भारतीय ग्रामीण समुदायों के वर्गीकरण - Classification of Indian Rural Community

भारतीय ग्रामीण समुदायों के वर्गीकरण - Classification of Indian Rural Community 


ग्रामीण समुदाय में भी अनेक भेद हो सकते हैं। उन्हें भूमि का स्वामित्व, प्रजातीय तत्व, स्थानीय परंपरा आदि के आधार पर एक दूसरे से पृथक किया जा सकता है अर्थात ग्रामीण समुदायों का भी वर्गीकरण संभव है।


1. धर्म ग्रंथों के अनुसार ( According to Religious Epics) - हिंदू धर्म ग्रंथ रामायण तथा महाभारत में भी ग्रामीण समुदायों का वर्गीकरण मिलता है। रामायण में दो प्रमुख प्रकार के गांव का उल्लेख मिलता है


(1) घोष


(2) ग्राम


इसमें से प्रथम प्रकार के गाँव का आकार दूसरे प्रकार से छोटा होता है।

घोष के सदस्यों की संख्या कम होती थी और इस प्रकार के ग्रामीण समुदाय बहुदा जंगल के पास होते थे। इस आधार पर कहा जा सकता है कि घोष शब्द से ही घोषी शब्द बना है। घोष या घोषी शब्द का अर्थ है पशुपालक या ग्वाला जो कि दूध का व्यापार करते थे। इस प्रकार वालों ग्वालों की बस्ती को घोष कहा गया है। घोष से बड़े आकार की बस्ती का ग्राम कहकर उल्लेख किया गया है। जिसमें की पशुपालकों का ही नहीं बल्कि किसानों का भी निवास होता था। इस प्रकार के ग्रामीण समुदाय में इसी कारण पशुपालन नहीं अपितु खेती करना मुख्य व्यवसाय होता था।


2. डॉ. श्यामा चरण दुबे के अनुसार हम ग्रामीण समुदाय का वर्गीकरण एकाधिक आधारों पर कर सकते हैं, उन्होंने 6 प्रकार के आधारों का उल्लेख किया है जो निम्नवत हैं -


(क) जनसंख्या और भूमि के क्षेत्रफल के आधार पर


(ख) प्रजातीय तत्व और जातियों के आधार पर


(ग) भूमि के स्वामित्व के आधार पर


(घ) अधिकार और सत्ता के आधार पर


(च) दूसरे समुदायों से कितना पृथक है इस आधार पर


(छ) स्थानीय परंपराओं के आधार पर


(3) जनसंख्या के आधार पर (Based on Population) 2001 की जनगणना में गाँव की जनसंख्या के आधार पर भारतीय गांव को मोटे तौर पर 6 भागों में बांटा गया है।


(क) ग्राम जिनकी आबादी 500 से कम है।


(ख) ग्राम जिनकी संख्या 500 से 999 है।


(ग) ग्राम जिनकी संख्या जनसंख्या 1000 से 1999 तक है।


(घ) ग्राम जिनकी आबादी 2000 से 4999 तक है।


(च) ग्राम जिनकी आबादी 5000 से 9999 तक है।


(छ) ग्राम दिन की आबादी 10000 से अधिक है।


(4) डॉ. एच. जे. पीक का वर्गीकरण (Classification of Dr. H. J. Peack) 


डॉ. पीक ने गांव का वर्गीकरण मानव के भ्रमणशील जीवन से कृषि अवस्था वाले जीवन तक के उद्विकास के आधार पर किया है। इस दौरान मानव ने अनेक स्थाई अस्थाई प्रकार के गांव बसाए। इसी आधार पर डॉ. पीक ने गांव को तीन भागों में विभक्त किया है


(अ) प्रवासी कृषि ग्राम (Migratory Agricultural Village) इस प्रकार के गांव अस्थाई प्रकार के होते हैं। ऐसे गांव के निवासी किसी स्थान पर थोड़े समय तक रहते हैं और फिर उस स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान पर कृषि करने चले जाते हैं। वे लोग कितने समय तक एक स्थान पर निवास करेंगे यह भूमि की उर्वरा शक्ति,मौसम की अनुकूलता और जीवन यापन के साधनों की उपलब्धता आदि कारकों पर निर्भर करता है। 


(ब) अर्द्ध-स्थाई कृषि ग्राम (Semi-permanent Agricultural Village)- ऐसे गांव में लोग कई वर्षों तक निवास करते हैं और जब भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट हो जाती है तो वह गांव छोड़कर दूसरे उपजाऊ स्थान पर जा बसते हैं। ऐसे गांव पहले प्रकार के गांव की तुलना में स्थाई होते हैं।


(स) स्थाई कृषि वाले ग्राम (Permanent Agricultural Village) - इस प्रकार के गांव में लोग पीढ़ियों से नहीं बल्कि शताब्दियों से रहते आते हैं। वहीं कृषि करते हैं, इनकी प्रकृति स्थाई एवं रूढीवादी होती हैं। प्राकृतिक विपदा और आर्थिक संकटों को झेल कर भी लोग एक गांव में रहते हैं। भारत में अधिकांश गाँव इसी प्रकार के देखने को मिलते हैं।


(5) सोरोकिन, जिम्मरमैन एवं गेलपिन का वर्गीकरण (Classification of Sorokin, Zimmerman and Galpin) इन विद्वानों ने ग्रामों के वर्गीकरण के दो आधार बताएं हैं-