ईसाई विवाह के उद्देश्य और विवाह पद्धति - Christian Marriage Purposes and Marriage Methods
ईसाई विवाह के उद्देश्य और विवाह पद्धति - Christian Marriage Purposes and Marriage Methods
इसाइयों में विवाह मात्र यौन संबंध तथा परिवार के निर्माण तक ही सीमित नहीं है, अपितु यह जीवन के कुछ पवित्र उत्तरदायित्वों के निर्वहन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होता है। ईसाई समाज के अनुसार विवाह एक धार्मिक प्रक्रिया है। ईसाई विवाह के प्रमुख उद्देश्यों को हम निम्न बिंदुओं के आधार पर समझ सकते हैं
1- पवित्र जीवन की प्राप्ति
पवित्र जीवन को प्राप्त करना ईसाई विवाह संस्था का एक मुख्य उद्देश्य है। उत्तर भारत के संयुक्त चर्च के संविधान में पवित्र व्यवस्था के रूप में विवाह संस्था को मान्यता प्रदान की गई है तथा यही कारण है कि यह प्राकृतिक क्रम के रूप में विद्यमान है। ईसाई समाज में विवाह संबंध को ईश्वर और चर्च के संयुक्त अलौकिक संबंधों का प्रतीक माना गया है। पवित्र जीवन का आरंभ विवाह संस्था के मार्ग से होकर ही आरंभ होता है।
2- धार्मिक उद्देश्य
इसाइयों में विवाह को धार्मिक संस्था माना जाता है तथा विवाह चर्च में धर्मगुरुओं द्वारा संपन्न किए जाते हैं। धर्मगुरु विवाह के उपरांत वर-वधू को आशीर्वाद देते हैं तथा यह आशीर्वाद ईसाई विवाह के लिए वरदान माना जाता है। भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम में भी विवाह की इसी व्यवस्था को मान्यता प्रदान की गई है।
3- यौन संतुष्टि
यौन संतुष्टि, विवाह का सर्वमान्य उद्देश्य है तथा यह धारणा लगभग सभी सामाजिक व्यवस्थाओं में समान रूप पाई जाती है। विवाह संस्था के द्वारा यौन संबंधों को सामाजिक वैधता प्रदान की जाती है तथा इसके पश्चात उत्पन्न संतान को भी सामाजिक रूप से वैध माना जाता है। विवाह के उपरांत यौन संतुष्टि और सामाजिक वैधता संबंधी मापदंड ईसाई समाजों में भी अन्य समाजों के समान ही पाए जाते हैं।
4 परिवार की स्थापना
विवाह के उपरांत परिवार की स्थापना कर ही उत्पन्न संतान को वैधता तथा उसके पालन-पोषण का दायित्व निभाया जा सकता है. अतः ईसाई सामाजिक व्यवस्था में भी परिवार की स्थापना को विवाह का अगला चरण माना गया है। इसमें पति-पत्नी प्रेम व सहयोग की भावना रखते हैं तथा संतान के प्रति आवश्यक दायित्यों का निर्वहन करते हैं। इसाइयों में यह माना जाता है कि पति-पत्नी संतानोत्पत्ति कर ईश्वर की रचनात्मक क्रिया में सहभागी बनते हैं और उनके संतान के पालन पोषण से वे ईश्वर की पालक शक्ति से अवगत होते हैं।
5- पारिवारिक सहयोग
विवाह के कारण स्त्री और पुरुष के मध्य घनिष्ठ संबंध स्थापित होते हैं। वे एक-दूसरे की इच्छाओं, जरूरतों, समस्याओं आदि के प्रति सहानुभूति रखते हैं। विवाह के उपरांत वे एक परिवार की तरह रहते हैं
123245
और आपस में प्रेम, सहयोग, त्याग आदि की भावना के साथ रहते हैं। ईसाई समाज में परिवार न केवल वैयक्तिक सहयोग व कल्याण तक सीमित रहता है, अपितु वह सामाजिक सहयोग और कल्याण के लिए भी अपनी प्रतिबद्धता प्रकट करता है।
6- संबंधों की स्थापना
इसाइयों में विवाह संबंध दृढ़ होते हैं तथा साथ ही स्थाई संबंधों को महत्व दिया जाता है। पति पत्नी के मध्य पर्ये जाने वाले प्रेम, त्याग और सहयोग के कारण उनके संबंध प्रगाढ़ हो जाते हैं। इसाइयों में विवाह को आजीवन बनी रहने वाली संस्था के रूप में माना गया है तथा धार्मिक रूप से विवाह-विच्छेद की अनुमति नहीं दी गई है।
इसाइयों में प्रचलित विवाह पद्धति के रूप में दो प्रमुख संस्कार होते हैं -
a. सगाई संस्कार
ईसाई समाज में जब स्त्री और पुरुष अथवा उनके संरक्षक विवाह संबंध के लिए सहमत हो जाते हैं या स्वीकृति दे देते हैं तो विवाह के पूर्व ही उनके लिए सगाई संस्कार किया जाता है। यह संस्कार इस बात की पुष्टि करता है कि इनका विवाह निश्चित हो चुका है। इसमें रिवाज यह है कि निर्धारित की गई तिथि वर-वधू के माता-पिता द्वारा चर्च के पादरी को दी जाती है और वह पादरी ही इस सूचना को संपूर्ण समाज तक पहुंचाने का काम करता है। सगाई संस्कार के अवसर पर वर-वधू के माता-पिता अपने सगे संबंधियों और परिचितों को आमंत्रित करते हैं। समान्यतः वधू का घर ही सगाई का स्थान निर्धारित किया जाता है तथा यहीं दोनों पक्षों के लोग इकट्ठा होते हैं। वर पक्ष द्वारा मिठाई, अंगूठी, रुपए, नारियल, रुमाल आदि लाए जाते हैं तथा कई बार तो वधू द्वारा पहने जाने वाले कपड़े भी वर पक्ष द्वारा ही लाए जाते हैं।
सगाई के दौरान वर-वधू को सभी के सम्मुख बैठाया जाता है और पादरी बाइबिल के कुछ अंश पढ़ता है तथा खुशी के गीत गए जाते हैं। संस्कार के अंत में वर-वधू द्वारा वौवाहिक बंधन की स्वीकृति ली जाती है तथा निशानी के तौर पर वर और वधू द्वारा एक दूसरे को अंगूठी, मिठाई, नारियल और बाइबिल की एक प्रति भेंट स्वरूप दी जाती है। दोनों एक दूसरे को अंगूठी पहनाते हैं तथा यह यह घोषणा की जाती है कि दोनों ने एक दूसरे के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने की स्वीकृति दे दी है। इसके पश्चात उपस्थित जनों को मिठाइयाँ अथवा अल्पाहार दिए जाते हैं और वर पक्ष वालों के लिए भोजन का प्रबंध वधू पक्ष के घर पर ही किया जाता है।
b. विवाह संस्कार
ईसाई समाज में सगाई के पश्चात ही विवाह संकर संपन्न होता है।
विवाह के पूर्व ही स्त्री और पुरुष को तीन शर्तें पूरी करनी होती हैं-
• चर्च की सदस्यता का प्रमाण पत्र प्राप्त करना
• चारित्रिक प्रमाण पत्र प्राप्त करना
• विवाह के लिए निर्धारित की गई तिथि से तीन सप्ताह पूर्व विवाह हेतु आवेदन पत्र देना
उक्त लिखित तीनों शर्तों के पूरा होने और विवाह संबंधी प्रार्थना पत्र मिलने के पश्चात संबंधित चर्च द्वारा यह सूचना प्रसारित कर दी जाती है कि अमुक स्त्री और पुरुष का विवाह निश्चित हुआ है, यदि किसी को इस विवाह से आपत्ति है तो वह लिखित आपत्ति दे सकता है और विवाह रोकने हेतु हर्जाना जमा कर सकता है। तीन सप्ताह तक यदि कोई आपत्ति नहीं होती है तो विवाह संस्कार संपन्न हो जाता है।
समान्यतः विवाह के लिए उस चर्च को चुना जाता है जिसकी सदस्य लड़की रहती है। प्रातः काल में 6-7 बजे वर-वधू पक्ष तथा आमंत्रित जन चर्च में उपस्थित हो जाते हैं। चर्च में वधू के प्रवेश के दौरान उसका स्वागत किया जाता है और गीत गए जाते हैं। चर्च का घंटा बजता है और सभी अपने निर्धारित स्थान पर जाकर बैठ जाते है। इसके बाद सभी लोगों को संबोधित करते हुए पादरी कहता है "अज़ीज़ों! खुदा के हुजूर और इन गवाहों के सामने हम उपस्थित हुए हैं कि इस मर्द और औरत को निकाह में बाँधे। हम तुमसे पूछते हैं कि इस निकाह से यदि किसी को आपत्ति हो, तो वह अपनी आपत्ति पेश करे। " यदि कोई भी आपत्ति पेश नहीं होती है तो वह वर-वधू से उनकी पारस्परिक रजामंदी के बारे में स्वीकृति प्राप्त करता है। इसके बाद पादरी दोनों से वादा लेता है कि वर विवाह की पवित्र स्थिति में वधू के •साथ जीवन बसर करे, सुख-दुख, तंगी, बीमारी, तदरुस्ती तथा हर हाल में उसके प्रति वफादार रहे, उसे प्यार करे। यदि वादे पादरी वधू से भी लेता है। इसके बाद वर और वधू अंगूठिया बदलते हैं, गीत गए जाते हैं तथा वे पादरी से आशीर्वाद लेते हैं। जो लोग इस प्रकार से विवाह न करके कोर्ट में विवाह करते हैं, उन्हें भी विवाह के उपरांत चर्च में पादरी से आशीर्वाद लेने आना पड़ता है।
वार्तालाप में शामिल हों