ईसाई विवाह - Christian marriage

ईसाई विवाह - Christian marriage


ईसाई सामाजिक व्यवस्था विवाह के परंपरागत प्रतिमानों और आधुनिक प्रतिमानों में पर्याप्त अंतर देखने को मिलता है। आधुनिक समय में विवाह को एक पवित्र संस्था के रूप में मान्यता प्रदान की गई है तथा इसे ईश्वरीय इच्छा के रूप में गृहस्थी बसाने, संतानोत्पत्ति और उनका पालन-पोषण, व्यभिचार से परे रहना, सहयोग और प्रेम की भावना को बनाए रखना आदि के लिए एक समझौते के रूप में प्रस्तुत किया गया है। एक ऐसा समझौता जो वैयक्तिक व सामाजिक कल्याण तथा कल्याण के लिए अपनी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करे।


उत्तरीओ भारत के संयुक्त चर्च के संविधान के अनुसार, "विवाह समाज में एक पुरुष और एक स्त्री के मध्य एक ऐसा समझौता है जो सामान्य रूप से आजीवन चलता है तथा इसका संबंध यौन संबंध, पारस्परिक संसर्ग और परिवार की स्थापना से होता है।"


परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि ईसाई विवाह एक प्रकार का समझौता है जो दो विपरीत लिंगियों के मध्य यौन संबंध तथा परिवार स्थापित करने की की स्वीकृति प्रदान करता है। यह समझौता जीवन भर चलता है तथा एक विवाह ही सर्वमान्य रूप माना जाता है। आजीवन संबंध होने के बावजूद यदि कोई समस्या अथवा असंतुष्टि की भावना आती है तो कोई भी पक्ष विवाह विच्छेद करने के लिए स्वतंत्र होता है। अतः कुल मिलकर ईसाई विवाह एक स्थाई समझौता है जो एक स्त्री और एक पुरुष को यौन संबंध स्थापित करने पारस्परिक सहयोग और परिवार बनाने की स्वीकृति प्रदान करता है।


भारतीय ईसाइयों में मुसलमानों की ही भांति विधवा पुनर्विवाह को मान्यता प्रदान की गई है। ईसाई समाज में विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित भी किया जाता है। ईसाइयों में बाल विवाह और दहेज जैसी समस्याएं प्रायः नहीं पाई जाती है।