शोधार्थी के व्यवहार संबंधी गुण - Behavior Related Quality of Scholar

 शोधार्थी के व्यवहार संबंधी गुण - Behavior Related Quality of Scholar


मानसिक तथा शारीरिक योग्यताओं के साथ-साथ एक कामयाब शोधकर्ता के भीतर व्यवहार संबंधी योग्यताओं का भी होना बहुत आवश्यक माना जाता है, क्योंकि उसे वास्तविक व्यक्तियों से संपर्क स्थापित करना पड़ता है और उनमें विश्वास की भावना उत्पन्न करके अपने अध्ययन लक्ष्य के प्रति आकर्षित करके ही अध्ययन के विषय में तथ्यों को संचित करना पड़ता है। इस कार्य के लिए जरूरी है कि शोधकर्ता का आचार व्यवहार प्रभावशाली हो। तभी संभव है जब उसमें व्यवहार विषयक निम्नांकित हो -


(A) व्यवहार में अनुकूलनशीलता :


शोध के क्रम में एक शोधकर्ता को भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग व्यक्तित्व के स्वामी से सामाजिक शोध के क्रम में संबंध कायम करना होता है।

इसलिए केवल एक ही प्रकार का व्यवहार समान रूप से प्रभावित नहीं कर सकता है। जैसे गंभीर प्रकृति का व्यक्ति गंभीरता ही पसंद करेगा, तो हंसमुख व्यक्ति के लिए गंभीर व्यवहार अरुचिकर होगा। परंतु शोधकर्ता के लिए दोनों तरह के व्यक्तियों से सूचना अर्जित करना अति जरूरी होता है। अतः उसके व्यवहार में ऐसा लचीलापन होना चाहिए कि वह आवश्यकता और परिस्थिति के अनुसार विविध प्रकार के व्यक्ति के साथ अपना अनुकूलन सफलतापूर्वक कर सके। वही अपने व्यवहार के द्वारा उन्हें बहुत कुछ समान रूप से प्रभावित करके उनसे आंकड़ों का भंडारण कर सके। कर्ता को निरपेक्ष भाव से अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि एक शोधकर्ता शोध कार्य के दौरान अनुकूलन और प्रतिकूल दोनों प्रकार का विचार व्यक्त करने वाले लोगों के साथ समादर का व्यवहार रखें। 

(B) परिमार्जित व्यवहार:


व्यवहार संबंधी गुणों में शिष्टाचार पूर्व व्यवहार का स्थान सर्वप्रथम है। यदि किसी भी व्यक्ति का व्यवहार शिष्ट तथा परिमार्जित है तो वह दूसरे लोगों को अनुसंधान के महत्व से अवगत करा सकता है और इस काम में सफल होने पर वह किसी भी प्रकार के तथ्यों को या सूचनाओं को उनसे प्राप्त कर सकता है। इसलिए परिस्थितियों को समझते हुए शोधकर्ता को परिमार्जित व्यवहार करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। इस प्रकार एक उत्तम आचार-विचार और परिष्कृत व्यवहार का स्वामी ही सफल शोधकर्ता कहलाता है। 


(C) संतुलित वार्तालाप:


सूचना प्राप्त करने के लिए शोधकर्ता को प्रत्येक सूचनादाता से, जो प्रश्नावली स्वयं नहीं भर सकता, बातचीत करनी पड़ती है।

इस वार्तालाप के स्वरूप का भी प्रभाव सूचनादाता पर पड़ता है। अतः संतुलित वार्तालाप बहुत जरूरी है। शोधकर्ता अहंकारपूर्ण शब्द असंतुलित भाषा में वार्तालाप सूचनादाता के मन को ठेस पहुंचाने वाले शब्द इत्यादि शोधकार्य में बाधक होते हैं। अतः योग्य शोधकर्ता की भाषा अत्यंत संतुलित होनी चाहिए। 


(D) सजगता :


सामाजिक शोध में व्यक्ति को अत्यंत सतर्क एवं सावधान रहने की आवश्यकता होती है। कई बार ऐसे व्यक्ति की सूचना पर इतना अधिक विश्वास कर लिया जाता है जो वास्तव में सब कुछ असत्य बताने के लिए ही शोधकर्ता के अभिन्न मित्र या सहयोगी होने का सफल प्रयत्न करते हैं।

इस प्रकार के व्यक्तियों के प्रति यथासंभव सचेत रहना शोधकर्ता का एक जरूरी गुण होना चाहिए।


(E) आत्म नियंत्रण:


उत्तेजना, वास्तविकता से दूर ले जाने वाली प्रमुख शक्ति है। सामान्य स्थिति में ही व्यक्ति शांत मन से विचार करके उचित निर्णय ले सकता है। अतएव भाषा तथा वार्ता में संयम, चलने-फिरने, उठने बैठने, खाने-पीने में संयम, लोगों से मिलने-जुलने तथा संपर्क स्थापित करने में संयम, सूचना प्राप्त करने में संयम, सूचनादाता पर विश्वास करने में संयम, अर्थात शारीरिक तथा मानसिक व्यवहार में आत्मानियंत्रण रखते हुए सामाजिक शिष्टता. संसारिक मर्यादा तथा बौद्धिक संबद्धता की सीमाओं के अंतर्गत शोधकर्ता को कार्य करना चाहिए।