नागरिक अधिकार कानून - civil rights law
नागरिक अधिकार कानून - civil rights law
व्यक्ति के मनवाधिकारों के संरक्षण हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ काफी समय से प्रयासरत है। संयुक्त राष्ट्र संघ का मजबूती विश्वास है कि यदि दुनिया, सामाजिक प्रगति, स्वतंत्रता, समानता, शांति आदि के साथ आगे बढ़े तो मानव की गरिमा और मानवाधिकारों की रक्षा आसानी से की जा सकती है। आज संयुक्त राष्ट्र संघ समकालीन विश्व में मानवाधिकारों के लिए संघर्षरत लोगो के लिए केन्द्रीय भूमिका अदा कर रहा है। अपनी एक घोषणा में संयुक्त राष्ट्र संघ ने कहा था कि प्रत्येक सदस्य राष्ट्र को अपने यहां एक राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था की स्थापना करनी चाहिए जो उस राष्ट्र विशेष में मानवाधिकार के संरक्षण के लिए कार्य करेगा। इस सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र संघ ने सबसे पहले चर्चा 1996 की थी।
संयुक्त राष्ट्र संघ के सन 1996 की आर्थिक सामाजिक परिषद् में मानवाधिकारों पर चर्चा की गयी थी। सन 1960 के दशक में इस बारे में और भी विस्तार से चर्चा दुनिया में की गयी। इसके बाद 1978 में जेनेवा में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों पर एक सम्मलेन हुआ।
1789 में फ्रांसिसी क्रांति हुई। उस साल 14 जुलाई को पेरिस की जनता द्वारा राज्य कारागार बास्तील का ध्वंस निरकुंश तंत्र और फ्रांस की पुरानी राज्य व्यवस्था के अंत का सूचक था। जून 1789 से ही फ्रांस की राष्ट्रीय सभा की बैठके आरम्भ हो गयी थी। उसने फ्रांस के लिए तैयार किये जाने वाले नए संविधान की प्रस्तावना के रूप में 26 अगस्त 1789 को मानव और नागरिक के अधिकारों की घोषणा अंगीकार की। इस घोषणा का प्रभाव सचमुच अंतरराष्ट्रीय था। उससे युरोप के लगभग सभी देशों को और मध्य और दक्षिण अमेरिका और बाद में एशिया तथा अफ्रीका के देशों के क्रन्तिकारी एवं लोकतान्त्रिक आंदोलनों को प्रेरणा मिली।
मानवाधिकार मोटे रूप में नैतिक और वैध हो सकते हैं।
नैतिक अधिकार वे होते है जो व्यक्तियों की नैतिकता पर आधारित होते है। इन अधिकारों को राज्य के नियमों का अनुमोदन प्राप्त नही होता है और इसलिए इसका उल्लंघन भी वैधानिक रूप से दंडनीय नही माना जाता है। इनका पालन व्यक्ति अपने अन्तः करन अथवा स्वाभाविक प्रेरणा से करता है।
नैतिक अधिकारों के विपरीत वैध अधिकार वे होते है जो राज्य के कानूनों के मान्य तथा रक्षित होते है और लोकतान्त्रिक राज्यों में सामान्यतया इन अधिकारों को न्यायिक संरक्षण प्राप्त होता है। वैध अधिकारों में नागरिक और राजनैतिक दोनों प्रकार के अधिकार सम्मिलित होते है। व्यक्तियों को इनका अनिवार्य से पालन करना पड़ता है। इनका उल्लंघन करने पर राज्य द्वारा व्यक्ति को दण्डित किया जा सकता है।
भारतीय संविधान द्वारा भारतीय नागरिकों को सात मूल अधिकार प्रदान किये गये थे, किन्तु 44 वे संविधानिक (1979) द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार के रूप में समाप्त कर दिया गया है।
अब संपत्ति का अधिकार केवल एक क़ानूनी अधिकार के रूप में है। इस प्रकार अब भारतीय नागरिकों को निम्नलिखित 6 मूल अधिकार प्राप्त है। -
1. समानता का अधिकार
2. स्वतंत्रता का अधिकार
3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
4. धार्मिक का स्वतंत्रता का अधिकार
5. संस्कृतिक तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार
6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार।
वार्तालाप में शामिल हों