मानवाधिकार को सुनिश्चित करने में चुनौतियाँ - Challenges in ensuring human rights

 मानवाधिकार को सुनिश्चित करने में चुनौतियाँ - Challenges in ensuring human rights


मानवाधिकार किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला है। चाहे किसी भी प्रकार की शासन व्यवस्था हो, मानवाधिकार प्रत्येक शासन व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो इसकी अनिवार्यता कुछ और बढ़ जाती है। यदि बृहत रूप से चिंतन मनन करें तो किसी भी समाज के विकास को, उस समाज के लोगों को उपलब्धि मानवाधिकारों की कसौटी पर कसा जा सकता है। यदि आम व्यक्ति को पर्याप्त मानवाधिका उपलब्ध हैं तो उस समाज विशेष को सभ्य, संस्कृत और विकसित कहा जा सकता है। यह मानवाधिकारों का महत्व ही है कि आज दुनियाभर के देशों में आम जनता को मानवाधिकारों से सुसज्जित किया जा रहा है। मानवाधिकार एक गतिशील अवधारणा है, जो समय के अनुरूप बदलती रहती है। पहले जो अधिकार उपलब्ध नहीं थे. उन्हें आजकल प्रत्येक मनुष्य को प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध हैं। आज दुनियाभर में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन चल रहे हैं।


इनमें सबसे मुख्य है, राज्य द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के विरूद्ध गैर-सरकारी संगठनों द्वारा आंदोलन । चूंकि मानवाधिकार प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं इसलिए प्रत्येक आदमी को इनके बारे में जानने और इनके प्रति जागरूक रहने की जरूरत है। और इसी पावन उद्देश्य से इस पुस्तक का प्रणयन किया गया है।


मानवाधिकारों की सार्वजनीन घोषणा की स्वीकृति के बाद से ही इस प्रश्न पर काफी विवाद उठते के हैं कि कौन-से अधिकार अधिक महत्वपूर्ण हैं और से कम कुछ राज्यों के प्रतिनिधि यह आग्रह करते रहे कि आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों की अपेक्षा नागरिक तथा राजनीतिक अधिकार अधिक महत्वपूर्ण है। उनके मन में विकास के अधिकार को स्वीकार करने के बारे में भी गंभीर संकोच थे. जिसका कारण यह था

कि इन अधिकारों पर कारगार ढंग से अमल किए जाने पर विश्व की आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति के मौजूदा स्वरूप में बहुत उलट-फेर हो जाना आवश्यक हो जाएगा। परंतु कुछ अन्य देशों ने आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अधिकारों एवं विकास के अधिकार पर जोर दिया। हम कह सकते हैं कि सभी मानवाधिकारों के आभिभाज्य मान लिए जाने के साथ ही, सिद्धांत इन विवादों का निपटारा हो गया है। 171 देशों और सैकड़ों गैर-सरकारी संस्थाओं के सम्मेलन के बाद जारी की गई घोषणा में स्पष्ट शब्दों में कहा गया कि सभी मानवाधिकार सार्वजनीन, अभिभाज्य अंतर्निभर और अंतर्सबद्ध हैं। साथ ही स्पष्ट शब्दों में यह भी कहा गया है कि नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक, सभी प्रकार के व्यक्तिगत अधिकारों तथा राज्यों के अंतर्गत और राज्यों के समूह के अंतर्गत" सामूहिक अधिकारों का एक मात्र जमिन लोकतंत्र है।