विषय का चुनाव - choice of subject

 विषय का चुनाव - choice of subject


शोध का यह चरण सबसे अधिक प्राथमिक और महत्वपूर्ण है। एक शोधकर्ता चाहे कितना भी योग्य क्यों ना हो, आरंभ में ही शोध से संबंधित विषय का चुनाव दोषपूर्ण हो जाता है तो अध्ययनकर्ता किसी भी तरह अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता। नॉरथाप (Northrop) का कथन है कि, "शोध कार्य एक ऐसे जहाज की तरह है जो किसी बंदरगाह से दूर के गंतव्य तक जाने के लिए अपनी यात्रा आरंभ करता है। यदि आरंभ में गंतव्य की दिशा का निर्धारण करने में साधारण सी भूल हो जाए तो उसे भटक जाने की पूरी संभावना रहती है, चाहे वह जहाज कितना ही अच्छा क्यों ना हो तथा उसका कप्तान कितना ही अच्छा नाविक क्यों ना हो।" इससे स्पष्ट होता है कि शोध का सबसे पहला चरण शोधकर्ता द्वारा अत्यधिक सावधानीपूर्वक अध्ययन विषय का चुनाव करना है।

विषय का चुनाव करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अध्ययन विषय ऐसा हो जिस पर निश्चित समय में उपलब्ध उपकरणों की सहायता से अध्ययन कार्य को पूरा किया जा सके। इस संबंध में पी.वी. यंग ने चार विशेष सावधानियों का उल्लेख किया है- सर्वप्रथम विषय ऐसा हो जिसको समझने की शोधकर्ता में योग्यता हो तथा जिससे संबंधित अध्ययन एक निश्चित समय में पूरा किया जा सके। दूसरा, यदि उस विषय से संबंधित कोई अन्य शोध कार्य न किए गए हों तो विषय का अध्ययन क्षेत्र बहुत अधिक व्यापक नहीं होना चाहिए। तीसरा, 'से यह ध्यान रखना आवश्यक है कि चुने गए विषय का अध्ययन उपलब्ध प्रविधियों की सहायता से संभव है अथवा नहीं तथा चौथा यह भी देखना आवश्यक है कि उस विषय पर वैज्ञानिक शोध करने से किस सीमा तक यथार्थ निष्कर्ष प्रस्तुत किए जा सकते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि ऐसे विषय का चयन नहीं करना चाहिए जिससे संबंधित प्रमाणिक तथ्य उपलब्ध ना हो सके अथवा जिससे संबंधित अध्ययन के लिए कुशल पद्धतियां उपलब्ध ना हो।