ईसाई परिवार: परिचय और विशेषताएं - Christian Family: Introduction and Features
ईसाई परिवार: परिचय और विशेषताएं - Christian Family: Introduction and Features
किसी भी समाज में व्यक्ति के जन्म, पालन-पोषण, विकास और उसके सामाजीकरण में परिवार की भूमिका प्रमुख होती है। समाज के अस्तित्व को बनाए रखने में परिवार सहायक के तौर पर कार्य करता है। ईसाई परिवार में उनके समाज की स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती है। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि सभी ईसाई परिवारों की सामाजिक व्यवस्था में कुछ असमानताएं पाई जाती हैं। भारतीय ईसाई परिवारों के समाज और संस्कृति में पाई जाने वाली भिन्नता को डॉ. शर्मा ने अपनी पुस्तक भारतीय समाज एवं संस्कृति' में प्रस्तुत किया है-
1) यूरोप से आकर भारत में निवास करने वाले ईसाई परिवार
2) हिंदू अथवा मुसलमान से ईसाई के रूप में परिवर्तित हुए परिवार
3) उक्त दोनों श्रेणियों के मिश्रण से बने ईसाई परिवार
4) जनजातीय ईसाई परिवार
उपरोक्त प्रस्तुत वर्गीकरण के अलावा ईसाई परिवारों को धार्मिक आधार पर दो रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है – पहला, कैथोलिक और दूसरा, प्रोटेस्टेंट। उनमें भी अनेक उप-भाग पाए जाते हैं तथा साथ में इनकी सामाजिक व्यवस्था में भी भिन्नता देखने को मिलती है। ईसाई परिवारों में भिन्नता तथा पृथक सामाजिक व्यवस्था के बावजूद कुछ सामान्य विशेषताओं को चिन्हित किया जा सकता है, जो संयुक्त रूप से ईसाई परिवार को अभिव्यक्त कर सकती हैं। ईसाई
परिवार की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं-
क) पितृसत्तात्मक परिवार
ईसाई परिवार पितृसत्तात्मक प्रकृति के होते हैं अर्थात् उनमें सत्ता का हस्तांतरण पिता से पुत्र की ओर होता है। ए परिवार पितृसत्तात्मक होने के साथ-साथ पितृवंशीय भी होते हैं अर्थात् वंशनाम भी पिता से पुत्र की ओर बढ़ता है।
परिवार में पिता का स्थान ही सर्वोपरि रहता है तथा वही परिवार का मुखिया भी माना जाता है। पारिवारिक निर्णयों में वह मुख्य भूमिका निभाता है। संपत्ति पर अधिकार भी पिता/पति का ही रहता है। ईसाई परिवारों के पितृसत्तात्मक स्वरूप के अपवाद के रूप में मालबार में कुछ ईसाई परिवार मातृसत्तात्मक प्रकृति के भी हैं। इनमें माता की सत्ता उसकी पुत्री को प्राप्त होती है। हालांकि इन मातृसत्तात्मक प्रकृति के ईसाई परिवारों की संख्या बहुत कम है।
ख) छोटा आकार
वैयक्तिक स्वतंत्रता के कारण ईसाई परिवारों में संयुक्त परिवारों का अभाव पाया जाता है। ईसाई समाज में परिवारों के आकार प्रायः छोटे होते हैं। इसके अलावा इसाइयों में पश्चिमी शिक्षा और प्रगतिशील दृष्टिकोण के कारण बच्चों की संख्या भी सीमित रखी जाती है तथा इस कारण भी परिवार का आकार छोटा रहता है।
जहां हिंदू और मुस्लिम परिवार विवाह के उपरांत भी अपने माता-पिता के परिवार में ही रहते हैं, वहीं इसाइयों में विवाह के पश्चात प्रायः नव दंपति पृथक रहने लगते हैं तथा एकाकी परिवारों को ही महत्व प्रदान करते हैं।
ग) संयुक्त संपत्ति और आय का अभाव
चूंकि ईसाई समाजों में एकाकी परिवार पाए जाते हैं, तो स्वाभाविक तौर पर इन परिवारों में संयुक्त संपत्ति का अभाव पाया जाता है। यहाँ न ही कोई संयुक्त संपत्ति होती है और ना ही कोई संयुक्त कोष, जो सदस्यों की आवश्यकताओं को पूरा करने में सहयोग दे सके। यहाँ संयुक्त कोष का तात्पर्य उस धन-संपत्ति से है जैस्पर संयुक्त परिवार में प्रत्येक सदस्य का अधिकार रहता है तथा आवश्यकता पड़ने पर कोई भी उसका उपयोग कर सकता है।
घ) संतुलित अर्थव्यवस्था
ईसाई समाज संभवतः शिक्षित होता है तथा परिवार द्वारा किसी भी अनुष्ठान, कर्मकांड, रूढ़ियों आदि पर व्यय नहीं किया जाता है। उदाहरण के तौर पर, समान्यतः एक हिंदू परिवार एक विवाह में जितना धन खर्च कर देता है, उतने धन का आधा भी खर्च ईसाई परिवार द्वारा किए जाने वाले एक विवाह में नहीं किया जाता है। परिणामस्वरूप धन का प्रयोग अन्य मदों में व्यवस्थित तरीके से किया जाना सरल व संभव रहता है। इस प्रकार से ईसाई परिवारों में संतुलित अर्थव्यवस्था पाई जाती है। ईसाई परिवार अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा मनोरंजन, वस्त्र आदि पर करते हैं।
ङ) समानता की भावना
ईसाई परिवार के सदस्यों में उच्च निम्न की भावना नहीं पाई जाती तथा वे समानता का एक श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
परिवार में स्त्रियों तथा पुरुषों के अधिकारों और स्वतंत्रता में भी समानता पाई जाती है। इसके अलावा परिवार में बड़े अथवा बुजुर्गों का निरंकुश शासन भी नहीं होता है तथा पिता-पुत्र के बीच पारस्परिक मित्रता-बोध का संबंध पाया जाता है। स्वतंत्र होकर घूमना, वार्तालाप करना, साथ भोजन करना, विचारों का आदान-प्रदान करना आदि विशेषताएं ईसाई परिवारों की समानता की भावना को अभिव्यक्त करती हैं।
च) अर्जित आधार
ईसाई समाज व्यक्तिवादी प्रकृति के होते हैं तथा परिवार में सदस्यों की स्थिति का कोई प्रदत्त संस्तरण नहीं होता है। ईसाई परिवार में सदस्य की स्थिति का निर्धारण उसकी योग्यता, पद, शिक्षा तथा कुशलता के आधार पर किया जाता है। इस व्यक्तिवादी धारणा के कारण ही परिवार में स्त्रियों की स्थिति भी उच्च हो सकती है।
छ) रूढ़ियों की अल्पता
जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि ईसाई परिवारों में धार्मिक मान्यताओं को लेकर रुझान कम रहता है।
शिक्षित और प्रगतिशील विचारों से संबंधित होने के कारण उनमें रूढ़ियों और अनुष्ठानों आदि का महत्व नहीं देखने को मिलता है। इन समाजों में बपतिस्मा' के अलावा किसी भी संस्कार को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। बपतिस्मा का तात्पर्य एक बालक को किशोर होने पर चर्च की सदस्यता लेकर शिक्षा ग्रहण करने से है। ईसाई समाजों में पढ़ प्रथा तथा बाल विवाह नहीं पाया जाता है और विलंब विवाह तथा विधवा पुनर्विवाह को स्वीकृति प्रदान की गई है।
ज) स्त्रियों की उच्च स्थिति
ईसाई समाजों में स्त्रियों की स्थिति अन्य समाजों की तुलना में उच्च होती है। ईसाई समाज में स्त्रियों की उच्च स्थिति का कारण व्यक्तिवादी प्रवृत्ति है। परिवार के प्रत्येक क्रिया-कलापों में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर महत्व दिया जाता है। व्यावहारिक रूप से भी परिवार के प्रत्येक कार्य में स्त्रियों की राय ली जाती है। ईसाई स्त्रियाँ कहीं भी आने-जाने और क्रियाकलापों में भाग लेने के लिए स्वतंत्र होती हैं। यही कारण है कि वे सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से सहभागिता करती हैं।
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