हिंदू विवाह के बदलते प्रतिमान - Changing Pattern of Hindu Marriage

हिंदू विवाह के बदलते प्रतिमान - Changing Pattern of Hindu Marriage


परिवर्तन का नियम एक सार्वभौमिक व शाश्वत नियम है। स्वतः हर व्यवस्था व हर संस्था में परिवर्तन होता रहता है। हिंदू विवाह की संरचना और परंपरागत नियमों में भी परिवर्तन की प्रक्रिया अनवरत रूप से जारी है जिसके कारण इसके आदर्शों व मान्यताओं में काफी अंतर आ गया है। आज हम संक्रमण के स्तर से गुजर रहे हैं जिसमें पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव और व्यक्तिवादी धारणाओं के कारण शास्त्रीय विधि-विधानों के पुर्नपरीक्षण, सरलीकरण और सुधार पर अत्यधिक जोर दिया जा रहा है। इसके फलस्वरूप न केवल विवाह से संबंधित मान्यताओं में परिवर्तन हुआ है बल्कि नवीन अधिनियमों के द्वारा इन परिवर्तनों को कानूनी रूप देने की भी व्यवस्था कर दी गयी है। इस प्रकार विवाह से संबंधित परिवर्तनों को निम्नांकित क्षेत्रों में स्पष्ट किया जा सकता है।


(1) हिंदू विवाह अब धार्मिक संस्कार नहीं:- प्राचीन हिंदू विवाह एक धार्मिक संस्कार था, उसमें विवाह से संबंधित अनेक धार्मिक क्रियाओं का समावेश था। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार अब विवाह स्त्री-पुरुष के बीच एक कानूनी समझौता बन गया है।


(2) विवाह संबंधी निषेधों में अंतर:- प्राचीन काल में हिंदू विवाह से संबंधित गोत्र, जाति, प्रवर आदि अनेक निषेधों का पालन करना पड़ता था। इससे विवाह का दायरा बहुत सीमित था, किंतु नवीन विधानों में गोत्र, जाति. प्रवर से संबंधित बंधन समाप्त कर दिए गए हैं और कोई भी हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख परस्पर विवाह कर सकते हैं। वर्तमान में अंतर्जातीय विवाहों को वैधानिक स्वीकृति मिल गयी है। यद्यपि इससे विवाह के क्षेत्र में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं आया है। फिर भी अंतर्जातीय विवाह एवं अंतर-धर्म विवाहों के पक्ष में जनमत तैयार होने लगा है। जिससे विवाह का क्षेत्र भी विस्तृत हुआ हैं।


(3) विवाह-विच्छेद:- अब तक हिंदू विवाह एक धार्मिक संस्कार एवं जन्म-जन्मांतर का बंधन माना जाता है जिसे कभी भी भंग नहीं किया जा सकता. किंतु हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 ने दोनों ही पक्षों को कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में तलाक देने की सुविधा प्रदान की है। इससे स्त्रियों का शोषण समाप्त हुआ है और उनके अधिकारों में वृद्धि हुई है।


(4) सामाजिक व मानसिक सुरक्षा:- इस अधिनियम में पागल, कोढ़ी व गुप्त रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के विवाह पर रोक लगा दी गयी है। पहले ऐसे व्यक्ति धन व शक्ति बल पर विवाह कर कन्याओं का जीवन नष्ट कर दिया करते थे।


(5) विवाह के नियमों में एकरूपता:- हिंदू विवाह अधिनियम से पूर्व भारत के विभिन्न क्षेत्रों में निवास करने वाले हिंदुओं के विवाह संबंधी नियमों में अनेक भिन्नताएं थी। निताक्षरा और दायभाग नियमों द्वारा नियंत्रित परिवारों के रीति-रिवाजों में अंतर था। इस अधिनियम के द्वारा संपूर्ण भारत में निवास करने वाले हिंदुओं पर विवाह के संदर्भ में एक सा नियम लागू हो गया।


(6) समूह विवाह:- वर्तमान में कम खर्च एवं समय की बचत के कारण समूह विवाह का प्रचलन बढ़ गया है। कई शहरों में संकट काल के दौरान दहेज से मुक्ति पाने के लिए संपन्न लोगों द्वारा समाज के कल्याण के उद्देश्य से सामूहिक विवाह का आयोजन किया है। यह भी वैवाहिक स्वरूपों में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है।


(7) अंतर्जातीय विवाह:- विवाह का दायरा बढ़ने से एवं कानून द्वारा मान्यता प्राप्त होने से वर्तमान में अंतर्जातीय एवं अंतरधर्म विवाह भी होने लगे हैं जो पहले निषिद्ध माने गए थे।


(8) पत्नी की स्थिति में अंतर:- वर्तमान में विवाह में पति-पत्नी को समान स्तर प्रदान किया गया है। प्राचीन विवाहों में स्त्री को एक दासी या अनुचरी के रूप में माना गया था, किंतु अब पति की सहचरी, मित्र अथवा साथी मानी जाती हैं। परिवार एवं समाज में उसकी प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हुई है।


(9) प्रेम विवाह:- वर्तमान में प्रेम विवाह का प्रचलन बढ़ा है। सह शिक्षा, औद्योगीकरण, आधुनिकीकरण, चल-चित्र एवं मास-मीडिया आदि के प्रभावों के कारण ऐसे विवाहों को प्रोत्साहन मिला है। नवीन कानून भी उसमें बाधक नहीं बन रहा हैं बल्कि उसे प्रोत्साहन ही दे रहा है। यद्यपि ऐसे विवाहों की संख्या बहुत कम है।


(10.) बेमेल विवाह की समाप्ति:- पहले दहेज से बचने एवं कुलीन विवाह का प्रथा का पालन करने के कारण बेमेल विवाह हो जाते थे। वर एवं वधु के आयु में 20 वर्ष का अंतर होता था। किंतु अब वर एवं वधू द्वारा जीवन-साथी का चुनाव स्वयं द्वारा किए जाने एवं अंतर्जातीय विवाह के कारण ऐसे विवाह प्रायः समाप्त हो गए हैं।


(11) जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता:- प्राचीन समय में विवाह साथी का चयन एवं चुनने का दायित्व परिवारजनों पर रहता था। अतः वर-वधु अपने हिसाब से जीवन साथी चुनने के लिए स्वतन्त्र नहीं थे, किंतु अब वे स्वयं अपनी इच्छानुसार जीवन साथी का चयन एवं विवाह करने लगे हैं तथा इसमें परिवार एवं नातेदारों का हस्तक्षेप कम हो रहा है।


(12) विवाह की अनिवार्यता की समाप्ति :- प्राचीन समय में एक हिंदू के लिए विवाह एक अति आवश्यक धर्म था जो ऋणों से मुक्ति दिलाने एवं पुरुषार्थ की पूर्ति के लिए करना होता था। किंतु विवाह में धार्मिक पक्ष की शिथिलता के साथ-साथ विवाह की अनिवार्यता भी समाप्त हो रही है। और कई स्त्री पुरूष अविवाहित भी रहने लगे हैं। रास ने बताया है कि वर्तमान में अब कई युवक-युवतियाँ विवाह के अनिच्छुक हैं। वे इसे अपनी स्वतंत्रता पर कुठाराघात समझते हैं।


(13) दहेज पर प्रतिबंध:- “दहेज निरोधक अधिनियम, 1961" के अनुसार दहेज लेना व देना दोनों ही कानूनी अपराध माना गया है। यद्यपि यह आशा की गयी थी कि शिक्षा में प्रसार के साथ-साथ दहेज प्रथा भी घट जाएगी किंतु देखा यह गया है कि लड़के की शिक्षा के आधार पर दहेज की मांग बढ़ी है। फिर भी सकारात्मक रूप से यह कहा जा सकता है कि आज का युवा वर्ग दहेज विरोधी हो रहा है। अंतर्जातीय विवाहों की वृद्धि के साथ-साथ दहेज की भी समाप्ति होगी, ऐसी अपेक्षा की जाती है।


(14) बाल विवाह की समाप्ति:- नवीन विवाह अधिनियम के अनुसार वर की आयु 21 वर्ष तथा वधू की आयु 18 वर्ष तय करके बाल विवाह पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इससे पूर्व बाल-विवाह का प्रचलन चरम पर था। इस नियम के बाद शहरों में बाल विवाह की प्रवृत्ति काफी कम हुई है। परंतु गाँवों में अब भी बाल विवाह का प्रचलन देखने को मिल रहा है। शहरों में शिक्षा के प्रसार व चेतना के विकास के साथ-साथ बाल विवाह समाप्त हो रहे हैं व इसके स्थान पर विलम्ब विवाह की मात्रा बढ़ रही है। ऐसा माना जाता है कि विलम्ब विवाह से दंपत्ति के स्वास्थ्य की रक्षा, स्वस्थ संतान, व्यक्तित्व के विकास एवं जीवन साथी के चुनाव में सहायता मिलती है।


(15) एक विवाह का प्रचलन:- हिंदू विवाह अधिनियम, 1935 के द्वारा बहुपत्नी एवं बहुपति विवाह को समाप्त कर उसके स्थान पर एक विवाह को मान्यता दी गयी। अब कोई भी पक्ष पहले के विवाह साथी के जीवित रहते हुए बिना तालक के दूसरा विवाह नहीं कर सकता। हालाकि यह एक वैधानिक पक्ष हैं। व्यवहार में तो अब भी बहुत कम ही सही लेकिन समाज में बहुपत्नी पक्ष, कुलीन विवाह, बहुपति प्रथा का प्रचलन पाया जाता है।


(16) विधवा विवाह की स्वीकृति:- हिंदुओं में कुछ समय पूर्व तक विधवा स्त्री को पुनर्विवाह करने की स्वीकृति नहीं थी किंतु अब कानून द्वारा ऐसे विवाहों को मान्यता प्रदान की गयी है और उसे संपत्ति का अधिकार भी दिया गया है। वर्तमान में लोग विधवा पुर्नविवाह के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण भी अपना रहे हैं। 


(17) विवाह के उद्देश्य में अंतरः- पहले हिंदू समाज में विवाह का प्रथम उद्देश्य धार्मिक कार्यों का संपादन माना जाता था, परंतु वर्तमान में प्रथम उद्देश्य संपूर्णतः समाप्त हो चुका है तथा दूसरा व तीसरा उद्देश्य अर्थात् यौन इच्छाओं की पूर्ति व संतानोत्पत्ति का महत्व बढ़ता जा रहा है।