बौद्ध सामाजिक व्यवस्था - Buddhist social order
बौद्ध सामाजिक व्यवस्था - Buddhist social order
उत्तर वैदिक काल में समाज में मुख्य रूप से चार विभाजन के आधार विद्यमान थे- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। इन चारों वर्णों के कार्य और कर्तव्य अलग-अलग निर्धारित किए गए थे। ए सभी वर्ण जन्म आधारों द्वारा निर्धारित किए जाते थे तथा इसमें कोई लचीले नियम नहीं पाए जाते थे। ब्राह्मण इस वर्ण व्यवस्था में सर्वोच्च स्थान पर काबिज थे तथा उनके बाद का स्थान क्षत्रियों का आता है। इन दोनों वर्ण को विभिन्न प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त थे। ब्राह्मण पठन-पाठन का कार्य करते थे, क्षत्रिय युद्ध तथा शासन करते थे, वैश्य का कार्य पशुपालन तथा व्यापार है और शूद्रों का कार्य ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करना निश्चित किया गया था। स्त्रियों और शूद्रों को वेद आदि के अध्ययन से वंचित रखा गया।
ब्राह्मण को अनेक विशेषाधिकार होने तथा पठन-पाठन, नियमावली आदि पर आधिपत्य होने के कारण सदैव से ही वर्चस्वशाली रहे हैं। इनके बाद के स्थान पर क्षत्रिय थे तथा उन्हें भी अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे तथा यही कारण हैं कि इन दोनों वर्गों में यदा-कदा कुछ आपसी विसंगतियाँ आती रहीं। संभवतः यह भी अनेक कारणों में से एक सशक्त कारण रहा है जिसने इस चतुर्वणीय हिंदू व्यवस्था को चुनौती थी। इसके अलावा अन्य सामाजिक कुरीतियों और निषेधों ने अन्य धार्मिक संप्रदायों की उत्पत्ति के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
बौद्ध धर्म के आरंभ को गौतम बौद्ध के साथ ही माना जाता है। इनका जन्म 563 ईसा पूर्व में कपिलबस्तु के निकट नेपाल तराई में स्थित लुम्बिनी में शाक्य नामक क्षत्रिय कुल में हुआ था। कपिलवस्तु की पहचान बस्ती जिले पिपरहवा से की गई है। गौतम बुद्ध के पिता कपिलवस्तु के राजा और माता कोसल राजवंश की कन्या थीं। बचपन से ही गौतम की रुचि आध्यात्मिक पक्षों को जानने और समझने में थी। शीघ्र ही उनका विवाह संपन्न कर दिया गया. परंतु दाम्पत्य जीवन में उनका मन नहीं रमा । 29 वर्ष की अल्पायु में ही गौतम ने घर त्याग दिया तथा ज्ञान की तलाश में चल निकले। 35 वर्ष की आयु में उन्हें बोध गया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई। तब से ही उन्हें बुद्ध कहा जाने लगा। यहाँ बुद्ध से आशय प्रज्ञावान से है। गौतम बुद्ध ने अपने ज्ञान का पहला प्रवचन वाराणसी के सारनाथ ने नामक स्थान पर दिया। इसके पश्चात उन्होंने अनेक यात्राएं की तथा अपना धर्म-संदेश सुदूर क्षेत्रों तक तक फैलाया। उनके धर्म प्रचार में ऊंच-नीच, गरीब-अमीर, स्त्री-पुरुष के मध्य कोई भेदभाव की भावना नहीं थी। 80 वर्ष की आयु में गौतम बुद्ध का स्वर्गवास कुशीनगर नामक स्थान पर माना जाता है। इस स्थान की पहचान उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कसिया ग्राम के रूप में की जाती है।
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