अनुनय में संज्ञानात्मक प्रक्रियायें - cognitive processes in persuasion

अनुनय में संज्ञानात्मक प्रक्रियायें - cognitive processes in persuasion


मनोवैज्ञानिकों ने कई अध्ययनों के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि अनुयात्मक संचार या संदेष को व्यक्ति मुख्यतः दो ढंगों से ग्रहण अथवा संसाधित करता है। वे दो ढंग या तरीके इस प्रकार हैं-


1. क्रमबद्ध संसाधन या अनुनय का केंद्रीय मार्ग स्वतः शोध संसाधन या अनुनय का परिधीय मार्ग


2. संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं से तात्पर्य वह समस्त मानसिक प्रक्रियायें जो जानने रूपान्तरण, और उसके उपयोग में शामिल होती हैं जैसे प्रत्यक्षीकरण, अवधान, स्मृति प्रक्रिया, चिंतन, तर्क, निर्णय आदि। अनुनय के केन्द्रीय मार्ग अथवा क्रमबद्ध संसाधन में व्यक्ति संदेष को ध्यानपूर्वक इस तरह से ग्रहण करता है कि उसमें निहित विचार और विषय-वस्तु को ठीक प्रकार से संसाधित कर लेता है। उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि इसमें मानसिक प्रयास अधिक खर्च होता है। साथ ही साथ सूचना संसाधन क्षमता का भी अधिकाधिक उपयोग होता है।


दूसरी प्रक्रिया या संसाधन का दूसरा तरीका या ढंग स्वतः शोध संसाधन है इसे संसाधन का परिधीय मार्ग भी कहते हैं। इसमें व्यक्ति क्रमबद्ध संसाधन या केंद्रीय पथ के समान सूचना के विचार या विषय वस्तु पर ध्यान केंद्रित नहीं करता अपितु वह काम चलाऊ या लघुपथ का प्रयोग करता है। जिसमें मानसिक प्रयास अपेक्षाकृत कम खर्च होता है। यह एक ऐसा मार्ग या पथ है जिसमें व्यक्ति अनुनयात्मक सूचना के प्रति स्वतः ही प्रतिक्रिया करता है। अनुनय के इन दो ढंगों या मार्गों का मनोवैज्ञानिकों द्वारा विष्लेषण किया गया और इसकी व्याख्या के लिए एक प्रतिरूप का प्रतिपादन किया जिसे विस्तरण संभाव्यता प्रतिरूप कहा जाता है। यह प्रतिरूप पेट्टी, काकिओपो (1966) एवं पेट्टी और उनके सहयोगियों (2005) ने दिया। जबकि स्वतः शोध क्रमबद्ध प्रतिरूप चाइकेन, लिबरमैन, ईगती (1989), एवं ईमली और चएकेन (1998) ने इस प्रष्न की व्याख्या के लिये कि हम कब चिंतन के इन अलग-अलग मार्गों में संलग्न होते हैं, दिया है। ये माडल या प्रतिरूप अनुनय का संज्ञानात्मक सिद्धान्त कहलाता है। जिसे संक्षेप में ई.एल.एम. प्रतिरूप कहा जाता है।


जब अनुनयात्मक संचार से संबंधित हमारी अभिप्रेरणा और सूचना को संसाधित करने की क्षमता उच्च होती है

तब हम ज्यादा प्रयास वाले और क्रमबद्ध संसाधन में संलग्न होते हैं। इस प्रकार के संसाधन में विषय के बारे में बहुत जानकारी तथा समय की आवष्यकता होती है।


इसके विपरीत, जब हमारा अभिप्रेरणा स्तर कम होता है. योग्यता की कमी. या फिर सावधानी पूर्वक संसाधित करने की क्षमता में कमी होती है, तब हम इस तरह के संसाधन में संलग्न होते है जिसमें कम प्रयास की आवष्यकता होती है। इसे स्वतः शोध संसाधन कहा जाता है। विज्ञापनकर्ता, बेचेनेवाले, राजनेता आदीलोग हमारी मनोवृत्ति को परिवर्तित करने के लिये इसी स्वतः शोध संसाधन के मार्ग का उपयोग करते हैं क्यों कि जब हम इस ढंग में सोचते हैं या संसाधित करते हैं तब मनोवृत्ति को परिवर्तित कर पाना अक्सर आसान होता है।


इन दो पर्थो या मार्गों की ई.एल.एम. (विस्तारित संभाव्यता माडल) से व्याख्या की जा सकती है। अनुनय के केन्द्रीय पथ का उपयोग तब होता है जब व्यक्ति संदेष पर ध्यान देता है और क्रमबध्द रूप से इसकी विषय-वस्तु को संसाधित करता है।