ग्रामीण एवं नगरीय जीवन की तुलना - Comparison between Rural and Urban Life

ग्रामीण एवं नगरीय जीवन की तुलना - Comparison between Rural and Urban Life


ग्रामीण और नगरीय सामाजिक जीवन में भेद प्रकट करने के लिए विख्यात समाजशास्त्रियों ने अनेक कसौटियां निर्धारित की हैं। डॉ. देसाई ने ग्रामीण एवं नगरीय जीवन में भेद करने के लिए निम्नांकित 9 आधारों का उल्लेख किया है।


1. व्यवसाय संबंधी भेद


2. पर्यावरण संबंधी भेद


3. समुदायों के आकार संबंधी भेद


4. जनसंख्या के घनत्व संबंधी भेट


5. जनसंख्या में समरूपता तथा विभिन्नता संबंधी भेद


6. सामाजिक गतिशीलता संबंधी भेद


7. आवास प्रवास की दिशा में भेद


8. सामाजिक विभेदीकरण तथा स्तरीकरण संबंधी भेद


9. समाजिक अंतर क्रिया की पद्धति में भेद प्रोफेसर सोरोकिन और जिमरमैन ने ग्रामीण एवं नगरीय जीवन में भेद प्रकट करने के लिए निम्नांकित कसौटीओं को आधार बनाया है।


1. सामाजिक संगठन में अंतर (Difference between Social Organization) 


ग्रामीण एवं नगरीय सामाजिक संगठन की प्रकृति एवं आधारों में भेद है :


(अ) परिवार परिवार सामाजिक संगठन की एक महत्वपूर्ण इकाई है। गावों में परिवार अधिकांशत संयुक्त होते हैं। मुखिया का सत्ता महत्वपूर्ण होता है।

परिवार ही वहां व्यक्ति की सामाजिक स्थिति निर्धारित करता है वही व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक, मनोरंजनात्मक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं शैक्षणिक क्रियाओं का केंद्र होता है। गांवों में व्यक्ति पर परिवार के सदस्यों का प्रभाव एवं नियंत्रण अधिक होता है। दूसरी ओर नगरों में व्यक्तिवाद की प्रबलता के कारण छोटे परिवारों की बहुलता पाई जाती है। पारिवारिक दबाव एवं नियंत्रण की अपेक्षा स्वतंत्रता अधिक पाई जाती है। अपने जीवन के अनेक महत्वपूर्ण निर्णय व्यक्ति स्वयं ही लेता है। पति-पत्नी एवं परिवार के अन्य सदस्यों के पारस्परिक संबंधों में भी घनिष्ठता नहीं होती. त्याग के स्थान पर व्यक्तिगत हितों को अधिक महत्व दिया जाता है, गांव की अपेक्षा नगरों में वंश का महत्व भी कम होता है।


(ब) विवाह- गांव में विवाह दो परिवारों को जोड़ने वाली कड़ी होती है। विवाह के निर्धारण में परिवारजनों एवं रिश्तेदारों का भी महत्वपूर्ण हाथ होता है। गांव में अधिकांश व्यक्ति अपनी ही जाति में विवाह करता है इसके विपरीत नगरों में दो व्यक्तियों का विवाह व्यक्तिगत मामला समझा जाता है।

विवाह निर्धारण में लड़के और लड़की की इच्छा को अधिक महत्व दिया जाता है। नगरों में प्रेम विवाह, अंतर्जातीय विवाह तथा विधवा विवाह की संख्या गांव की अपेक्षा अधिक है। गांव में बाल विवाह अधिक होते हैं जबकि नगरों में कम।


(स) स्त्रियों की स्थिति - गांव में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति निम्न होती है। वह वहां पर्दा प्रथा का पालन करती हैं तथा उन्हें घर की चहारदीवारी तक ही सीमित रहना पड़ता है। गांव में स्त्री शिक्षा का अभाव है जबकि नगरों में स्त्रियां अधिक शिक्षित और स्वतंत्र होती हैं। स्वयं अर्जन के कारण से ये आत्मनिर्भर होती हैं। अतः वे अपने जीवन से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम होती हैं जबकि गांव की स्त्रियां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर ना होने के कारण परिवार पर ही निर्भर रहती हैं। इसके अलावा शहरी स्त्रियां गांव की स्त्रियों की तुलना में कम अंधविश्वासी होती हैं।


(द) पड़ोस - गांव में पड़ोस का अधिक महत्व होता है।

आपत्ति के समय पड़ोसी एक दूसरे की सहायता करते हैं। नगरों में पड़ोस अधिक महत्वपूर्ण नहीं होता है कई पड़ोसी तो एक दूसरे को जानते तक नहीं।

नगरों में पड़ोसी संबंध आत्मीय एवं घनिष्ठ ना होकर कृत्रिम तथा औपचारिक होते हैं जबकि गांव में पड़ोसियों से संबंध घनिष्ठ रूप में होते हैं।


(ध) सामाजिक संस्तरण गांव में सामाजिक संस्थान का आधार जाति है। अधिकांश लोग कृषि करते हैं अतः संस्तरण का एक आधार कृषि व्यवस्था भी है। गाँव में एक तरफ किसान और दूसरी तरफ जमींदार होते हैं। नगरों में जाति अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। वर्ग व्यवस्था के आधार पर संस्तरण पाया जाता है एक तरफ श्रमिक एवं मजदूर वर्ग है तो दूसरी तरफ पूंजीपति वर्ग नगरों में आर्थिक विषमता अधिक है जबकि गांव में आर्थिक विषमता कम है। बोगार्डस कहते हैं कि अत्यधिक वर्ग विषमता नगर का लक्षण है। ग्रामों में नगर की भांति वर्ग विषमता नहीं है अतः वह आए दिन वहांमालिक और मजदूर के बीच संघर्ष नहीं होते।"