को और आगे बढ़ाया है और उसे परिभाषित किया है। हम उक्त पुस्तक के संदर्भ में इस सिद्धांत पर आगे विचार करेंगे। इस पुस्तक के माध्यम से पारसन्स ने क्रिया-व्यवस्था से सामाजिक व्यवस्था को समझने का सुझाव दिया है। यही इस नवीन कार्य की विशेषता है।
क्रिया की परिभाषा करते हुए पारसन्स ने अपनी पुस्तक (सोशल सिस्टम ( लिखा है, (क्रिया कर्ता-परिस्थिति व्यवस्था में एक प्रक्रिया है। जिसका एक वैयक्तिक कला अथवा एक समूह के संदर्भ में उसके सदस्यों के लिए प्रेरणात्मक महत्व होता है।
यदि हम पारसन्स की पहली दी हुई क्रिया की परिभाषा का अवलोकन करें तो हमें प्रतीत होगा कि उसने इस परिभाषा में अनेक परिमार्जन सम्मिलित कर दिए हैं। इस दृष्टि से क्रिया के लिए पारसन्स ने प्रमुखतः तीन तत्व बताए हैं।
(1) कर्ता, (2) परिस्थिति (3) प्रेरणा । कर्ता के संबंध में स्पष्टीकरण देते हुए पारसन्स ने लिखा है कि (कर्ता) शब्द से हमारा तात्पर्य क्रिया करने वाले से है। इसके अंतर्गत व्यक्ति भी हो सकता है और समूह भी। परिस्थिति को उसने पहले वर्णित तत्वों के समान ही रखा है। अर्थात् कर्ता की क्रिया करने की दशाओं को पारसन्स ने परिस्थिति कहा है। अपने इस सिद्धांत में पारसन्स ने प्रेरणा के तत्व को नए रूप में सम्मिलित किया है। क्रिया को प्रेरणा देने वाली शक्तियों को पारसन्स ने प्रेरक कहा है। इस भाँति पारसन्स ने अनुसार क्रिया के लिए ये तीनों तत्व उल्लेखनीय हैं और इन तत्वों की व्याख्या के अभाव में सामाजिक व्यवस्था की विश्लेषण नहीं हो सकती है।
सामाजिक क्रिया के इस परिमार्जित सिद्धांत में पारसन्स ने प्रेरणा के तत्व को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना है। वह लिखता है कि प्रेरणा क्रिया की प्रकृति और रूप को निर्धारित करती है। (क्रिया) शब्द के अंतर्गत किसी आवश्यकता की पूर्ति और अवांछित चीजों का बहिष्कार ये दोनों तत्व सम्मिलित है। परंतु वांछित तथा अवांछित का निर्णय कर्ता का व्यक्तित्व करता है। वह अपने विवेक के आधार पर निश्चित करता है
कि किस आवश्यकता की पूर्ति के लिए क्रिया करनी चाहिए। इस प्रकार क्रिया की प्रेरक शक्तियों का उल्लेख करते हुए पारसन्स कहता है कि सामाजिक-सावयव भी क्रिया की एक प्रेरणा शक्ति है। परंतु वह सावयव-व्यवस्था की विश्लेषण को क्रिया-विश्लेषण के लिए आवश्यक नहीं माना है। पारसन्स लिखता है - "सामाजिक क्रिया सिद्धांत की दृष्टि से क्रिया तत्व का संगठन परिस्थिति से कर्ता के संबंध का प्रकार्य है। अतः पारसन्स को महत्वपूर्ण प्रेरक निर्धारित करता है।
सामाजिक क्रिया सिद्धांत को निष्कर्षणात्मक रूप में प्रस्तुत करते हुए पारसन्स ने इस प्रकार सामाजिक परिस्थिति के आधारभूत पक्षों की विवेचना की है। ये आधारभूत पक्ष की क्रिया में प्रेरणा का संचार करते हैं। इन आधारभूत पक्षों की विवेचना करते हुए पारसन्स ने व्यक्तित्व व्यवस्था को परिभाषित किया है। उसके अनुसार व्यक्तित्व व्यवस्था, व्यक्ति की आदतें, अभिवृत्तियाँ धारणाएँ, मूल्य आदि का संगठन हैं। व्यक्ति ही अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं को प्रकट करता है तथा उसकी पूर्ति के लिएण् क्रिया करता है। इस प्रकार अपनी सामाजिक व्यवस्था की विश्लेषणा में पारसन्स ने व्यक्ति को महत्वपूर्ण स्थान दिया है।
पारसन्स लिखता है कि क्रिया के लिए सांस्कृतिक व्यवस्था का भी महत्वपूर्ण स्थान है। उसका यह दृढ़ मत रहा है कि व्यवस्था ही प्रमाणिक करती है। व्यक्ति अपनी संस्कृति का अंग होता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व पर संस्कृति की छाप होती है। इसलिए पारसन्स यह कहता है कि व्यक्ति की क्रिया व्यवस्था में संस्कृति की व्यवस्था का गहरा प्रभाव पड़ता है। इन दोनों व्यवस्थाओं को एक एक संदर्भ में समझना आवश्यक है। संस्कृति व्यवस्था था को पारसन्स ने प्रतीकात्मक (Symbolic) व्यवस्था कहा है। वह लिखता है कि कुछ चिन्हों और प्रतीकों का एक ऐसा अर्थ विकसित हो जाता है जो व्यक्तियों और समूहों के बीच संचार में स्थान ले लेता है। इस प्रकार पारसन्स कहता है कि सांस्कृतिक-व्यवस्था, क्रिया व्यवस्था का एक अंग है।
यद्यपि सामाजिक व्यवस्था पारसन्स का प्रतिपाद्य विषय रहा है। उसने मुख्यतः अपनी (सोशल सिस्टम( नामक पुस्तक में इसी विषय पर व्यापक रूप से विचार किया है। सामाजिक व्यवस्था का उसने एक भिन्न सिद्धांत पारित किया है। इस सिद्धांत पर आगे हम विस्तार में विचार करेंगे।
इस प्रकार स्पष्ट है कि पारसन्स ने अपने इस क्रिया सिद्धांत में क्रिया के विभिन्न पक्षों पर विचार किया है। क्रिया की विश्लेषण के लिए उसका यह मत रहा है कि इन सभी तत्वों एवं आधारों की व्याख्या आवश्यक है। इस सिद्धांत के माध्यम से पारसन्स ने समाजशास्त्र के क्षेत्र में एक सुदृढ़ विश्लेषणात्मक पद्धति को प्रतिपादित किया है। यद्यपि विचारकों ने विभिन्न दृष्टियों से पारसन्स की आलोचना की है। विचारकों का मत है कि पारसन्स ने इस सिद्धांत में शब्द जाल का प्रपंच रच दिया है। पारसन्स ने क्रिया सिद्धांत में कठिन भाषा का प्रयोग किया है। एक छोटी बात को समझाने के लिए उसने बहुत विस्तार में विवेचना की है। तथापि हम पारसन्स के इस सिद्धांत को उसका महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय योगदान कह सकते हैं।
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