नगरीय समुदाय की विशेषताएं - Characteristies of Urban Society

नगरीय समुदाय की विशेषताएं - Characteristies of Urban Society


नगरीय समुदाय की अवधारणा को समझने की दृष्टि से इसकी निम्नांकित विशेषताओं को जान लेना आवश्यक है। इस संदर्भ में विद्वानों का उल्लेख इस प्रकार है-


किंग्सले डेविस ने नगर की सामाजिक संरचना की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है जैसे- सामाजिक विभिन्नता, द्वितीयक संघ, सामाजिक सहिष्णुता, द्वितीयक नियंत्रण, सामाजिक गतिशीलता, ऐच्छिक संघ, स्थानीय अलगाव, व्यक्तिवाद इत्यादि।


रोनाल्डो फ्रीडमैन ने नगरीय समुदाय की विशेषताएं इस प्रकार बताई है- समूह एवं व्यक्तियों के बीच कार्यात्मक अन्योन्याश्रितता, अधिक जनसंख्या एवं अधिक जनघनत्व, विभिन्नताएँ, परिवार के कार्यों में कमी, सदस्यों में अंजानापन, संदेशवाहन के साधनों की बहुलता, प्राथमिक संबंधों का अभाव. श्रमविभाजन एवं विशेषीकरण, संस्कृति की परिवर्तनशील प्रकृति आदि।


पार्क, बर्गेस, एंडरसन, जिमरमैन, नेल्स एवं सोरोकिन आदि विद्वानों द्वारा उल्लेखित नगरीय समुदाय एवं जीवन की विशेषताओं को हम इस प्रकार प्रकट कर सकते हैं


• जनसंख्या की बहुलता (Congestion) - ग्राम एवं नगर का भेद प्रमुखता जनसंख्या के आधार पर ही किया जाता है। शहरों में जनसंख्या एवं जन घनत्व अधिक पाया जाता है। जनसंख्या की अधिकता के आधार पर ही नगरों का विभिन्न श्रेणियों में जैसे-नगर एवं महानगर आदि में वर्गीकृत किया जाता है। जनसंख्या की अधिकता के कारण शहरों में गंदी बस्तियां में वृद्धि अपराध, आवास, बेरोजगारी एवं गरीबी से संबंधित अनेक समस्याएं पैदा की हुई है।


• जनसंख्या की विभिन्नता (Variety of population) - नगरों में विभिन्न धर्मों, मतों, संप्रदाय, जातियों, वर्गों, भाषाओं एवं प्रांतों से संबंधित लोग निवास करते हैं। अतः वहां की जनसंख्या में विभिन्नता पाई जाती है इस कारण शहरी लोगों के रहन-सहन, प्रथाओं, परंपराओं, वेश-भूषा एवं जीवन स्तर आदि में विभिन्नता देखने को मिलती है।


• व्यवस्थाओं में विभिन्नता (Variety of occupation) व्यवसायियों के असंख्य प्रकार भी नगरीय समुदाय की एक प्रमुख विशेषता है।

यहां शायद ही कोई ऐसा व्यवसाय हो जिसे की नगरों का प्रमुख व्यवसाय कहा जा सके। यहां तो रोजगारों में कई प्रकार की बहुलता एवं विभिन्नता होती है। नगर के कार्यों की कई प्रकार की श्रेणियों होती है जैसे अध्यापक, क्लर्क, बैंक अधिकारी, दुकानदार, मिल मालिक. ड्राइवर. मजदूर इनके अलावा फल-फूल, लकड़ी से जुड़े रोजगार, सिगरेट, माचिस, दवा, कपड़ा, कागज, दूध उद्योग, चमड़ा, मशीन निर्माण, प्लास्टिक, लोहा, ईट, सीमेंट, कागज आदि प्रकार से संबंधित एवं अन्य हजारों प्रकार के व्यवसाय नगर में देखने को मिलते हैं।


• श्रम विभाजन एवं विशेषीकरण (Division of labour and specialization) - नगरों में प्रायः सभी कार्य विशेषकर उद्योग धंधों से संबंधित कार्य बड़े पैमाने पर ही होते हैं जिसके कारण श्रम विभाजन अति आवश्यक हो जाता है। श्रम विभाजन के संदर्भ में बड़े पैमाने के कार्यों को करने तथा उन्हें संचालित करने के लिए विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है। इसलिए नगरों में जज, प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर आदि अपने-अपने क्षेत्रों में विशेषज्ञ होते हैं। इतना ही नहीं विभिन्न पक्षों से संबंधित विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है जैसे डॉक्टरों में हृदय विशेषज्ञ, हड्डी एवं जोड़ विशेषज्ञ, आंख विशेषज्ञ इत्यादि।


• द्वितीयक संबंधों की प्रधानता (Importance of secondary relationship) - चूँकि नगरों की जनसंख्या अधिक होती है अतः यहां सभी लोगों में एक-दूसरे से आमने-सामने के घनिष्ठ एवं प्राथमिक संबंध स्थापित करना कठिन होता है इसलिए नगर में लोगों के बीचऔपचारिक एवं द्वितीयक संबंधों की अधिकता पाई जाती है।


• कृत्रिमता और फिजूलखर्ची (Artificiality and Extravagance) - नगरीय जीवन शैली की एक अन्य विशेषता आडंबर युक्त भाव, विचार एवं व्यवहार हैं। नगरीय समुदाय में व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा कृत्रिमता और बाहरी दिखावे पर बहुत कुछ निर्भर करती है। शहरों में एक सामान्य से प्रचलन है कि व्यक्ति के रहने या बैठने का स्थान, आचार-व्यवहार, बातचीत करने के ढंग आदि में जितनी चमक दमक एवं कृत्रिमता होगी उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा उतनी ही अधिक होगी। अतः इसी कृत्रिमता को बनाए रखने के लिए नगरों में लोग अत्यधिक फिजूल खर्च भी करते रहते हैं।


• सामाजिक गतिशीलता एवं सहनशीलता (Social Mobility and Tolerance) - नगरीय समुदाय में श्रम विभाजन, प्रतिस्पर्धा और विभिन्नता के कारण सामाजिक गतिशीलता की मात्रा भी अधिक होती है।

यहां पर जब योग्यता के अनुसार हर समय व्यवसायों में परिवर्तन लाया जा सकता है तो लोग भी अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सशक्त बनाने के लिए अपने रोज़गारों में परिवर्तन करते रहते है। इस प्रकार के परिवर्तन से अन्य क्षेत्रों में भी तीव्रता से परिवर्तन आयी है। इसके अतिरिक्त सामाजिक दायरा बढ़ने के कारण और विभिन्न व्यक्तियों और समूहों के आपस मेंसंपर्क में आने के कारण एक-दूसरे के प्रति सहनशीलता का विकास भी हुआ है। इसके अलावा नगरों में स्थानीय गतिशीलता अधिक पाई जाती हैं। अवसरों की बहुलता, यातायात व संचार के साधनों की अधिकता के कारण नगरीय लोगों का एक स्थान छोड़कर अन्य स्थान पर जाना सरल होता है जिसके कारण नगरों में स्थैतिक गतिशीलता अधिक देखने को मिलती हैं।


• सामाजिक विभिन्नता (Social Heterogeneity) - नगरीय समुदाय की प्रमुख विशेषता है यहाँ के सामाजिक जीवन में पाई जाने वाली विभिन्नता। दूसरे शब्दों में नगरों के जीवन में एकरूपता का अभाव होता है

तथा यह विभिन्नताओं का केंद्र भी होता है। नगरों में उद्योग धंधे, व्यापार और मूलभूत सुविधाएं होने के कारण यहां कई जाति, धर्म, संप्रदाय के व्यक्ति आकर बस जाते है। जिसके कारण नगरीय जीवन के प्रत्येक पक्ष में विभिन्नता की झलक देखने को मिलती है। इस विभिन्नता के कारण ही व्यक्तियों के रहन-सहन, भाषा, वेशभूषा, चाल-चलन आदि एकरूपता नहीं आ पाती और इस रूप में नगरों में सामाजिक विभिन्नता बनी मिलती रहती हैं।


• व्यक्तिवादित (Individualism) - नगरीय समुदाय में व्यक्ति की प्रतिष्ठा जन्म के आधार पर न होकर उसके व्यक्तिगत गुण पर निर्भर होती हैं। नगरों का यह आदर्श व्यक्तियों को इतना स्वार्थी बना देता है। वह अपने हित की पूर्ती में लग जाता है कभी-कभी तो यह व्यक्तिवादी आदर्श भयंकर रूप धारण कर लेता है कि वह स्वयं के अलावा कुछ और सोचा ही नहीं पाता है। नगरीय समाज में व्यक्ति अधिक आत्म केंद्रित होते हैं।

व्यक्ति हर कार्य को अपने व्यक्तिगत लाभ-हानि को सोचकर करते हैं। इसलिए सामूहिक हित की अपेक्षा अपने पर अधिक ध्यान दिया जाता है और व्यवसाय के अधिक अवसर निश्चित आमदनी और सुरक्षित भविष्य आने के कारण नगरीय समाज के सदस्य तुलनात्मक रूप से अधिक व्यक्तिवादी होते भी हैं। उनमें सामुदायिक भावना की भी कमी पाई जाती है।


• धर्म एवं परिवार का कम महत्व (Lesser importance of religion & family) - नगरों में शिक्षा एवं विज्ञान से अधिक संबंध होने के कारण धर्म का महत्व काफी कम हो गया है। कर्मकांड, पूजा पाठ, यज्ञ, हवन में अधिक रुचि नहीं रखते हैं। धर्म के बजाय अपने स्वयं की शक्ति में विश्वास करने लगे हैं। शिक्षा के कारण रूढ़िवादिता समाप्त हो रही है फलतः लोग धार्मिक अधविश्वास को समाप्त कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त नगरों में अनेक सुविधाएं होने के कारण परिवार का महत्व भी घटा है जैसे भोजन, शिक्षा, सुरक्षा.बच्चों के देख-रेख,चिकित्सा, वस्त्र, दवा इत्यादि से संबंधित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक प्रकार की द्वितीय संस्थाओं का निर्माण हो गया है जो अब इन आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगे हैं। अतः जिन आवश्यकताओं की पूर्ति परिवार द्वारा होती थी अब अन्य संस्थाओं द्वारा इनकी पूर्ति होने लगी है जिसके के कारण उत्तरोत्तर परिवार का महत्व घटता जा रहा है।


• अधिक मानसिक संघर्ष (More mental conflict) - समुदाय में प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार का मानसिक संघर्ष चलता रहता है। नगरों में यदि एक और खाने-पीने धन कमाने और जीवन चलाने की अनेकों सुविधाएं उपलब्ध है तो दूसरी ओर दुर्घटना, बेकारी, व्यापार में हानि आदि भी रोज की घटनाएं हैं। इन अनिश्चितता में मनुष्य को मानसिक शांति प्राप्त नहीं हो पाती और जिस प्रकार से नगरों में द्वितीयक संबंधों की प्रधानता हुई है उस परिस्थिति में अपनी किसी भी समस्या में खुद को व्यक्ति बहुत ही अकेला पाता है जिसकी वजह से वह मानसिक रूप से कमजोरऔर व्यथित होता जाता है और विभिन्न प्रकार के मानसिक रोगों से ग्रसित होता जाता है।


• द्वितीयक नियंत्रण की प्रधानता (Importance of secondary control)- नगरीय समुदाय में द्वितीयक समितियों की प्रधानता होती है जैसे कारखाना, कॉलेज, श्रमिक संघ आदि। साथ ही यह सभी समितियां या समूह अपने विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए कार्य कर रहे होते हैं। इस अवधि के दौरान इन नियंत्रण की समस्या उठ खड़ी होती है। ये समितियाँ इतने विभिन्न प्रकार की होती हैं कि इन पर प्रथा, परंपरा या धर्म के माध्यम से नियंत्रण रखना असंभव होता है इसलिए इन पर द्वितीयक नियंत्रण के साधन जैसे कानून, पुलिस, कोर्ट, सेना आदि का प्रयोग किया जाता है। अतः हम यह कह सकते हैं कि नगरों में नियंत्रण के लिए द्वितीयक साधनों का प्रयोग किया जाता है।