शिक्षा में राज्य का कार्य - State function in education
शिक्षा में राज्य का कार्य - State function in education
चूंकि शिक्षा एक अनिवार्य सामाजिक कार्य है अतः राज्य उसके प्रति उपेक्षा वृति नहीं अपना सकता। इसके विपरीत शिक्षा से संबन्धित प्रत्येक वस्तु को इसके प्रभाव के आगे झुकना चाहिए। “यह राज्य का कार्य है कि वह उन आवश्यक सिद्धांतों की रूपरेखा प्रस्तुत करे जिन्हें वह पाठशालाओं में पढ़वाया जाना आवश्यक समझता है और यह देखे कि उन्हें उचित सम्मान प्रदान किया जाता है।
“एक अध्यापक उस समय अपने कर्तव्य से च्युत हो जाता है जबकि वह अपने अधिकार का उपयोग अपनी पूर्व निर्धारित सम्मतियों से अपने शिष्यों को प्रभावित करने में करता है, चाहे वे सम्मतियों उसे कितनी भी अधिक न्यायसंगत प्रतीत होती हों।"
शिक्षक :
“जिस प्रकर से पुजारी अपने देवता का दुभाषिया होता है उसी प्रकार से शिक्षक अपने समय व अपने देश के महान नैतिक विचारों का व्याख्याकार या दुभाषिया होता है।
शिक्षा का आदर्श:
"भूतकाल की ही भांति वर्तमान में भी हमारा शैक्षिक आदर्श अपने प्रत्येक अर्थ में समाज का ही कार्य होता है। यह समाज ही है जो हमारे लिए इस प्रकार के व्यक्ति के चित्र चित्रित करता है। जिसे हम चाहते हैं, उस चित्र में उस समाज की व्यवस्था की सभी विशेषताएँ प्रतिबिम्बित होती हैं”।
पाठशाला
जितनी अच्छी तरह से हम समाज को समझेंगे उतनी ही अच्छी तरह से हम पाठशाला रूपी समाज के सूक्ष्म रूप में होने वाली सभी बातों का स्पष्टीकरण कर सकेंगे।
अपनी पुस्तक 'Moral Education' में दुर्खीम ने अपनी सम्पूर्ण शिक्षा समाजशास्त्रीय विचारधारा को इस महत्वपूर्ण कथनांश में प्रस्तुत किया है। “सबसे बड़ी बात तो यह है कि शिक्षा सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति का एक सामाजिक साधन है ऐसा साधन जिससे समाज अपने अस्तित्व को सुनिश्चित करता है। शिक्षा समाज का अभिकर्ता या एजेंट है, वह सांस्कृतिक संचार की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी है। यह उसी का कार्य है कि वह एक सामाजिक या नैतिक व्यक्ति की रचना करता है। यह शिक्षा का कार्य और गौरव है। शिक्षा एक नया व्यक्ति बनती है।"
जब हम उपर्युक्त कथनानशों पर विचार करना आरंभ करते हैं तो कई बातें पूर्णतया स्पष्ट हो जाती हैं। दुर्खीम की विचारधारा के अनुसार शिक्षा को समाजीकरण की प्रक्रिया ही माना जा सकता है।
लेकिन यहाँ यह बात स्मरण रखने की है कि किसी भी प्रकार के निश्चित समाजीकरण को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार समाजीकरण ऐसा ही होना चाहिए जिसे समाज के बड़े-बुढ़े व राज्य पसंद करते हैं। वे तो निःसंदेह पहले से चली आ रही परम्पराओं रीति-रिवाजों व्यवहार के प्रतिमान को ही पसंद करेंगे, क्योंकि ऐसा करना ही समाज के हित में है। उनके अनुसार व्यक्तियों के लिए सामाजिक व सांस्कृतिक आदत के रूप में व्यवहार करना सरल होता है। इनके अनुसार व्यवहार करने से उस समाज के सदस्य अन्य समाज के सदस्यों से भिन्न होते हैं। समाज का अस्तित्व इस प्रकार से चलता रहता है कि व्यक्ति को भी सुगमतापूर्वक अपने पूर्वजों की जीवन-योजना अथवा जीवन के मानचित्र के आधार पर अपना जीवन यापन करना सुगम होता है।
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