जनजातीय जीवन में परिवर्तन - changes in tribal life
जनजातीय जीवन में परिवर्तन - changes in tribal life
परिवर्तन एक साश्वत प्रक्रिया है, अर्थात यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। प्राकृतिक परिवर्तन की ही तरह सामाजिक परिवर्तन भी निरंतर घटित होता है। सामाजिक परिवर्तन से तात्पर्य सामाजिक संरचना एवं सामाजिक संबंधों में होने वाला परिवर्तन से है। यह सामाजिक परिवर्तन स्वतः एवं नियोजित दोनों तरह से होता है। जनजातीय समाज भी, परिवर्तन का अपवाद नहीं है यद्यपि ये समुदाय सुदूर क्षेत्र में रहने के कारण, गैर-जनजातीय समुदायों की तुलना में काफी बाद में परिवर्तन की प्रक्रिया में शामिल हुए।
भारत के संदर्भ में जनजातियों में परिवर्तन ब्रिटिश काल में शुरू हुआ, जब ब्रिटिश शासन ने मिशनरीज़ के माध्यम से जनजातीय समुदायों के बीच काम शुरू किया। यद्यपि इन प्रयासों के पीछे जनजातीय विकास मुख्य भावना नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश शासन में जनजातीय तनाव को समाप्त कर अपने प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के उद्देश्य से मिशनरीज को जनजातियों के बीच भेजा। इन मिशनरीज ने शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में, जनजातीय समुदायों को न सिर्फ जागरूक किया, बल्कि उन्हें आधारभूत सुविधाएं जैसे विद्यालय एवं स्वास्थ्य केंद्र भी उपलब्ध कराएं।
उनके बीच खान-पान एवं सामाजिक मेल-जोल बढ़ाया जिसका एक परिणाम जनजातियों का बड़ी संख्या में धर्म परिवर्तन हुआ। आज भी हमारी जनजातीय जनसंख्या का एक बड़ा भाग क्रिश्चियन धर्म का अनुयायी है। स्वतंत्रता के पश्चात नियोजित एवं अनियोजित दोनों प्रकार के परिवर्तन तेज हुए। जनजातीय विकास नियोजित परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है। परिवर्तन की प्रक्रियाओं जैसे औद्योगीकरण, नगरीकरण, आधुनिकीकरण, पश्चिमीकरण एवं वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप तथा गैर-जनजातीय समुदायों के संपर्क के फलस्वरूप जनजातीय समुदायों में होने वाला तीव्र परिवर्तन अनियोजित परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है। उपर्युक्त सभी कारकों के प्रभाव से आज जनजातीय समुदायों में आमूल-चूल परिवर्तन दिखाई देता है। इन परिवर्तनों को निम्न बिंदुओं में देखा जा सकता है -
1. शैक्षणिक स्थिति में परिवर्तन जनजातीय जीवन में सर्वाधिक दिखाई देने वाले परिवर्तनों में, उनकी शैक्षणिक स्थिति में परिवर्तन है। जब हम उनकी शैक्षणिक स्थिति की बात करते हैं
तो यह ध्यान रखना जरूरी है कि शैक्षणिक स्थिति से तात्पर्य आधुनिक औपचारिक शिक्षा से है अन्यथा जनजातियों में अनौपचारिक शिक्षा पूर्व में भी प्रचलित रही है, जिसके माध्यम से उन्हें जीवन के लिए आवश्यक कौशल एवं तकनीकी का ज्ञान कराया जाता था। प्रत्येक समुदाय के युवागृह' इस प्रकार के की अनौपचारिक शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते रहे हैं।
गैर आदिवासी समुदायों के संपर्क एवं बदलते सामाजिक एवं राष्ट्रीय परिदृश्य में इन समुदायों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने हेतु शिक्षा को महत्वपूर्ण कड़ी माना गया है एवं इस हेतु प्रयास किए गए यथा जनजातीय क्षेत्रों में आश्रम विद्यालय की व्यवस्था की गई, छात्रवृत्ति, गणवेष, पुस्तकें, उच्च शिक्षा संस्थानों में स्थानों का आरक्षण आदि। इन प्रयासों के फलस्वरूप आज जनजातीय समुदाय के व्यक्ति न सिर्फ शिक्षित हो रहे हैं बल्कि उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं एवं शासकीय तथा गैर-शासकीय प्रतिष्ठानों में नौकरी भी कर रहे हैं।
2. सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन - जनजातियों के सामाजिक सांस्कृतिक जीवन में बहुत अधिक परिवर्तन परिलक्षित हुए हैं, उनकी सामाजिक संगठन एवं व्यवस्थाएं जहां एक ओर समाप्त हुई हैं वहीं दूसरी ओर कुछ नई व्यवस्थाओं को स्थान मिला है।
जनजातीय संस्कृति एक विशेष एवं पृथक संस्कृति रही है। जिसमें जनजातीय धर्म, उत्सव, त्योहार विवाह आदि की विशेष प्रक्रिया एवं प्रचलन रहे हैं, आज उनमें परिवर्तन हुआ है। जनजातीय समुदायों में हिंदू धर्म के अनुसार पूजा-पाठ, कर्मकाण्ड एवं विवाह पद्धति बहुत सामान्य हैं। आज वधु मूल्य के स्थान पर दहेज भी उनके बीच दिखाई देता है। होली, दीवाली, नव वर्ष इत्यादि गैर जनजातीय समुदायों की भांति मनाने लगे हैं अर्थात उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन में बहुत अधिक परिवर्तन हुए है।
3. आर्थिक जीवन में परिवर्तन - जनजातीय अर्थव्यवस्था स्वायत्त एवं आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था रही है। जो मूलतः वनों एवं प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर थी तथा वह समुदाय की सभी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम थी। वास्तव में उनकी अर्थव्यवस्था प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर थी एवं उनकी संस्कृति इन संसाधनों का संरक्षण करने वाली थी। विभिन्न प्रकार के कारकों ने जनजातीय अर्थव्यवस्था को बदला है, आज उनकी आर्थिक क्रियाएं एकाधिक साधनों पर निर्भर हैं यथा- कृषि, मजदूरी, व्यवसाय एवं नौकरी।
आज इनकी अर्थव्यवस्था स्वायत्त एवं आत्मनिर्भर नहीं है जिसके नकारात्मक प्रभाव भी हैं।
4. राजनैतिक जीवन एवं परिवर्तन - प्रत्येक जनजातीय समुदाय की एक राजनैतिक व्यवस्था होती थी, उनके परंपरागत राजनैतिक संगठन जैसे सामुदायिक पंचायत होते थे। जिसमें मुखिया एवं अनुभवी व्यक्ति मिलकर निर्णय लेते थे। वर्तमान में ये संगठन एवं व्यवस्था समाप्त हो गई है। हमारे देश की राजनैतिक व्यवस्था को जहाँ एक तरफ इन समुदायों ने आत्मसात किया है, तो दूसरी ओर वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था ने भी इन समुदायों की सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु अनेक प्रयास किए हैं। 73वें संविधान संशोधन के तहत जनजातियों को आरक्षण दिया गया है। जिसने इनकी भागीदारी को सुनिश्चित किया है। आज जनजातीय समुदाय का प्रतिनिधित्व पी. आर.आई. के निचले स्तर ग्राम पंचायत से लेकर लोकसभा एवं विधानसभा तक व्यापक है।
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