कारणात्मक गुणारोपण सिद्धान्त - Causal Attribution theory
कारणात्मक गुणारोपण सिद्धान्त - Causal Attribution theory
इस सिद्धांत का प्रतिपादन केली (1967) ने किया। उन्होंने इस सिद्धांत में बताया कि प्रेक्षक किसी व्यक्ति द्वारा की गई क्रिया का प्रेक्षण करने के पश्चात किस प्रकार उसका करणात्मक गुणारोपण करता है। केली के अनुसार किसी व्यक्ति द्वारा संपादित किसी क्रिया के तीन संभावित कारण हो सकते हैं, जो निम्न हैं
1. आंतरिक कारण
2. वाह्य कारण
3. परिवेशगत परिस्थितियाँ
इस सिद्धांत के अनुसार प्रेक्षक यह अनुमान करता है कि व्यक्ति के व्यवहार का कारण उपर्युक्त तीनों कारणों में से कौन सा हो सकता है।
उदाहरण विद्यार्थी का कक्षा में प्रथम आना
1. आंतरिक कारण- विद्यार्थी की योग्यता- बुद्धिमान, परिश्रमी
2. वाह्य कारण पाठ्यक्रम तथा प्रश्नपत्र का आसान होना
3. परिवेशगत परिस्थितियाँ ट्यूशन
उपर्युक्त तीनों कारणों में से कौन सा कारण विद्यार्थी के प्रथम श्रेणी के अंको के लिए उत्तरदाई है यह जानने के लिए प्रेक्षक को कुछ विशेष सूचनाओं की आवश्यकता होती है केली के अनुसार गुणारोपण के लिए प्रेक्षक को तीन प्रकार की सूचनाएँ प्राप्त हो सकती है-
• विशिष्टता
• सहमति
• एकरूपता
विशिष्टता
मान लीजिए कि यदि विद्यार्थी ने गणित के अतिरिक्त अन्य विषयों में खराब अंक पाए हैं, तो मात्र गणित में ही विशेषता प्राप्त करना उसकी योग्यता के कारण नहीं समझा जाएगा। किंतु यदि गणित के अंको में कोई विशेषता नहीं हैअर्थात सभी विषयों में विद्यार्थी के प्रथम श्रेणी के अंक है। तो प्रेक्षक गणित में प्रथम श्रेणी के अंकों का गुणारोपण, विद्यार्थी की योग्यता में करेगा। केली के अनुसार विशिष्टता की मात्रा जैसे-जैसे बढ़ती है आंतरिक कारणों पर गुणारोपण की संभावना घटती जाती है तथा परिवेशीय उद्दीपकों एवं परिस्थितियों पर गुणारोपण की संभावना बढ़ती जाती है।
सहमति
यदि सभी विद्यार्थियों ने मनोविज्ञान विषय में प्रथम श्रेणी के अंक प्राप्त किए हैं। तो इस सहमति के कारण कोई भी प्रेक्षक विद्यार्थी विशेष के मनोविज्ञान में अच्छे अंको का कारण विद्यार्थी की उच्च स्तरीय योग्यता पर आरोपित नहीं करेगा। बल्कि वह यह पूर्वकथन करेगा कि मनोविज्ञान का पाठ्यक्रम या प्रश्न पत्र या दोनों आसान था। इसी कारण उस विद्यार्थी को भी अच्छे अंक मिले।
दूसरी ओर यदि सहमति नहीं है तो पाठ्यक्रम अथवा प्रश्न पत्र या दोनों को कठिन समझा जाएगा। प्रेक्षक उस विद्यार्थी के मनोविज्ञान में अच्छे अंकों का गुणारोपण उसकी योग्यता पर करेगा। केली के अनुसार इस सिद्धांत के द्वारा, सहमति की मात्रा जितनी ही कम होती है, आंतरिक कारणों पर गुणारोपण की संभावना बढ़ती जाती है। जबकि सहमति की उच्च मात्रा होने की स्थिति में परिवेशीय उद्दीपकों पर गुणारोपण होने की संभावना अधिक होती है।
एकरूपता
केली के अनुसार एकरूपता का न पाया जाना. प्रेक्षक को घटना का कारण परिवेशजन्य कारकों पर गुणारोपित करने के लिए प्रेरित करता है। प्रेक्षक के द्वारा ऐसा माना जायेगा कि विद्यार्थी ने अच्छा अंक इसलिए पाया है कि हो सकता है कि इस विद्यार्थी ने मनोविज्ञान के लिए ट्यूशन का सहारा लिया था। केली के अनुसार यदि प्रेक्षक को एक से अधिक प्रकार की सूचनाएं उपलब्ध है तो गुणारोपण उन सभी सूचनाओं के सम्मिलित प्रभाव से होता है उदाहरण यदि विद्यार्थी के संबंध में विशिष्टता के साथ साथ ए गुप्ता की भी सूचना उपलब्ध हो तो प्रेक्षक उसके गणित में प्रथम श्रेणी के अंगों को उसकी योग्यता अर्थात आंतरिक कारक होना मानेगा कार्यात्मक गुणारोपण के संबंध में किए गए प्रायोगिक अध्ययन यह बताते हैं कि अपने दैनिक जीवन में लोग प्रायः पूरी सूचनाओं को एकत्र किए बिना ही किसी घटना के कारण का अनुमान लगा लेते हैं
और फिर अपने अगले व्यवहार का निर्धारण इसी अनुमान के आधार पर करते हैं। बल्कि एक सामान्य प्रेक्षक उपलब्ध सीमित सूचनाओं के आधार पर घटना का कोई एक कारण समझ लेता है और उसके बाद अपने अनुमान को सत्यता का आधार प्रदान करने हेतु ऐसी सूचनाओं की खोज प्रारंभ कर देता है जो उसके अनुसार की वैधता को प्रमाणित कर सके।
जोन्स तथा डेविस का सहसंवादी अनुमिति सिद्धान्त (Correspondent Inference theory) किसी व्यक्ति द्वारा किए गए किसी व्यवहार का परीक्षण करने के पश्चात उसके कारणों का अनुमान करने के गुणारोपण प्रक्रम के संबंध में जोंस तथा डेविस (1965) ने सहसंवादी अनुमिति सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उनके सिद्धांत के अनुसार कोई प्रेक्षक किसी व्यवहार से उत्पन्न परिणामों का प्रेक्षण के करता है और इन परिणामों के आधार पर ही व्यक्ति का मूल्यांकन करता है। इनके सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति की व्यक्तिगत प्रवृत्ति तथा अपने व्यवहार द्वारा वांछित प्रभाव अथवा परिणाम उत्पन्न करने के उसके उद्देश्यों में पारस्परिक सहमति होती है। किसी व्यक्ति द्वारा की गई सामाजिक अनुक्रिया से एक अथवा एक से अधिक प्रभाव उत्पन्न हो सकते हैं।
यदि उस अनुक्रिया से मात्र एक ही प्रभाव उत्पन्न हो तो उस प्रभाव का प्रेक्षण करके प्रेक्षक यह मान सकता है कि उस प्रभाव को उत्पन्न करना व्यक्ति का उद्देश्य था और वह व्यक्ति में कतिपय विशेषताओं का गुणारोपण कर सकता है। परंतु यदि अनुक्रिया से उत्पन्न होने वाले प्रभाव की संख्या एक से अधिक हो तो प्रेक्षक के सम्मुख दो प्रश्न उपस्थित होते हैं कि क्या व्यक्ति का उद्देश्य उन सभी प्रभावों को उत्पन्न करना था? यदि नहीं, तो व्यक्ति अपने व्यवहार द्वारा कौन से प्रभाव उत्पन्न करना चाहता था? और कौन से नहीं? जोन्स तथा डेविस के अनुसार, जब कोई व्यक्ति दो विकल्पों में से किसी एक को चुनने का निर्णय लेता है तो उसके द्वारा संपादित व्यवहार उन दोनों विकल्पों से अलग-अलग उत्पन्न हो सकने वाले प्रभावों में से असमान प्रभाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से होती है। उदाहरण: विद्यार्थियों की समस्या रहती है कि वे अंतर्विषयी अध्ययन के लिए किस विषय का चयन करें? उपरोक्त उदाहरण में विद्यार्थी सभी विषयों के अलग-अलग उत्पन्न होने वाले समस्त प्रभाव को देखता व समझता है। ज्ञान, पाठ्यचर्या, अध्यापकों के कौशल इत्यादि ध्यान में रखते हुए सोच विचार कर विषय का चयन करता है। ऐसी स्थिति में प्रेक्षक समान तथा असमान प्रभाव का विश्लेषण करेगा।
यदि वह पाएगा की पुस्तकों की सुविधा, मित्र-मंडली की उपस्थिति, शिक्षण का स्तर, अच्छे अध्यापक इत्यादि अनेक प्रभाव सभी विषयों के चयन में समान रूप से है. तो वह इनमें से किसी भी प्रभाव को विद्यार्थी के निर्णय के कारण के रूप में प्रदर्शित नहीं करेगा। परंतु प्रेक्षक की जानकारी की मनोविज्ञान में परीक्षा में वस्तुनिष्ट शैली और भूगोल में निबंध शैली में होती है। उसे इसका सामान्य प्रभाव के रूप में गुणारोपण कर सकती है। विद्यार्थी ने मनोविज्ञान का चयन विशिष्ट परीक्षा शैली के कारण किया है। ऐसे बहुत से कारण भी हो सकते हैं इस विषय को चयन करने में। एक ऐतिहासिक उदाहरण लेकर विषय को और भी सही ढंग से स्पष्ट किया जा सकता है। उदाहरण सन 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की और उनके इस निर्णय से देश में अनेक प्रभाव उत्पन्न हुए। एक प्रेक्षक के रूप में आपको सभी प्रभाव को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व में कुछ विशेषताओं का गुणारोपण करने के लिए सर्वप्रथम आपको समस्त प्रभाव की सूची बनाकर यह निर्णय करना होगा कि उन में से किन प्रभाव को प्रधानमंत्री उत्पन्न करना चाहती थी और किन प्रभाव को नहीं। कुछ प्रमुख प्रभाव इस प्रकार से हो सकते हैं, जैसे- विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, स्वतंत्र लेखन व भाषण बंद, अकारण प्रताड़ना, दफ्तरों में समय से काम होने लगना, भ्रष्टाचार कमी, अनुशासन, उत्पादन में वृद्धि इत्यादि। प्रश्न यह है कि प्रधानमंत्री की आपात काल की घोषणा का कारण क्या था? कारण का संज्ञान करने के लिए प्रेक्षक को यह अनुमिति करना होगा कि प्रधानमंत्री कौन से प्रभाव उत्पन्न करना चाहती थी? गुणारोपण में मात्र उन्हीं प्रभावों को ध्यान में रखना होगा।
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