बौद्धकालीन शिक्षा व्यवस्था - Buddhist education system

बौद्धकालीन शिक्षा व्यवस्था - Buddhist education system


वैदिक शिक्षा व्यवस्था में धीरे-धीरे धर्म का प्रभाव अत्याधिक बढ़ जाने एवं कर्मकांड जुड़ जाने से शिक्षा पर ब्राह्मणों का एकाधिकार हो गया अन्य जातियों की उपेक्षा होने लगी जिससे जन साधारण परेशान होने लगा था। ऐसी परिस्थिति में आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व (563-483 ईसा पूर्व) गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म की स्थापना की थी।


व्यापक परिप्रेक्ष्य में बौद्ध धर्म को हिंदु धर्म का विकसित रूप माना जा सकता है। बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए बौद्ध मठों एवं बिहारों की स्थापना की गई पहले इन मठों में सिर्फ बौद्धो को धर्म की शिक्षा दी जाती थी परन्तु बाद में इसमें सभी धर्मों के छात्रों को शिक्षा दी जाने लगी, बौद्ध शिक्षा काफी सीमा तक वैदिक शिक्षा के समान थी।


इसी समावधि में जैन धर्म के चौवीसवें तीर्थकर महावीर स्वामी (597 से 527 ई. पू.) ने जैन धर्म की शिक्षा पर विशेष कार्य किया। जैन धर्म शिक्षा का उद्देश्य सम्यक ज्ञान सम्यक दर्शन. व सम्यक चरित्र के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करना था। जैन धर्म, अहिंसा, सत्य, आचार, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह पर विशेष जोर देता है। जैन विचारकों एवं धर्मवलम्बियों के द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सक्रिय भूमिका अदा न करने के कारण एवं बौद्ध धर्म के प्रादुर्भाव व उसको प्राप्त राज्य आश्रय के कारण जैन धर्म शिक्षा के क्षेत्र में कोई महत्वपूर्ण दीर्घकालीन छाप नहीं छोड़ सका।


बौद्ध काल में शिक्षा के कई केन्द्र विकसित हुए उसे से मुख्य तक्षशिला, नालन्दा, वल्लभी, विक्रमशिला,मिथिला,काशी,ओदन्तपुरी, नवद्वीप और काची प्रमुख है। बौद्ध शिक्षा का मुख्य उद्देश्य जीवन में निर्वाण प्राप्त करने का उपाय जानना था।

बौद्ध धर्म में निजी आचरणों पर जोर दिया जाता था जबकि हिन्दु धर्म में संस्कारों तथा ज्ञान पर बौद्ध धर्म की शिक्षा में पाठ्यक्रम वेदों तक सीमित नहीं था तथा शिक्षक को ब्राह्मण होना आवश्यक नहीं था। यह शिक्षा व्यवस्था सभी वर्गों के लिए थी। नालन्दा विहार (425 ई. से 1205 ई. तक) बौद्ध कालीन शिक्षा का गौरव कहा जाता है।