वर्ण व्यवस्था की विशेषताएं - Characteristics of the alphabet
वर्ण व्यवस्था की विशेषताएं - Characteristics of the alphabet
(1) सामाजिक स्तरीकरण:- प्रत्येक समाज में स्तरीकरण की कोई न कोई व्यवस्था होती है जिसके
आधार भी अलग-अलग होते हैं वर्ण व्यवस्था की परंपरागत भारतीय समाज में स्तरीकरण का एक प्रकार है। इसके दो प्रमुख आधार हैं -
(a) सैद्धांतिकः वर्ण व्यवस्था का सिद्धांत कर्म पर आधारित है। भारतीय दर्शन इस सिद्धांत पर आधारित एवं प्रमाणित है कि
"कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहिं सो तस फल चाखा"
अर्थात इस कर्म प्रधान ब्रह्मांड की यही रीति है जो जैसे कार्य करेगा वैसा ही फल प्राप्त करेगा।
(b) व्यवहारिक:- वर्ण व्यवस्था का व्यवहारिक स्वरूप यह है कि इसका आधार जन्म है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र समकालीन भारत में जन्म पर आधारित स्तरीकरण की प्रतिनिधि हैं तथा इसमें कर्म का कोई स्थान नहीं है।
(2) अधिकार एवं कर्तव्य का समन्वयः वर्ण व्यवस्था समाज में व्यक्तियों के अधिकारों एवं कर्तव्यों की निश्चित व्यवस्था करती है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अधिकार एवं कर्तव्य उसके जीवंत उदाहरण है। प्रत्येक व्यक्ति को निश्चित कार्य अपना तथा उन कार्यों के बदले में अधिकार प्रदान करना ही वर्ण व्यवस्था का उद्देश्य है।
(3) आध्यात्मिक विकास: भारतीय संस्कृति का आधार ही अध्यात्मवाद है। यही कारण है कि वर्ण व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति के कर्तव्यों का निर्धारण किया गया है तथा स्वधर्म पालन को महत्व प्रदान किया गया है। मानव के आध्यात्मिक विकास का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है व्यक्तित्व बाद को समूहवाद में समाहित कर देना। प्रत्येक व्यक्ति व धर्म का पालन करते हुए अपने कर्तव्यों की पुष्टि करता है। इससे उसे संतोष मिलता है। आत्मसंतोष की भावना का विकास ही आध्यात्मिक विकास का पहला चरण है।
(4) अनुलोम विवाह को महत्व:- वर्ण व्यवस्था के माध्यम से अनुलोम विवाह को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया था। इस व्यवस्था के द्वारा ऊंचे कुल का व्यक्ति निम्न कुल की कन्या से विवाह कर सकता था।
(5) वंशानुगत व्यवसाय:- यह समाज की वह व्यवस्था थी जिसमें व्यक्ति अपनी योग्यता इच्छा और रूचि के अनुसार व्यवसायों का चुनाव करता था। अतः समाज में कोई संघर्ष की भावना नहीं मिलती थी।
(6) गुणात्मक प्रेरणा:- वर्ण व्यवस्था प्रत्येक व्यक्ति को अपने कार्यों को संपादित करने की प्रेरणा प्रदान करती है। इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति अच्छे कार्यों को करने की ओर प्रेरित होता है।
(7) समाज का संतुलित विकास:- इस व्यवस्था में व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार अपने व्यवसाय का चुनाव करता था जिससे वृत्ति संबंधी समाज में कोई असामंजस्य की स्थिति नहीं आती थी तथा समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति भी होती थी जिसके कारण समाज का वांछनीय विकास होता था।
(8) सामाजिक नियंत्रण के रूप में:- इस व्यवस्था में सबके कर्तव्य निर्धारित होते थे जिनके कारण कोई भी असमंजस व संघर्ष की स्थिति नहीं आती थी। इसलिए कहा जा सकता है कि यह प्राचीन हिंदू सामाजिक व्यवस्था में नियंत्रण के रूप में कार्य करता था।
(9) कर्म आधारित व्यवसाय:- वर्ण व्यवस्था को कर्म व्यवस्था भी माना जा सकता है क्योंकि यह व्यवस्था व्यक्ति के कार्यों एवं उत्तरदायित्व को परिभाषित करने के साथ-साथ उसे पूर्ण करने की प्रेरणा भी देता है।
वार्तालाप में शामिल हों