निदर्शन के लाभ एवं सीमाएं - Benefits and Limitations of Sampling
निदर्शन के लाभ एवं सीमाएं - Benefits and Limitations of Sampling
सामाजिक अध्ययनों में निदर्शन की उपयोगिता का उल्लेख करते हुए रोजजेंडर ने लिखा है कि
"निदर्शन को यदि सावधानी से प्राप्त किया जाए तो निदर्शन न केवल बहुत सस्ता रहता है बल्कि ऐसे परिणाम भी प्रस्तुत कर सकता है जो अत्यधिक यथार्थ होते हैं तथा कभी-कभी संगणना की तुलना में भी अधिक परीशुद्ध होते हैं। इस प्रकार लापरवाही से आयोजित कार्य में लाई जाने वाली संगणना विधि की तुलना में सावधानीपूर्वक चुना गया निदर्शन अधिक श्रेष्ठ होता है।" इस कथन के संदर्भ में निदर्शन की उपयोगिता अथवा इसके गुण-लाभों को अनेक क्षेत्रों में देखा जा सकता है :
(1) समय की बचत :
निदर्शन के अंतर्गत आने वाले कुछ इकाइयां संपूर्ण समग्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके फलस्वरूप किसी भी दूसरी विधि की तुलना में निदर्शन द्वारा अपेक्षाकृत कम समय में ही एक क्षेत्र अथवा समूह की समस्त विशेषताओं को समझना संभव हो जाता है।
गुड़े तथा हॉट के अनुसार, "निदर्शन का उपयोग एक वैज्ञानिक कार्यकर्ता के समय की बचत करके अध्ययन को अधिक वैज्ञानिक रूप प्रदान करता है।" वर्तमान परिवर्तनशील समाजों में निदर्शन द्वारा समय की बचत का कार्य और भी अधिक महत्वपूर्ण समझा जाने लगा है। सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करने के लिए यदि निदर्शन के आधार पर कुछ इकाइयों का चयन करके अध्ययन को संक्षिप्त न बनाया जाए तो अध्ययन से संबंधित निष्कर्ष प्राप्त करने से पहले ही सामाजिक घटनाएं इस सीमा तक बदल सकती हैं कि प्राप्त निष्कर्ष बिल्कुल ही अनुपयोगी प्रतीत होने लगे। इस प्रकार निदर्शन केवल समय की बचत ही नहीं करता बल्कि अध्ययन से संबंधित निष्कर्षों की सामयिक उपयोगिता को बनाए रखने में भी सहायता देता है।
(2) धन की बचत :
अध्ययन चाहे सरकारी क्षेत्र में किया जाना हो अथवा गैर सरकारी क्षेत्र में, प्रत्येक स्थिति में सीमित साधन अध्ययनकर्ता के मार्ग में एक बड़ी बाधा होते हैं।
निदर्शन एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा कम इकाइयों का अध्ययन करने के लिए कम अध्ययनकर्ताओं और कम साधनों की आवश्यकता होती है। इस स्थिति में अध्ययनकर्ता जो अतिरिक्त समय बचा लेता है. उसका कहीं अच्छा उपयोग अध्ययन से संबंधित इकाइयों का गहन अध्ययन करने तथा तथ्यों का विश्लेषण करने में किया जा सकता है। यही कारण है कि आज अधिकांश अध्ययन निदर्शन पर किए जाते हैं।
(3) गहन एवं सूक्ष्म अध्ययन :
किसी अध्ययन के लिए जब छोटे निदर्शन का उपयोग किया जाता है तो प्रत्येक इकाई का अत्यधिक गहन और सूक्ष्म अध्ययन करने के साथ ही प्राप्त सूचनाओं के यथार्थता की जांच करना भी संभव हो जाता है। अध्ययन से संबंधित इकाइयों की संख्या कम होने के कारण अध्ययनकर्ता प्रत्येक इकाई के विभिन्न पक्षों को देखकर कहीं अधिक व्यापक सूचनाएं प्रदान कर सकता है। यह लाभ संगणना विधि के अंतर्गत प्राप्त नहीं किया जा सकता।
(4) निष्कर्षों में यथार्थता:
कोई अध्ययन जब समग्र की सभी इकाइयों को लेकर किया जाता है तो अध्ययन में यथार्थता की संभावना उतनी ही कम हो जाती है। इसका कारण यह है कि न तो प्रत्येक क्षेत्र और प्रत्येक इकाई का सावधानी के साथ अध्ययन किया जा सकता है और न ही वैयक्तिक पक्षपात को पूर्णतया समाप्त किया जा सकता है। निदर्शन के अंतर्गत अध्ययन एक या कुछ अध्ययनकर्ताओं द्वारा ही किया जा सकता है तथा इकाइयों की संख्या कम होने के कारण अध्ययन के प्रति उदासीनता भी उत्पन्न नहीं हो पाती। इसके फलस्वरूप सूचनाओं के संकलन में त्रुटियां होने की संभावना बहुत कम रह जाती हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे अध्ययन कहीं अधिक वस्तुनिष्ठ अथवा यथार्थ होते हैं।
(5) प्रशासकीय सुविधा:
निदर्शन पद्धति द्वारा किया जाने वाला अध्ययन प्रशासकीय दृष्टिकोण से अधिक सुविधाजनक होता है। वास्तबिकता यह है कि प्रशासकीय तंत्र चाहे कितना भी बड़ा क्यों ना हो,
उसके द्वारा संपूर्ण जनसंख्या का अध्ययन कर सकना अत्यधिक कठिन होता है। जनगणना विधि के द्वारा यद्यपि संपूर्ण जनसंख्या का अध्ययन करने का दावा किया जाता है लेकिन ऐसा अध्ययन कितना अधिक अकुशल और अपूर्ण होता है, यह सर्वविदित है। निदर्शन के द्वारा अध्ययन का कार्य कम कार्यकर्ताओं द्वारा संभव हो जाने के कारण उनके प्रशिक्षण और निरीक्षण से संबंधित कोई जटिल समस्या उत्पन्न नहीं होती। यही कारण है कि अक्सर सरकारी स्तर पर किए जाने वाले अध्ययनों में भी अब निदर्शन पद्धति को ही अधिक उपयोगी समझा जाने लगा है।
(6) विशेष दशाओं में उपयुक्त :
अनेक अध्ययन विषय ऐसे क्षेत्र अथवा व्यक्तियों से संबंधित होते हैं
जिनमें निदर्शन का उपयोग किए बिना उपयोगी तथ्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिए, यदि अध्ययन क्षेत्र बहुत विशाल होता है अथवा भौगोलिक रूप से विषय से संबंधित व्यक्ति बहुत दूर-दूर तक बिखरे हुए होते हैं तो निदर्शन के द्वारा ही कुछ इकाइयों से संपर्क स्थापित करना संभव हो पाता है। इसके अतिरिक्त, यदि अध्ययन विषय से संबंधित विभिन्न दिशाओं में तेजी से परिवर्तन होता रहता हो तो भी निदर्शन के द्वारा ही कम समय में उनका अध्ययन करके उपयोगी निष्कर्ष दिए जा सकते हैं।
(7) लोच का गुण :
निदर्शन विधि में लोच का गुण होना इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता है।
निदर्शन के अंतर्गत अध्ययन की इकाइयों की संख्या कम हो जाने के कारण यह संभव हो जाता है कि आवश्यकतानुसार उनमें कमी अथवा वृद्धि की जा सके। यदि निदर्शन से संबंधित कोई इकाई बिल्कुल अनुपयुक्त अथवा अव्यावहारिक प्रतीत होती है तो उसके स्थान पर दूसरी इकाई का चयन किया जा सकता है। इस आधार पर भी निदर्शन को सामाजिक अध्ययनों के लिए एक उपयोगी विधि के रूप में देखा जाता है।
सामाजिक अध्ययनों के लिए निदर्शन का उपयोग एक औषधि के समान है जिसके लाभ इसके अत्यधिक सावधानीपूर्वक उपयोग के द्वारा ही प्राप्त किए जा सकते हैं। जिस प्रकार औषधि का दोषपूर्ण उपयोग कभी-कभी अत्यधिक घातक सिद्ध होता है उसी प्रकार निदर्शन के उपयोग में की जाने वाली और असावधानी संपूर्ण अध्ययन को दोषपूर्ण बना सकती है। इस दृष्टिकोण से निदर्शन से संबंधित उन दोषों तथा सीमाओं को समझना आवश्यक है जो अक्सर अध्ययन में वैयक्तिक पक्षपात तथा अपूर्णता की समस्या उत्पन्न कर देते हैं।
(1) प्रतिनिधि निदर्शन में कठिनाई:
निदर्शन के आधार पर केवल तभी यथार्थ निष्कर्ष प्राप्त किए जा सकते हैं, जबकि निदर्शन समय का वास्तविक प्रतिनिधित्व करता हो। इसके विपरीत, अध्ययन विषय से संबंधित सामाजिक इकाइयों में इतनी अधिक विविधता होती है कि सभी विशेषताओं वाली इकाइयों का निदर्शन में समावेश हो सकना कभी-कभी बहुत कठिन हो जाता है। ऐसा निदर्शन किसी भी प्रकार विश्वसनीय निष्कर्ष देने में सफल नहीं हो पाता।
(2) अभिनति की संभावना :
निदर्शन के चुनाव में अध्ययनकर्ता का सदैव तटस्थ होना तथा स्वीकृत नियमों का पालन करना आवश्यक नहीं होता।
अध्ययनकर्ता साधारणतया अपनी सुविधा के अनुसार ही निदर्शन में आने वाली इकाइयों का चुनाव कर लेता है। कभी-कभी वह इकाइयों का चयन इस प्रकार करने का प्रयत्न करता है जिससे उसके व्यक्तिगत विचारों में अथवा धारणाओं को ही प्रमाणित किया जा सके। ऐसी सभी दशाओं में निदर्शन दोषपूर्ण अध्ययन का स्रोत बन जाता है।
(3) पर्याप्त ज्ञान का अभाव :
एक प्रतिनिधि निदर्शन चुनाव के लिए अध्ययन विषय के गहरे ज्ञान और वैयक्तिक सूझ-बूझ की आवश्यकता होती है। प्राय: यह देखने को मिलता है
कि निदर्शन का चुनाव करने वाले अध्ययनकर्ता में विषय का इतना ज्ञान और अंतदृष्टि नहीं होती कि वह एक प्रतिनिधि निदर्शन प्राप्त कर सके। इस संबंध में एक प्रमुख कठिनाई यह है कि व्यावहारिक रूप से निदर्शन का चुनाव अध्ययन के आरंभिक स्तर पर ही कर लिया जाता है। जिस स्तर पर अध्ययनकर्ता स्वयं विषय के अनेक पक्षों से परिचित नहीं होता। बाद में जब उसे निदर्शन की कमियों का अनुभव होता है, तब तक वह इसमें कोई परिवर्तन कर सकने में स्वयं को पूर्णतया असहाय पाता है।
(4) निदर्शन पर स्थिर रहना कठिन
निदर्शन के आधार पर किए जाने वाले अध्ययन में यह आवश्यक होता है कि संपूर्ण अध्ययन केवल निदर्शन से संबंधित इकाइयों तक ही सीमित हो।
परंतु व्यवहार में यह एक कठिन कार्य है। इसका कारण यह है कि निदर्शन में अक्सर ऐसे व्यक्तियों का समावेश हो जाता है जिनके स्थानांतरण, बीमारी, असहयोग अथवा भौगोलिक पृथकता आदि के कारण उनसे संपर्क स्थापित करना कठिन हो जाता है। इस स्थिति में अध्ययनकर्ता के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह निदर्शन से संबंधित इकाइयों की संख्या को बनाए रखने के लिए कुछ नए व्यक्तियों का चुनाव कर ले। निदर्शन के उपयोग से संबंधित नियमों में भी अध्ययनकर्ता को यह सुझाव दिया जाता है कि यदि किन्ही कारणों से कोई व्यक्ति संपर्क के लिए सुलभ न हो तो एक पूरक सूची में से किसी अन्य व्यक्ति का चुनाव कर लिया जाए। वास्तव में, ऐसी किसी भी व्यवस्था से वैयक्तिक पक्ष की संभावना को पूर्णतया दूर कर सकना संभव नहीं हो पाता। यह स्थिति स्वयं निदर्शन विधि की प्रक्रिया से संबंधित एक महत्वपूर्ण दोष स्पष्ट करती है।
(5) निदर्शन सार्वभौमिक विधि नहीं है :
जिस प्रकार कुछ विशेष परिस्थितियों में संगणना विधि उपयुक्त नहीं होती, उसी प्रकार कुछ परिस्थितियां ऐसी भी होती हैं जिनमें निदर्शन विधि अनुपयुक्त और अपर्याप्त हो जाती है। उदाहरण के लिए, यदि अध्ययन क्षेत्र की जनसंख्या बहुत सीमित हो अथवा एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न अनेक प्रकार की विशेषताओं को प्रदर्शित करती हो. तो एक प्रतिनिधिपूर्ण निदर्शन का चुनाव बहुत कठिन हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि सभी प्रकार के अध्ययन विषय तथा क्षेत्रों में निदर्शन का उपयोग एक सार्वभौमिक विधि के रूप में नहीं किया जा सकता।
(6) निदर्शन संबंधी जटिलताएं :
निदर्शन का चुनाव एक अत्यधिक जटिल प्रक्रिया है।
यह निर्धारित करना बहुत कठिन कार्य है कि निदर्शन का आकार क्या हो. निदर्शन के अंतर्गत किन-किन विशेषताओं वाली इकाइयों का समावेश किया जाए तथा प्रत्येक श्रेणी की इकाइयों का चयन किस नियम के आधार पर किया जाए। अध्ययन से संबंधित इकाइयां भिन्न-भिन्न विशेषताओं से युक्त होने की स्थिति में अक्सर दो या तीन स्तरों पर पृथक पृथक निदर्शनों का चयन करना आवश्यक हो जाता है। ऐसी सभी निदर्शनों द्वारा प्राप्त सूचनाओं का समन्वय करना और उनके आधार पर वस्तुनिष्ठ निष्कर्ष दे सकना एक कठिन कार्य है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि निदर्शन की प्रक्रिया में कुछ दोष अवश्य हैं जिनके कारण इसके प्रयोग में बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है। एक अध्ययनकर्ता जितना अधिक प्रशिक्षित, अनुभवी तथा कुशल होता है, वह इन दोनों के प्रभाव को उतना ही कम करके निदर्शन के द्वारा यथार्थ तथ्यों के संकलन में सफलता प्राप्त कर लेता है।
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