वर्ग संघर्ष का सिद्धांत - class struggle theory
वर्ग संघर्ष का सिद्धांत - class struggle theory
मार्क्स ने सामाजिक परिवर्तन के लिए वर्ग संघर्ष की प्रक्रिया को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। यही कारण है कि मार्क्स के चिंतन के प्रत्येक स्तर पर किसी न किसी रूप में वर्ग-संघर्ष का अस्तित्व अवश्य देखने को मिलता है। मार्क्स का कथन है कि दुनियाँ में आज तक जो भी परिवर्तन हुए है उनके लिए वर्ग संघर्ष ही उत्तरदाई रहा है। यह सच है कि मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष की प्रकृति तथा इसकी प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए किसी पृथक पुस्तक की रचना नहीं की लेकिन जिन पुस्तकों में मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष संबंधी अपने विचारों को अभिव्यक्त किया, उनमें (साम्यवादी घोषणा-पत्र (, ( पूँजी (, (राजनैतिक अर्थव्यवस्था की समालेचना ( तथा ( फ्रांस में वर्ग संघर्ष ( आदि पुस्तकें प्रमुख है। इनमें मार्क्स ने उन दशाओं को भी विस्तृत विवेचना की है जो वर्ग संघर्ष की प्रक्रिया को प्रोत्साहन देती है।
बेंडिक्स तथा लिप्सेट (R. Bendix and S. M. Lipset) ने अपनी पुस्तक (वर्ग, प्रस्थिति तथा शक्ति) (Class, Status and Power) में उन महत्वपूर्ण तत्त्वों की सरल रूप में विवेचना की है
जिन्हें मार्क्स ने वर्ग संघर्ष के आवश्यक तत्त्वों के रूप में स्वीकार किया। यही तत्त्व उन दशाओं को स्पष्ट करते हैं जो पूँजीवादी समाजों में वर्ग संघर्ष के लिए उत्तरदाई होती है। वर्ग संघर्ष की प्रक्रिया को समझने से पहले संक्षेप में इन दशाओं को समझना आवश्यक है:-
(1) वितरण में द्वंद्व (Conflict Over Distribution) - बेंडिक्स तथा लिप्सेट का कथन है कि मार्क्स द्वारा समाज में वर्ग संघर्ष के जिन तत्त्वों की चर्चा की गई है उनमें पहला तत्त्व यह है कि समाज में वर्गों का निर्माण उत्पादन के वितरण में होने वाले द्वंद्व के फलस्वरूप होता है। किसी समाज में जो भी उत्पादन होता है उसका वितरण समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों में किया जाता है। पूँजीवादी व्यवस्था में उत्पादन के वितरण का एक बड़ा भाग पूँजीपति वर्ग को मिल जाता है जबकि संख्या बहुत अधिक होने के बाद भी सर्वहारा वर्ग के लोगों की उत्पादन का बहुत कम भाग प्राप्त हो पाता है। यहीं वह तत्त्व है जो श्रमिकों की वर्ग-चेतना में वृद्धि करता है।
(2) संचार ( Communication) मार्क्स ने संचार को वर्ग संघर्ष के दूसरे प्रमुख तत्त्व के रूप में स्वीकार किया है। मार्क्स का कथन है- “समान वर्ग के लोगों के बीच सहजता से संचार होने लगता है जिसके कारण एक वर्ग के लोगों में विचारों और कार्यक्रमों का तेजी से प्रसार होता है।" इस प्रकार संचार भी वर्ग संघर्ष में वृद्धि करने वाली एक प्रमुख दशा है।
(3) वर्ग-चेतना का विकास (Development of Class-consciousness) वर्ग-संघर्ष का संभवतः सबसे प्रमुख तत्त्व विभिन्न वर्गों में वर्ग-चेतना का विकास होना है। वर्ग-चेतना की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए मार्क्स का कथन है कि एक वर्ग के लोग जब अपनी शक्ति और एकता के बारे में जागरूक हो जाते हैं तथा अपने वर्ग की ऐतिहासिक भूमिका को समझने लगते हैं तब इसी भावना को हम वर्ग चेतना कहते हैं। विभिन्न वर्गों तथा मूख्यतः सर्वहारा वर्ग में वर्ग-चेतना का विकास ही संघर्ष की जन्म देता है।
(4) असंतोष (Dissatisfaction) मार्क्स का कथन है कि जब समाज का निम्न वर्ग अर्थिक संरचना पर नियंत्रण रखने में कोई उपयोगी भूमिका नहीं निभा पाता तथा यह समझने लगता है
कि उस आर्थिक संरचना में उसका शोषण हो रहा है। तब उसमें असंतोष में जितनी वृद्धि होती है, उस वर्ग का संगठन उतना ही सुदृढ़ होता जाता है।
(5) राजनैतिक संगठन (Political Organization) - मार्क्स के अनुसार वर्ग-निर्माण की अंतिम दशा यह है कि एक वर्ग के अंतर्गत आने वाले व्यक्ति मिलकर एक राजनैतिक संगठन का निर्माण कर लें। बेंडिक्स तथा लिप्सेट ने लिखा है कि मार्क्स के दृष्टिकोण से समान वर्ग के लोगों का राजनैतिक संगठन एक विशेष आर्थिक संरचना, ऐतिहासिक परिस्थितियों तथा वर्ग-चेतना की वृद्धि का ही परिणाम होता है।
फ्रांसिस अब्राहम तथा मॉर्गन (Abraham and Morgan) ने लिखा है कि मार्क्स के अनुसार सामाजिक वर्गों के विकास के लिए उत्पादन की एक विशेष संरचना ही पर्याप्त नहीं है। सामाजिक वर्गों के निर्माण के लिए व्यक्तियों का एक-दूसरे के समीप होना उनके बीच विचारों का संवहन होना तथा वर्ग- चेतना का विकास होना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, एक छोटे ग्रामीण क्षेत्र में बहुत से लोग समान परिस्थितियों में रहते हैं किंतु उनके एक-दूसरे से अलग होने के साथ ही उनमें समान हितों से संबंधित होई चेतना भी नहीं होती। यहीं कारण है कि ऐसे लोग एक वर्ग का निर्माण नहीं कर पाते। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि केवल शारीरिक निकटता अथवा समान परिस्थितियाँ ही वर्ग-निर्माण का एकमात्र आधार नहीं है। इस संदर्भ में कार्ल मार्क्स ने लिखा है कि वर्गों के निर्माण के लिए सामाजिक परिस्थितियों के प्रति असंतोष एवं वर्ग-चेतना का होना उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना महत्वपूर्ण तथ्य समान वर्ग के लोगों के बीच शारीरिक निकटता तथा संचार का होना है।
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