संज्ञानात्मक उपागम - cognitive approach

संज्ञानात्मक उपागम - cognitive approach


संज्ञानवादी मनोवैज्ञानिक व्यक्ति की छवि निर्मित करने में निहित मानसिक प्रक्रम के भिन्न लक्षणों पर बल देते हैं। इनका मानना है कि लीग व्यक्ति से प्राप्त होने वाली समस्त सूचनाओं को ग्रहण नहीं करते हैं क्योंकि मनुष्य में एक साथ सूचना-संकेतों को ग्रहण करने की क्षमता सीमित होती है। इन मनोवैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि लोग सूचनाओं को यंत्रवत नहीं बल्कि सक्रिय ढंग से एकत्र करते हैं। मैग्वार (1969) ने मनुष्य को प्रेक्षक के रूप में आलसी माना है। इसी प्रकार टेलर (1981) ने कहा है कि मनुष्य संज्ञान करने की क्रिया में कम से कम श्रम करना चाहता है। व्यक्ति प्रत्यक्षीकरण अथवा छवि निर्माण में संज्ञानवादियों के चार अभिग्रह सम्मिलित हैं। जो इस प्रकार से हैं-


1. लक्षित व्यक्ति की छवि निर्मित करने के लिए उसके संबंध में प्राप्त सूचनाओं का प्रकरण करने में संगठित सुसंगत अर्थ ढूंढने की क्रिया निहित होती है।


2. प्रेक्षक छवि निर्माण करने वाले व्यक्ति से प्राप्त होने वाले सूचना संकेतों पर एक समान ध्यान ना देकर उनमें से प्रमुख लक्षणों पर अपने ध्यान को केंद्रित करता है। इस प्रकार छवि निर्माण के लिए व्यक्ति के आकृति लक्षणों पर अधिक ध्यान देता है, और पृष्ठभूमि के लक्षणों को अवधान की परिधि पर रखता है।


3. संज्ञानवादी उपागम में यह भी अभिग्रह निहित है कि प्रेक्षक प्रत्यक्ष के क्षेत्र को उपसमूहों में विभक्त कर संगठित करता है। प्रेक्षक स्वभाविक रीति से गले में रुद्राक्ष की माला तथा ललाट पर चंदन लगाए हुए और गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए व्यक्ति को पुजारी के रूप में प्रेक्षण करेगा।


4. प्रत्यक्ष किए जाने वाला प्रत्येक व्यक्ति किसी संरचना के भाग होते हैं। संरचना में सम्मिलित सभी उद्दीपक स्थान-काल में एक दूसरे से संबंधित होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की छवि किसी संदर्भ में निर्मित होती है और वह प्रेक्षक के अत्यधिक जटिल संज्ञान परत संरचना का एक भाग होता है।


जिस प्रकार किसी भी व्यक्ति की छवि प्रेक्षक के बयान के विस्तृत संरचना का स्वाभाविक रूप से एक अंग होती है।

ऐस (1946) ने अपने अध्ययन में प्रयोजनों के समक्ष शीलगुणों की एक सूची प्रस्तुत की। इन शीलगुणों के आधार पर उसने प्रत्येक प्रयोग से उन शीलगुणों वाले व्यक्ति का वर्णन एक पैराग्राफ में करने का निर्देश दिया। साथ ही उसने प्रयोज्य को विलोमी शीलगुणों की सूची देकर उस व्यक्ति की छवि के अनुकूल शीलगुणों को इंगित कराया। सूची में 7 शीलगुण लिये गये थे। उन्होने सूची में से 1 गुण को क्रमबद्ध रीति से 4 रूपों में परिवर्तित किया गया। इस अध्ययन के रोचक परिणाम प्राप्त हुए। जिन प्रयोज्यों को प्रथम सूची दी गई उनमें 90% से अधिक विरोधियों ने कल्पित व्यक्ति को उधार बताया। जबकि दूसरी सूची प्राप्त करने वाले 10% से कम प्रयोग जाने उस व्यक्ति को उधार बताया। इस प्रकार का रोचक प्रभाव तीसरी और चौथी सूची के प्रयोगों में नहीं पाया गया।


हैरोल्ड केली (1950) में भी एक अध्ययन में सहृदय-हृदयहीन विमा के छवि निर्माण में नाटकीय प्रभाव को प्रदर्शित किया है। उन्होंने अपनी दो कक्षाओं में सूचित किया कि उस दिन उस कक्षा में अन्य में विश्वविद्यालय से आमंत्रित एक प्राध्यापक का भाषण होगा। इसके बाद उसने आगंतुक प्राध्यापक का जीवन-वृत्त बताया। दोनों कक्षाओं में बताए गए जीवन वृत्त एक अंतर बस इतना था कि एक कक्षा में आगन्तुक को एक सहृदय व्यक्ति बताया गया। जबकि दूसरी कक्षा में हृदयहीन। आगंतुक प्राध्यापक ने बारी-बारी से दोनों कक्षाओं में अपना भाषण दिया। इसके बाद छात्रों से आगंतुक की छवि का वर्णन कराया गया। सहृदयता सूचना पाने वाले विद्यार्थियों ने हृदयहीनता की सूचना पाने वालों से बिल्कुल भिन्न वर्णन प्रस्तुत किया। आगंतुक के भाषण की अवधि में सहृदयता की सूचना वाली कक्षा में अधिक के प्रश्न पूछे गए और छात्रों ने अधिक रूचि ली। जबकि दूसरी कक्षा में ऐसा नहीं हुआ।