भील जनजाति - Bhil tribe
भील जनजाति - Bhil tribe
भील जनजाति की प्रमुख उप-जनजातियां (Sub group) निम्न प्रकार हैं- गमेटिया, कलारिया, माया भील, डूंगरी गयसिया, भिलाला, मावची, तड़वी, वसावे, बरेलिया, मीना, पटेलिया।
भारत की दूसरी बड़ी जनजाति भील, पूरे पश्चिमी भारत में फैली हुई है, परंतु इसका मुख्य केंद्रण दक्षिणी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, गुजरात एवं उत्तरी महाराष्ट्र में है। भील जनजाति के सदस्य त्रिपुरा में भी निवास करते हैं, जो कि चाय के बगानों में, अप्रवासी श्रमिकों की तरह काम करते हैं। संस्कृत साहित्य में भील' शब्द का अर्थ है भेदना या बेधना। द्रविड़ियन शब्द 'वील' का शाब्दिक अर्थ है धनुष अथवा धनुष एवं तीर धारण करने वाला व्यक्ति। भील जनजाति के लोग आपस में भीली बोली' में संवाद करते हैं जो 'इण्डो- आर्यन भाषा परिवार की बोली है। यद्यपि वे दूसरी क्षेत्रीय बोली एवं भाषा भी बोलते हैं, जैसे राजस्थानी, गुजराती, मराठी, हिंदी आदि ।
भील जनजाति की उत्पत्ति से संबंधित विद्धानों में मतभेद है। टॉड (1881) के अनुसार भील अरावली पर्वत श्रृंखला के मूल निवासी हैं।
यह जनजाति आज भी इसी क्षेत्र में ज्यादा सकेंद्रित है। रसेल एवं हीरालाल (1916) के अनुसार “भील" राजस्थान, गुजरात एवं मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में शासन करते थे (कुषलगढ़, बांसवाड़ा, कोटा, सगबुरा, रेबाकांता इत्यादि) जिनके स्थान पर राजपूतों ने अपने राज्य स्थापित किया। भील एवं राजपूतों में संघर्ष एवं सहयोग के उदाहण इतिहास में मिलते हैं। महाराणा प्रताप को भीलों के सहयोग के सर्वाधिक उदाहण मिलते है। इसके बदले राजपूत शासक भी उन्हें सहयोग एवं सम्मानित करते थे। मेवाड़ के राज्य चिन्ह में, एक तरफ भील कबीले के मुखिया (भीलू रागा) एवं दूसरे तरफ महराणा प्रताप तथा मध्य में चित्तौड़ के किला को दर्शाया गया है। बहुत से राजपूत राज्यों के, राजतिलक समारोह में भी, भील महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, उदयपुर, कुषलगढ़, राजपीपला इत्यादि राज्यों में राजा के राजतिलक में, भील मुखिया के अंगूठे के रक्त से तिलक लगाया जाता था। राजपूत शासक जनजातीय कबीलों के मुखिया (गमेटी) का चुनाव करते थे, भीलों के बीच भी राजनैतिक रूप से राजपूत शासकों का महत्वपूर्ण हस्तक्षेप था। इस प्रकार राजपूतों एवं भीलों के प्रगाढ़ संबंधों का हस्तक्षेप मिलता है।
भील जनजाति पर हुए जैव-मानव वैज्ञानिक अध्ययन स्पष्ट करते हैं कि भील सामान्यतः छोटे, एवं मध्यम कद के होते हैं, इनके चेहरे का आकार गोल अथवा चपटा होता है तथा नाक चपटी होती है। भील जनजाति को उसके क्षेत्र, नातेदारी, संस्कृति, एवं धर्म के आधार पर एक विशेष सामाजिक समूह माना जाता है। भील में सामान्य तौर एकल (केंन्द्रीय परिवार) होते हैं। परंतु ये बहुपत्नी विवाह वाले परिवार होते हैं। विवाह, ज्यादातर एक विवाही ही होते हैं, परंतु बहुपत्नी विवाह भी प्रचलित हैं। विवाह में वधू मूल्य (दापा) का प्रचलन हैं।
रक्त संबंधो पर आधारित नातेदारी से जुड़े साथियों का संगठन "कुटम" कहलाता है, एक कुटम के में जन्म, विवाह, मृत्यु इत्यादि में एक-दूसरे की सहायता करते हैं। भील परिवार समान गोत्र वाले एक टोले (मोहल्ले) में रहते हैं, जिसे फलिया कहा जाता है। ये खेड़ा वहिर्विवाह के नियम को मानते हैं, अर्थात एक फलिया के अदंर व्यक्ति विवाह नहीं करते। दूसरा बड़ा क्षेत्रीय संगठन “पाल” कहलाता है, जो कुछ फलिया के संगठन से बनता है।
सामान्यतः पाल की प्रकृति बहु गोत्री है, इनमें अंतर्विवाह हो सकता है। सामाजिक अनुशस्ति, गोत्र, टोटम एवं टैबू आदि के आधार पर ये सामाजिक समग्रता एवं एकता (Intregration & Solidarity) का अनुभव करते हैं।
पाल की परंपराओं की अधिक जानकारी रखने वाले (Pal dwellers) पलिया भील कहलाते हैं, पाल के बाहर कलिया भील कहलाते हैं। पलिया भील सामाजिक रूप से स्वरूप को, कलिया भील से श्रेष्ठ समझते है, एवं उजले भील तथा कलिया भील को मैसे भील कहते हैं। पालिया एवं कलिया भील अपने अपने समूह में अंतर्विवाह का पालन करते हैं। सामाजिक-राजनैतिक रूप से समुदाय में जो महत्वपूर्ण प्रस्थिति एवं भूमिका है वे हैं गमेटी (गांव का प्रमुख), भगत (धार्मिक क्रियाकलाप कराने वाला) प्रमुख है।
गमेटी समुदाय का नेता, निर्देशक एवं दार्शनिक होता है। भील समुदाय में, अलग से ग्राम परिषद का संगठन नहीं किया जाता, बल्कि पूरे गांव के अंदर किसी विवाद पर गमेटी निर्णय लेता है, जिसमें वह गांव के बुर्जुगों के विचार भी लेता है। किसी धार्मिक मामले में वह गांव के भगत (Priest) ओझा, (Medicinal man) एवं भोपा (Witch- Finder) के साथ विचार-विमर्श कर निर्णय लेता है। सामान्य रूप से भोपा, अलौकिक शक्तियों के जानकार के रूप में स्वयं को श्रेष्ठ समझता है।
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