वर्ग सिद्धांत - Class theory
वर्ग सिद्धांत - Class theory
वर्ग सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण अंग यह है कि वर्ग के आधार पर संस्थाओं, संगठनों, सृजन की विधाओं और मूल्यों का वर्गीय विभाजन हो जाता है। अनेक संगठन और संस्थाएँ शुद्ध रूप से वर्गीय संगठन और संस्थाएँ शुद्ध रूप से वर्गीय संगठन और संस्थाएँ हैं। संभवतः हर्बर्ट स्पेंसर ने पहले ही कहा था कि आदिवासी समाजों में राज्य और सरकार नहीं थे, इसलिए स्पेंसर के अनुसार वे मस्तक विहीन समाज ( Acephalous Society) थे। मार्क्स ने कहा जो वर्ग अथवा वर्गों का गठबंधन उत्पादन के साधनों का नियंत्रण करता है. राज्य उसी वर्ग का होता है। शासक वर्ग इन वर्गीय संस्थाओं के वर्गीय स्वरूप को छिपाना चाहता है। इस छिपाने के प्रयास में वह शिक्षा, धर्म और नैतिकता का प्रयोग करता है। इन्हें मानव ने ही विकसित किया है,
परंतु शासक वर्गों की चाल एवं चतुराई से आम जनता इन्हें शाश्वत एवं स्वाभाविक समझते हैं। इन संस्थाओं एवं स्वरूपों के हाथों मानव अपने को असहाय एवं बेबस समझने लगता है।
वर्ग सिद्धांत के अंतर्गत मार्क्स ने कहा अलग-अलग वर्गों की संरचनाएँ, समूह और संगठन अलग-अलग होते हैं। मुख्य रूप से जो आधारभूत वर्ग हैं उनके संगठन और समूह तो निश्चित रूप से अलग-अलग होते हैं, जैसे पूँजीवादी में पूँजीवादियों के परिवार अलग होते हैं एवं मजदूर वर्ग के परिवार अलग होते हैं। बीच के वर्गों की स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं होती है। इनमें पुराने समाज के अंश बने रहते हैं। इनके विवाह संबंध और सामाजिक संबंध अलग-अलग वर्गों से होते हैं, यानी मध्यवर्ग की किसी कन्या की शादी किसी धनकुबेर के बेटे से हो सकती है। एलीन ओकले राइट ने इसे ही विरोधी वर्ग स्थिति (Coutractiory class location) कहा है। मार्क्स ने कहा कि संरचनाओं और समूहों के समान अलग अलग वर्गों के नियम, मूल्य, विश्वास और आदर्श भी अलग-अलग होते हैं।
मार्क्स ने इस पर जोर दिया कि हम जब भी सामाजिक संबंधों एवं सामाजिक घटनाओं का विश्लेषण करें तब अनिवार्य रूप से वर्गीय आधारों की जरूर चर्चा करें। मार्क्स के विचारों की एक विशेषता यह भी है कि वे समाज को संपूर्णता में ही देखते हैं। समाज के अलग-अलग अंशों का स्वायत और पृथक रूप में विश्लेषण संभव ही नहीं है। यथार्थ एक परिप्रेक्ष्य में ही होता है। यह द्वंद्वात्मकता का आवश्यक परिप्रेक्ष्य है। मार्क्स के अनुसार वर्ग की सदस्यता के अनुसार ही वर्ग के सदस्यों की मानसिकता तय होती है। उनका दृष्टिकोण तय होता है। सृजन और साहित्य, नृत्य और संगीत भी वर्ग विभाजित समाजों में वर्गीय चरित्र वाले होते हैं। मूल्य निरपेक्षता मार्क्स के अनुसार एक मिथक है। मैक्स वेबर ने मार्क्स की इस धारणा का बड़ा विरोध किया है। वास्तविक में मैक्स वेबर ने औद्योगिक पूँजीवादी समाजों का जो विश्लेषण किया है, उनमें वर्गीय दृष्टि एवं वर्गीय प्राथमिकताएँ जुड़ी हैं।
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