संज्ञानात्मक मनोबन्ध - cognitive attachment

संज्ञानात्मक मनोबन्ध - cognitive attachment


मनोबन्ध संप्रत्यय का उपयोग सर्वप्रथमसरबार्टलेट (1932) ने किया था। उनके अनुसार मनोबन्ध स्मृति प्रक्रमों की पुनर्प्रस्तुति हैं। इस संप्रत्यय को उद्दीपक-अनुक्रिया साहचर्य सिद्धान्त के विरोध में प्रस्तुत किया गया। बार्टलेट ने प्रतिपादित किया कि नवीन प्रकार के सूचना संकेतों को व्यक्ति अपने मनोबन्धों के अनुरूप ही व्याख्या करता है। बाद में मनोवैज्ञानिकों ने इस संप्रत्यय की उपयोगिता को पहचाना और इसका उपयोग अधिक व्यापक स्तर पर किया जाने लगा।


मनोबन्ध संप्रत्यय के उपयोग के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए डुबो एवं राइट्समैन (1988) ने कहा कि मनोबन्ध एक प्रकार की संज्ञानात्मक संरचना हैं। इसको विगत अनुभवों पर आधारित ज्ञान की संगठित समग्राकृति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है तथा इसका उपयोग संप्रति होने वाले अनुभवों की व्याख्या करने के लिए होता है।

इस परिभाषा के अनुसार जब कभी व्यक्ति किसी सामाजिक या अन्य प्रकार के उद्दीपनों का अनुभव करता है तो स्वतः वह उनकी व्याख्या कर अनुमान लगा लेता है उनका तात्पर्य क्या है। ऐसा वह उपर्युक्त मनोबन्ध की सहायता से करता है। इस अर्थ में मनोबन्ध उसके सामाजिक या अलग संज्ञानों को प्रभावित करते हैं।


मनोबन्ध के बारे में फिस्के एवं टेलर (1984) का मत था कि यह किसी संप्रत्यय या उद्दीपक के बारे में संज्ञान का एक संगठित संरचित समुच्चय है। जिसमें उस संप्रत्यय या उद्दीपक के बारे में जानकारी, उनके बीच के संबंध तथा उनके कुछ उदाहरण सम्मिलित होते हैं। मनोबन्ध के स्वरूप से संबन्धित निम्नलिखित तथ्य हैं-


मनोबन्ध अनेक होते हैं,वे किसी व्यक्ति समूह, सामाजिक भूमिका स्वयं अभिवृत्तियों, सामाजिक घटनाओं अथवा रीति-रिवाजों के बारे में हो सकते हैं।


मनोबन्ध एक सामान्य पद है, अनेक मनोवैज्ञानिक यह मानते हैं कि यह पद इसलिए उपयोगी है कि इसके माध्यम से हम व्यक्तियों के सामाजिक संज्ञान तथा व्यवहारों को वर्णित करते हैं। मनोबन्ध का संगठन पदानुक्रमिक होता है, इनमें कुछ अमूर्त एवं सामान्य अवयव, फिर कुछ मूर्त एवं विशिष्ट अवयव और उनके कुछ उदाहरण विशेष भी सम्मिलित होते हैं। मनोबन्ध में वैयक्तिक भिन्नता भी होती है।


मनोबन्ध कई बार व्यक्तिगत होते हैं, यह व्यक्ति की रुचियों, उनके मूल्यों एवं अभिनतियों को प्रतिबिम्बित करते हैं।


व्यक्ति नवीन सूचनाओं का प्रक्रमण अपने प्रासंगिक मनोबन्ध के परिप्रेक्ष्य में करता है। एक ही संप्रत्यय, सामाजिक घटना अथवा समूह के संज्ञान भी वैयक्तिक भिन्नता प्रदर्शित करते हैं। एक क्षेत्र विशेष का मनोबंध एक व्यक्ति में अधिक क्रमबद्ध सुसंगठित एवं अधिक संरचित हो सकता है, जबकि दूसरे व्यक्ति में उस क्षेत्र विशेष का मनोबन्ध अस्पष्ट विवरण विहीन हो सकता है। उदाहरण के लिए किसी लोहे के कारखाने में काम करने वाले व्यक्ति में कारखाने के विषय में अत्यधिक सघन, सुस्पष्ट एवं अत्यधिक संगठित ज्ञान होगा, जबकि सामान्य व्यक्ति में वह मनोबंध वैसा नहीं होगा।