पूँजीवादी समाज - capitalist society
पूँजीवादी समाज - capitalist society
मार्क्स ने मानव समाज के गठन एवं उसमें परिवर्तन की एक योजना प्रस्तुत की। उन्होंने कहा इतिहास के क्रमों की चर्चा एक योजना मात्र है। अलग-अलग समाजों में उनके विशिष्ट संदर्भ में वास्तविक इतिहास इसी योजना के अनुरूप परंतु वास्तविक घटनाओं में अलग इतिहास होता है। मार्क्स ने सबसे अधिक पूँजीवादी समाजों के बारे में लिखा। यह स्वाभाविक भी था। मार्क्स यूरोप के पूँजीवादी समाज में रह रहे थे एवं पूँजी की समस्याओं एवं विशेष रूप से मजदूर वर्ग की स्थिति और भूमिका की व्यापक चर्चा करना चाहते थे। मानव इतिहास में औद्योगिक पूँजीवाद एक अलग एवं युगांतकारी विकास का समाज था। एमिल दुर्खीम, मैक्स वेबर आदि भी इसी समाज का विश्लेषण कर रहे थे। इसीलिए एंथनी गिडेंस ने इनमें समानता की चर्चा की है। मार्क्स ने कहा उत्पादन की मशीनी शैली एवं मजदूरों द्वारा उत्पादित अधिशेष मूल्य (surplus value) का पूँजीपतियों के द्वारा नियंत्रण ही पूँजीवाद की विशेषता है। निजी संपत्ति, मुनाफा कमाने की प्रेरणा एवं धन-संग्रह ही पूँजीवाद के लक्षण हैं। मैक्स बेबर के अनुसर युक्तिपूर्ण क्रिया एवं संगठन पूँजीवाद के आधार हैं। दुर्खीम के अनुसार, व्यक्तिगत श्रमविभाजन पूँजीवाद का आधार है।" मार्क्स के अनुसार पूँजीवादी समाज किसी सोची-समझी योजना का परिणाम नहीं था।
व्यापार ने जिस बेशुमार धन का पैदा किया एवं व्यापार में अधिक लाभ की आकांक्षा से प्रौद्योगिकी या वस्तु उत्पादन की शैली जिस रूप में विकसित हुई उससे ही औद्योगिक पूँजीवाद का उदय हुआ। मैक्स वेबर ने इसे प्रोटेस्टेट नीतिशास्त्र के कारण उत्पन्न होने वाली व्यवस्था कहा एवं एमिल दुर्खीम के अनुसार समाज में भौतिक घनत्व यानी जनसंख्या के बढ़ने से एवं नैतिक घनत्व यानी सामाजिक एकता के बढ़ने से औद्योगिक पूँजीवाद का उदय हुआ। मानव अपनी आवश्यकताओं के लिए जब वस्तु का उत्पादन करता है तब वह वस्तु का उपयोगिता मूल्य होता है। पूँजीवाद में मानव पूँजीपति के लिए उत्पादन करता है. मुद्रा और बाजार के लिए उत्पादन करता है। इसीलिए उसे विनिमय मूल्य कहते हैं। पूँजीवाद में मजदूर यह समझते हैं कि वस्तुओं का उत्पादन जो बाजार के लिए होता है, वह स्वाभाविक है। मार्क्स ने इसे वस्तुकरण कहा है। इसका अर्थ है कि मजदूर यह नहीं समझता हैं कि जिस वस्तु का उत्पादन उसने किया, वह उसकी मेहनत का परिणाम है। वह समझता है कि वस्तुओं का मूल्य बाजार द्वारा निर्धारित होता है। यह एक अवास्तविक चेतना है। मजदूर जो कार्य स्वयं करता है उसे वह बाजार और वस्तु का चरित्र समझता है। पूँजीवाद में मजदूर या उत्पादक का वस्तु पर नियंत्रण समाप्त हो जाता है। उत्पादक अपने सृजनशील दिमाग से दूसरे उत्पादकों से सहयोग करके जो उत्पादन करते हैं। उसे वे बाजार की प्रक्रिया मान लेते हैं वे बाज़ार को एक स्वतंत्र एवं वस्तुनिष्ठ वास्तविकता मान लेते हैं जो व्यक्ति से अलग हैं और जो व्यक्ति का नियंत्रण करता है।
हंगरी के मार्क्सवादी विद्वान ग्यार्ग ( जार्ज) लुकाच ने वस्तुकरण को दैवीकरण कहा है। इस उत्पादन में केवल वस्तुओं का उत्पादन शामिल नहीं है, बल्कि सामाजिक संबंधी और सामाजिक संरचनाओं का उत्पादन भी शामिल है। दैवीकरण का अर्थ है मानव जिन सामाजिक स्वरूपों को पैदा करता है उन्हें प्राकृतिक, सार्वभौमिक और संपूर्ण समझ लेता है। मानव सामाजिक संरचना की पूजा करने लगता है। मार्क्स ने कहा पूँजीवाद में वस्तु के उत्पादन का चरित्र तो बदलता है, परंतु सबसे बड़ी बात वस्तुओं का दैवीकरण है। इसके मूल में वह प्रक्रिया है जिससे वस्तुओं का मूल्य श्रम के आधार पर होता है। इस दैवीकरण का अर्थ है कि मजदूर यह नहीं समझता कि उसके श्रम से ही वस्तुओं में मूल्य का सृजन होता है। मजदूर यह समझता है कि यह वस्तु का स्वाभाविक लक्षण है अथवा यह बाजार है जिससे मूल्य तय होता है। मार्क्स ने कहा यह मानवीय संबंध हैं जो श्रम में निहित हैं और जो सबसे महत्वपूर्ण हैं। जार्ज रीजर के अनुसार मार्क्स की यह खोज कि मानवीय संबंध ही मानवीय श्रम का आधार हैं, मार्क्स की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। मजदूर इस वास्वतिकता को नहीं समझता है। इससे वह अपने श्रम पर नियंत्रण खो देता है।
1867 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'दास कैपिटल' में मार्क्स ने लिखा कि वस्तु एक रहस्यमय चीज़ है, क्योंकि वस्तु में जो मानव का श्रम है वह उस उत्पादन पर एक वस्तुनिष्ठ लक्षण के रूप में स्वीकार किया जाता है।
उत्पादकों के मानवीय संबंध के आधार पर इसे उस उत्पादन और व्यक्ति के श्रम के बीच का संबंध समझ लिया जाता है। एक प्राकृतिक एवं स्वाभाविक प्रक्रिया पूँजीवाद में एक विशिष्ट रूप अपना लेती है। वस्तुओं का दैवीकरण बाजार को एक स्वतंत्र वस्तुनिष्ठ वास्तविकता प्रदान करता है. जो व्यक्तियों से अलग है और जो व्यक्ति का नियंत्रण करता है। मार्क्स ने कहा पूँजीवाद में पूँजी एक स्वतंत्र संरचना के रूप में और उसे चलाने वाले पूँजीपति भी स्वाभाविक समझे जाते हैं। मजदूर भी इन्हें स्वाभाविक समझता है और यह भूल जाता है कि इन दोनों को उसी ने बनाया है। इसीलिए मार्क्स ने कहा पूँजीवाद एक उल्टी संरचना है, यह एक अस्वाभाविक संरचना है, जिसे मजदूरों के विरुद्ध संघर्ष में पूँजीपतियों ने बड़ी ही बुद्धिमानी से विकसित किया है। सामंतवाद कैसे पूँजीबाद समाज में विकसित हुआ यह एक जटिल प्रश्न है? मार्क्स ने कहा पूँजीवादी समाज पिछले युगों से अनेक कारणों से एक भिन्न समाज होता है पूँजी अथवा वह आर्थिक संशोधन जो उत्पादक प्रक्रिया में लगा रहता है, सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। पूँजीपति और उद्योगपति शासक वर्ग होता है। उद्योग में कार्य करने वाले मजदूर वर्ग होते हैं। व्यापारी, महाजन, बैंकर, वित्त के मालिक, तकनीकी विशेषज्ञ अन्य वर्ग होते हैं। पूँजीपतियों में आपसी प्रतियोगिता बढ़ जाती है। मजदूर अलगाव के शिकार होने लगते हैं। जिंदा रहने के लिए मजदूर को मजदूरी करनी पड़ती है। पूँजीबाद में उत्पादन के साधन बहुत विकसित हो जाते हैं। मुनाफा और धन संग्रह उत्पादन की चाल की शक्ति होती हैं
सामाजिक असमानताएँ बहुत बढ़ जाती हैं। यह व्यवस्था कुछ लोगों के लिए समृद्धि एवं अनेक लोगों के लिए अभाव की स्थिति पैदा करती है। पूँजीवाद में अति उत्पादन एवं जबर्दस्त प्रतियोगिता के कारण बार-बार उत्कर्ष एवं संकट की अवस्थाएँ आती हैं।
मार्क्स ने पूँजीवाद का जो चित्र प्रस्तुत किया है वह एक ऐसे समाज का चित्र है, जिसमें अमानवीयता है। जिन्हें शक्तिशाली होना चाहिए। वे सामान्य सुविधाओं के लिए परेशान हैं। पूँजवादी समाज में अधिकांश जनता की स्थिति त्रासद होती है। जॉर्ज रीजर ने कहा मार्क्स की यह टिप्पणी गलत है। आम लोग खुश हैं। सामान्य सुविधाएँ बढ़ी हैं। इसी क्रम में अनेक विद्वानों ने कहा कुछ मजदूरों का पूँजीपतिकरण (embourgeoisement) हो गया है। किसी खास विद्वान का नाम इस धारणा के साथ नहीं जुड़ा है। इंग्लैंड के. जे. एच. गोलडथोर्पे (J.H. Goldthorpe) और डेविड लाकवूड (David Lockwood) आदि ने अध्ययनों के बाद कहा ऐसा व्यापक रूप नहीं हुआ है। मजदूर वर्ग में जो कुछ बड़े कुशल होते हैं, वे पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में ही अधिक सुविधा पाते हैं। इसकी चर्चा स्वयं फ्रेडेरिक एंगेल्स ने की। ऐसे मजदूरों को एंगेल्स ने संभ्रांत मजदूर श्रेणी कहा। पूँजीवाद अपनी तमाम ऊर्जा, इच्छा, कोशिश और प्रयास के बावजूद गरीबी को दूर नहीं कर सका है। सी. राईट मिल्स ने अपनी पुस्तक ‘साशियोलॉजिकल इमेजिनेश' में लिखा कि पूँजीवाद ने भूख पर नियंत्रण पा लिया है. परंतु दरिद्रता पर नियंत्रण नहीं पा सका है। फ्रैंक पार्किन, राल्फ डहरेनडॉर्फ आदि विद्वानों ने पूँजीवादी समाजों में एक निम्न वर्ग या अंडरक्लास की चर्चा की है। संयुक्त राज्य अमेरिका में नवसंरक्षणवादी विद्वान ने बार-बार यह माँग की है कि अविवाहित माताओं को सरकार से मिलने वाला अनुदान बंद हो जाना चाहिए। यह पूँजीवाद के उत्कर्ष पर एक नकारात्मक टिप्पणी है।
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