ब्राह्मणवादी पितृसत्ता - brahminical patriarchy

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता - brahminical patriarchy


जाति और जेंडर के इस जुड़ाव को ध्यान में रखते हुए प्रख्यात स्त्रीवादी इतिहासकर उमा चक्रवर्ती ने ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की सैद्धांतिकी विकसित की जो जाति आधारित समाज-व्यवस्था की पितृसत्ता है। उनके शब्दों में- 


यह स्त्री पराधीनता के विभिन्न रूपों में से कोई एक रूप भर नहीं, बल्कि हिंदू समाज और जाति आधारित व्यवस्था से आबद्ध खास संरचना है। भारत के अधिकतर क्षेत्रों में जड़ जमा चुकी इस पितृसत्तात्मक संरचना की अलग पहचान चिह्नित करने के लिए ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का प्रयोग उचित है। यह वस्तुतः नियमों और संस्थानों का ऐसा पुंज है, जिसमें जाति और जेंडर एक-दूसरे से गुथे हुए हैं और एक-दूसरे का स्वरूप तय करते हैं: जिसमें स्त्री जातियों के बीच का पदानुक्रम बनाए रखने के लिए बतौर साधन इस्तेमाल होती है। इसने ऐसे कायदे बना रखे हैं कि दायराबद्ध विवाह-वृत्तों की पदानुक्रमता का उल्लंघन हुए बिना जाति व्यवस्था का पुनरुत्पादन होता रहे। जाति की स्थिति और तदजन्य रुतबे (शुद्ध/अशुद्ध) के अनुसार ही उसकी स्त्रियों के लिए कायदे तय किए गए हैं। इन कायदों को तय करने का अधिकार ऊँची जातियों के पास रहा है। यह पतिव्रता और साध्वी स्त्रियों के महिमामंडन द्वारा स्त्रियों से उनकी अपनी ही अधीनता के लिए सहमति प्राप्त करती है।

जरूरत पड़ने पर इसने दंड की भी व्यवस्था कर रखी है। संक्षेप में कहें तो ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ब्राह्मणवादी आचार संहिताओं में प्रस्तावित कायदों का स्थूल रूप है जिसे राजा अथवा उसका प्रतिनिधि लादते रहे हैं। आनुष्ठानिक हैसियत उठाने के लिए निम्न जातियाँ अकसर इन कायदों का अनुसरण करना शुरू कर देती हैं। इस क्रम में वे यह नहीं समझ पातीं कि उच्च और निम्न जातियों की स्त्रियों के लिए विवाह और यौन संबंधी अलग-अलग कायदों का ऊँची जातियों द्वारा निम्न जातियों के श्रम के दोहन से गहरा संबंध है। यह इस बात की व्याख्या करता है कि क्यों एक तरफ तो ऊँची जातियों में विधवा पुर्नविवाह भी निषिद्ध है और दूसरी तरफ निम्न जातियों की स्त्रियों के लिए पुनर्विवाह ही नहीं, बल्कि उनसे जबरन सहवास तक की संभावना खुली रखी गई। श्रम दोहन जाति-व्यवस्था का मूल मंतव्य है इसी कारण जेंडर आधारित कायदे बनाए गए ताकि ऊँची जातियों का हित सध सके।


प्रत्येक जाति की अपनी आनुष्ठानिक खासियत है यानि शुद्ध/अशुद्ध के पैमाने पर उसका एक नियत स्थान है, इसलिए यहाँ न केवल पितृवंशीयता, बल्कि आनुष्ठानिकता की निरंतरता का भी ख्याल रखना ज़रूरी हो जाता है।

यही वजह है कि एक निश्चित दायरे के भीतर विवाह-संबंध न कायम किया जाए यानि बहिर्विवाह (एग्जोगेमी) की रीति तो प्रायः सभी व्यवस्थाओं में रही है, लेकिन एक निश्चित दायरे के भीतर ही विवाह होना चाहिए यानि अंतर्विवाह अथवा सजातीय विवाह की अनिवार्यता केवल जाति समाज की खासियत है। यहाँ यह धारणा व्याप्त है कि संतान का रक्त यानि उसकी शुद्धता/आनुष्ठानिकता द्विआयामी होती है। दूसरे शब्दों में, संतान का रक्त माता और पिता दोनों के ही रक्त से निर्धारित होता है इसलिए माता और पिता दोनों का ही समान रक्त-स्तर यानि एक ही जाति से होना ज़रूरी है। यही कारण है कि प्रतिलोम संबंध यानि निम्नजाति के पुरुष और ऊँची जाति की स्त्री के बीच संबंध मात्र की कल्पना आतंक पैदा करने वाली रही है। इसलिए प्रतिलोम संबंध रोकने के लिए उसकी यौनिकता के नियंत्रण के उद्देश्य से विधि संहिताएँ रची गई और उसे लागू करने की जिम्मेदारी राज्य की रही। नुर यलमान के अध्ययन से यह बात उभर कर सामने आई है कि हाल तक प्रतिलोम संबंधों से जन्मी संतानें और उनकी माएँ या तो डुबाकर मार दी जाती रही हैं या जाति-बहिष्कार और जाति-से जुड़े विशेषाधिकारों को खोने का दंड भोगती रही हैं।


दरअसल, हिंदू समाज व्यवस्था का मूल मकसद दायराबद्ध/सीमांकित संरचनाओं (क्लोज्ड स्ट्रक्चर) का निर्माण करना रहा है ताकि जमीन, स्त्री और आनुष्ठानिक खासियत संरक्षित रखी जा सके। आनुष्ठानिकता के स्त्री की शुद्धता पर टिके होने और स्त्री की शुद्धता के उसकी यौनिकता में आबद्ध होने की मान्यता के कारण ब्राह्मणवादी पितृसत्ता में ऊँची जाति की स्त्री, उसमें भी खासकर, ब्राह्मण स्त्री की यौनिकता के कठोर नियंत्रण की व्यवस्था रही है। ऊँची जाति की स्त्री पर ही जाति व्यवस्था के बने रहने का दारोमदार है। वह जाति व्यवस्था का प्रवेश द्वार है। बाल विवाह, विधवा-पुनर्विवाह पर पाबंदी और पतिव्रता धर्म का पालन (जिसमें सती होना भी शामिल था ) ऊँची जाति की स्त्री की यौनिकता पर लगाम कसने के ही तो उपक्रम रहे हैं। पतिव्रता की धारणा का ईजाद किया जाना ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को दीर्घजीवी बनाने के लिहाज से बड़ी महत्वपूर्ण परिघटना सिद्ध हुई। यह धारणा स्त्रियों के दिलो-दिमाग में गहरी पैठ बनाने में कामयाब रही। आखिर इससे ज़्यादा आदर्श स्थिति किसी पितृसत्ता के लिए और क्या हो सकती है कि स्त्री खुद ही अपनी यौनिकता का नियंत्रण करे और ऐसा करके गौरवान्वित भी महसूस करे। इस तरह की मिसाल शायद ही किसी अन्य पितृसत्ता में दिखाई दे।


पतिव्रता के निर्वाह के मामले में जाति-व्यवस्था के सोपान में नीचे की ओर उतरने के क्रम में कठोरता की डिग्री भी घटती जाती है। कारण, स्त्री जिस जाति की है उस जाति की आनुष्ठानिक स्थिति के अनुसार ही उसकी शुद्धता यानि यौनिकता के नियंत्रण की कठोरता /नरमी तय होती है। अंबेडकर के इस संबंध में किए विचार का पहले ही जिक्र किया जा चुका है। निम्न जातियों, उनमें भी खासकर दलित-बहुजन स्त्रियों की यौनिकता पर बंदिशें न होने का सीधा संबंध श्रम के सहज और सस्ते में उपलब्ध होते रहने से रहा है। यह दलित स्त्रियों की आपबीती और उनके मुखर होकर सामने आने से स्पष्ट होकर उद्घाटित हुआ है। दरअसल, दलित स्त्रियों को एक साथ त्रिस्तरीय शोषण की मार झेलनी पड़ती है:


1. स्त्री के रूप में घर में अपने पुरुष और बाहर ऊँची जातियों के पुरूषों द्वारा पितृसत्तात्मक शोषण ।


2. ऊँची जातियों के पुरूषों का जाति आधारित शोषण (बलात्कार) ।


3. श्रमिक के रूप में वर्गाधारित शोषण (भूस्वामी प्रायः ऊँची और मध्य जातियों के ही होते हैं।)


स्वरूप रानी के शब्दों में इसकी बड़ी ही सटीक अभिव्यक्ति हुई है:-


अरे हाँ..... अपनी जिंदगी को मैंने जिया कब ?

घर में पुरूषाहंकार एक गाल पर थप्पर मारता है

तो गली में वर्ण आधिपत्य दूसरे गाल पर चोट करता है।


ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का एक और पहलू गौरतलब है जिसका संबंध दलित पितृसत्ता से है। दलितों के शोषण का एक महत्वपूर्ण पक्ष ऊँची जातियों के पुरूषों द्वारा दलित पुरूषों के पुरुषत्व की खिल्ली उड़ाना भी रहा है।

दलित स्त्रियों का श्रमिक के रूप में घर से बाहर निकल कर काम करने की मजबूरी के कारण अथवा जाति व्यवस्था द्वारा उनकी यौनिकता को शुद्धता अथवा इज्जत की वस्तु न मानने के कारण वे ऊँची जातियों के पुरुषों की हवस का आसान शिकर बनती रही हैं। ऊँची जातियों के पुरुष अपने इस कृत्य को दलित पुरूषों को विपुंसीकृत करने के रूप में प्रस्तुत कर मूँछ ऐंठते रहते हैं। एक धारणा यह है कि अपनी इस प्रतीकात्मक 'विपुंसीकरण' की भरपाई दलित पुरुष घरेलू स्तर पर अपनी स्त्री के ऊपर पुरुषत्व की आजमाइश करके करते हैं। दूसरी धारणा के मुताबिक घर के दायरे में मर्दानगी दिखाने के साथ-साथ दलित पुरुष बाहरी दायरे में भी अपने विपुंसीकरण को धता बताने के क्रम में ऊँची जातियों की स्त्रियों से बदसलूकी से पेश आकर उग्र पुरुषत्व अपनाने की ओर बढ़े चले जाते है। दलित पुरुषों द्वारा इस तरह से प्रतिक्रिया में आकर उग्र पुरुषत्व को गले लगाने का खामियाजा भी अंततः दलित और गैर-दलित (ऊँची जातियों/मध्य जातियों) स्त्रियों को ही भुगतना पड़ा है। एस. आनंदी के कार्य से जाति और जेंडर के बीच के जुड़ाव का यह पहलू स्पष्ट होकर सामने आया है।


प्रेम चौधरी के जाट-समाज पर विशद अध्ययन से यह जाहिर होता है

कि कृषक समाज में पितृसत्ता के साथ कुछ खासियतें जुड़ जाती हैं, लेकिन उद्देश्य अंततः स्त्री की यौनिकता और प्रजनन क्षमता पर नियंत्रण करना ही रहता है। मिसाल के लिए, विधवा पुनर्विवाह की रीति। ऊपरी तौर पर तो इसे स्त्री की अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। लेकिन 'करेवा', 'कराओ' अथवा 'चद्दर अंदाजी' नाम से प्रचलित इस रीति में विधवा स्त्री की मर्जी के लिए कोई जगह न थी। पति की मृत्यु के उपरांत खासकर देवर, अन्यथा जेठ और यहाँ तक कि श्वसुर के साथ विधवा को ब्याहने का मकसद संपत्ति और श्रम का संरक्षण करना था। पति की मृत्यु के बाद उसके हिस्से की संपत्ति की उत्तराधिकारी विधवा संपत्ति के साथ अपनी इच्छा से कोई भी छेड़छाड़ न करे अथवा उस संपत्ति के बल पर स्वच्छंद जीवन जीने की न सोचे, इसके लिए ही उसे परिवार के ही किसी भी पुरुष सदस्य भले ही वह देवर हो और बच्चा हो अथवा जेठ या श्वसुर के रूप में उम्र दराज हो के साथ जबरन बांध दिया जाता था। इससे उसकी श्रमशक्ति भी संरक्षित रह जाती थी। आखिर कृषक समाज में स्त्रियाँ घर से लेकर बाहर खेतों तक बहुत सारे काम करती हैं। करेवा के जरिए यौन और संपत्ति पर नियंत्रण के उपक्रम का विधवाओं के विरोध का तरीका अनूठा था। प्रेम चौधरी ने ऐसे कई मामलों का ज़िक्र किया है जिनसे जाहिर होता है कि ऐसी कई विधवाएं थीं जिन्हें बदचलन कहलाना, अवैध संतान की माँ कहलाना मंजूर था, लेकिन पति की मृत्यु से प्राप्त यौन और आर्थिक स्वतंत्रता का अवसर हाथ से जाने देना गंवारा नहीं था।


लीला दुबे ने इस तथ्य का उद्घाटन किया है कि किस तरह किसी जाति के लिए निर्धारित पेशे, पहनावे, खान-पान, विवाह और यौन संबंधी आचार-व्यवहार का अक्षुण्ण रहना और इस तरह उक्त जाति का एक दायराबद्ध इकाई के रूप में पुनरुत्पादन और इसलिए जाति-व्यवस्था की निरंतरता उक्त जाति की स्त्रियों पर निर्भर करती है। मिसाल के लिए, यदि जातीय पेशे की ही बात करें तो खेती करने वाली जातियों और धोबी, नाई, चमार बुनकर, कुम्हार आदि जैसी पारंपरिक पेशेवर जातियों के पेशे की निरंतरता की इनकी स्त्रियों के बिना कल्पना ही नहीं की जा सकती। इन जातियों की स्त्रियाँ और बच्चे घर के काम-काज से लेकर पुरुषों के काम में भी हाथ बँटाते हैं। बुनकर और कुम्हार स्त्रियाँ तो तैयार माल बेचने का काम भी करती हैं। उत्तर भारत में नाई स्त्रियाँ अपने जजमान के घरों की स्त्रियों के नाखून काटने, पैर रंगने, नवजात शिशु और मां का तेल मालिश करने और विवाह के वक्त वधू की परिचारिका-संगी की भूमिका निभाने जैसे महत्वपूर्ण कार्य करती हैं।

इसी तरह, दक्षिण भारत में लड़की के प्रथम मासिक स्राव के अवसर पर होने वाला अनुष्ठान धोबिन द्वारा कपड़े धोने के बिना संपन्न नहीं हो सकता। इसके अलावा, हर क्षेत्र में प्रसव का काम अछूत जाति की स्त्री ही करती रही है। वे और उनके पुरुष ऊँची जातियों को शुद्ध रखने और करने, दोनों ही कार्य करते रहे हैं। विभिन्न कारणों से उपरोक्त जातियों के पुरुषों द्वारा पारंपरिक पेशे त्यागने की स्थिति में उन पेशों को ढ़ोने की समूची ज़िम्मेदारी उनकी स्त्रियों पर ही आ जाती है।


दुबे ने दिखाया है कि ऊँची जातियों की स्त्रियाँ खान-पान, यौन और दैनंदिन जीवन के आचार व्यवहार के स्तर पर निर्धारित कायदों का पालन कर जाति की शुद्धता और पदानुक्रम में उसकी स्थिति सुरक्षित रखने की भूमिका निभाती हैं। इसके साथ ही, वे यह भी उद्घाटित करती हैं कि निम्न जातियों की स्त्रियों के साथ ऊँची जातियों के पुरुष जब चाहें तब यौन-संबंध बना सकते हैं, जो प्रायः बलात्कार होता है। वहीं निम्न जाति के पुरुष और ऊँची जाति के स्त्री के बीच प्रेम तक की कल्पना नहीं की जा सकती। कारण, श्रेष्ठ बीज (ऊँची जाति के पुरुष का वीर्य) हीन धरती (निम्न जाति के स्त्री का गर्भाशय) पर गिरे तो कोई हर्ज नहीं लेकिन हीन बीज को श्रेष्ठ धरती पर नहीं गिरना चाहिए।