जाति व्यवस्था में परिवर्तन - change in caste system

जाति व्यवस्था में परिवर्तन - change in caste system


जाति व्यवस्था की निरंतरता तथा अनुकूलन की प्रकृति के बावजूद इसमें अनेक परिवर्तन हुए हैं, जो निम्नलिखित हैं


1) जातीय संस्तरण में बदलाव


जाति व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक जाति को एक सामाजिक प्रस्थिति प्रदान की गई है तथा इसी आधार पर उनमें संस्तरण की व्यवस्था पायी जाती है। प्रत्येक जाति अन्य जाति से उच्च. निम्न अथवा बराबर प्रस्थिति की होती है तथा प्रत्येक जाति को यह जानकारी रहती है कि कौन सी जाति उससे उच्च प्रस्थिति पर व्याप्त है तथा कौन सी जाति निम्न प्रस्थिति पर। परंतु वर्तमान समय में जाति व्यवस्था द्वारा निर्धारित की गई संस्तरण व्यवस्था में परिवर्तन आया है तथा निम्न मानी जाने वाली जातियों द्वारा भी सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक पक्षों में अपनी स्थिति में काफी सुधार कर लिया गया है और स्वयं को उच्च प्रस्थिति प्रदान करने हेतु कार्य किए गए हैं। एम. एन. श्रीनिवास द्वारा दी गई संस्कृतिकरण की अवधारणा इन्हीं बातों को उजागर करती है। इस प्रक्रिया में निम्न संस्तरण वाली जाति उच्च अथवा प्रभुत्वशाली जाति की जीवनशैली आदि को अपनाकर स्वयं के उच्च होने का दावा करती है। इस प्रकार अनेक बड़े शहरों में अपरिचित होने का फायदा उठाकर अनेक जातियों ने उच्च प्रस्थिति से संबंधित होने का दावा किया गया।


2 ) ब्राह्मणों की प्रस्थिति में हास


आदि काल से ही जाति व्यवस्था के अनुसार सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि क्षेत्रों में ब्राह्मणों का विशिष्ट महत्व और वर्चस्व रहा है। परंतु वर्तमान समय में व्यक्तिगत गुणों (कौशल, योग्यता आदि) तथा धन-संपत्ति का काफी महत्व बढ़ चुका है। इस कारण किसी भी जाति का सदस्य (वह चाहे जातीय संस्तरण की निम्न मानी जाने वाली जाति से ही क्यूँ ना हो) शिक्षा ग्रहण करने, धन संचित करने अथवा चुनाव में जीत कर विशिष्ट और उच्च सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक प्रस्थिति को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार से समकालीन समय में कभी कभी ब्राह्मणों को भी निम्न जातियों के अधीन रहते हुए अपनी सेवाएं देनी पड़ती हैं। इसके अलावा दिन-प्रतिदिन पूजा-पाठ व अन्य धार्मिक क्रियाओं में विश्वास की कमी होती जा रही है. इस कारण से भी ब्राह्मणों की प्रस्थिति में निरंतर गिरावट होती जा रही है। 


3) व्यावसायिक चयन में स्वतन्त्रता


परंपरागत जाति व्यवस्था में व्यवसाय का निर्धारण पूर्व में ही हो जाता था तथा इसको बदलना संभव नहीं रहता था।

परंतु वर्तमान समय में व्यक्ति को अपनी कुशलता तथा योग्यता के अनुसार व्यवसाय को चुनने की पूरी आजादी है। किसी भी जाति का व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुरूप किसी भी व्यवसाय को करने हेतु स्वतंत्र है। डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वकील आदि प्रकार के विभागों में अनेक जातियों के व्यक्ति कार्य करते हैं। इसी प्रकार कृषि कार्यों में भी विभिन्न जातियों ने अपनी उपस्थिति सुनिश्चित की है। हालांकि इतने परिवर्तनों के बावजूद ब्राह्मण तथा हरिजन द्वारा किए जाने वाले कार्यों को आज भी किसी अन्य जाति द्वारा नहीं अपनाया गया है। 


(4) भोजन तथा विवाह संबंधी प्रतिबंधों में बदलाव में


परंपरागत जाति व्यवस्था में खान-पान तथा विवाह संबंधी अनेक निषेध पाए जाते थे।

शाकाहार, मांसाहार, कच्चे-पक्के, तले-भुने आदि प्रकार के भोजन के आधार पर पवित्रता अपवित्रता का निर्धारण किया जाता था तथा यह निर्धारण ही जातियों के सामाजिक संस्तरण को भी प्रभावित करता था। परंतु वर्तमान समय में ए खान-पान संबंधी नियम कमजोर हुए हैं। आज कुछ ब्राह्मण भी मांसाहार करते हैं। अनेक होटल, ढाबे, भोजनयलों आदि के खुल जाने के कारण विभिन्न जातियों के लोगों में साथ खाने पीने की भावना विकसित हुई है तथा कच्चे-पक्के भोजन का भेदभाव भी कम हुआ है। आज जाति व्यवस्था की उच्च जाति के लोग भी निम्न जातियों के यहां भोजन करते हैं।


अंतर्जातीय विवाह को जाति व्यवस्था का मूल आधार माना जाता है। परंतु आज यह आधार भी कमजोर हुआ है। आज व्यक्ति दूसरी जाति में विवाह करने से नहीं हिचकता। इसके अलावा विलंब विवाह, विवाह-विच्छेद, विधवा पुनर्विवाह आदि प्रकार के विवाहों के स्वरूप भी सामने आए हैं। 


5) अस्पृश्य जातियों के अधिकारों में बढ़ोत्तरी


परंपरागत जाति व्यवस्था में अस्पृश्यों तथा दलितों के लिए अनेक निर्योग्यताएं निर्धारित की गई थीं

तथा सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक व राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा गया। कालांतर में अनेक समाजसुधारकों द्वारा किए गए प्रयासों तथा संवैधानिक प्रावधानों द्वारा इन जातियों को सुविधाएं तथा अधिकार प्राप्त हो पाए। उनके लिए आर्थिक तथा राजनीतिक संरक्षण की व्यवस्था की गई तथा सरकारी नौकरियों और अन्य क्षेत्रों में उनके लिए स्थान आरक्षित किए गए। इसके साथ ही संवैधानिक तौर पर अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया। 


6) बदलते हुए जातीय संबंध


वर्तमान समय में जातियों के आपसी सम्बन्धों में भी काफी परिवर्तन हुए हैं। जाति व्यवस्था में आपसी संबन्धों और पारस्परिकता को बनाए रखने के लिए जजमानी प्रणाली पायी जाती थी। यह प्रणाली जातियों को सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा मुहैया कराती थी।

आज जजमानी संबन्धों में ह्रास हुआ है तथा राजनीतिक आधार पर भी शक्ति को प्राप्त करने के लिए भी जातियों में आपसी सहयोग की कमी आयी है। शक्ति ने नए समीकरण पैदा हुए हैं. सत्ता उच्च जातियों के अल्पसंख्यक लोगों से निम्न जातियों के बहुसंख्यकों के पास हस्तांतरित हुई है। अनेक ग्राम पंचायतों में प्रधान के तौर पर निम्न जाति के बहुसंख्यक ही विद्यमान हैं। 


7) जातीय समितियों और संगठनों का निर्माण


जातियों द्वारा अपने जातीय हितों की रक्षा करने हेतु समितियों तथा संगठनों का निर्माण किया गया है। ए संगठन/समिति क्षेत्रीय प्रांतीय तथा राष्ट्रीय स्तर तक व्याप्त हैं। ए संबंधित जातियों के सामाजिक और आर्थिक गतिशीलता को बनाए रखने में सहायता करते हैं तथा शक्ति प्रदान कर अपनी जाति को आर्थिक तौर पर सशक्त करने का काम करते हैं।