विवाह की अवधारणा एवं परिभाषा - concept and definition of marriage

 विवाह की अवधारणा एवं परिभाषा - concept and definition of marriage


विवाह एक सामाजिक संस्था है जिसकी अवधारणा को सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य मे समझा जा सकता है। मानव को अन्य जीव धारियों से विशेष एवं पृथक स्थान, उसके विकास के कारण प्राप्त है, इस विकास में सामाजिक-सांस्कृतिक विकास बहुत महत्वपूर्ण है, जिसने उसे पशुओं से पृथक किया। परिवार, विवाह, नातेदारी, धर्म संस्कृति इत्यादि का विकास मुख्यतः समाज में अराजकता को समाप्त कर समाज के सुचारू संचालन हेतु हुआ, जो कृमिक रूप से सरलता से जटिलता की ओर विकसित हुआ। अर्थात ये संस्थाएँ आज जिस स्वरूप में हैं वह विकास के तमाम सोपानों के पश्चात है। प्रारंभ में यह अपने सरल स्वरूप में थी, विवाह भी इसका अपवाद नहीं है। विवाह ने परिवार एवं नातेदारी को विकसित किया। विवाह एक ऐसी संस्था है जो व्यक्ति की यौन आवश्यकता की पूर्ति के साथ-साथ शिशु के जन्म को सामाजिक स्वीकार्यता एवं वैधानिकता प्रदान करती है, जो किसी भी राष्ट्र एवं समाज के विकास हेतु आवश्यक है। यही कारण है कि विवाह एक सार्वभौमिक संस्था है। 'विवाह' का शाब्दिक अर्थ है 'उद्बह' अर्थात वर के द्वारा वधु को अपने घर लाना।


सामाजशास्त्र एवं मानवशास्त्र में विवाह एक संस्था के रूप में स्थापित अवधारणा है। किसी भी अवधारणा (समाज में प्रचलित प्रक्रिया) के निर्माण की प्रक्रिया संस्था के निर्माण की प्रक्रिया से होकर पूर्ण होती है, एवं उसमें संस्था की विशेषताएं विद्यमान होती हैं। तब वह संस्था के रूप में स्वीकार्य होती है। विवाह भी एक ऐसी ही अवधारणा है, जो विलियम ग्राहम समनर द्वारा प्रस्तुत संस्था के निर्माण की प्रक्रिया से होकर पूर्ण हुई है एवं जिसमें विवाह की विशेषताएं विद्यमान हैं।


जब कोई विचार, समूह की स्वीकृति के साथ समूह की आदत बन जाती है, और पूरे समूह में पीढ़ी दर पीढ़ी इसकी पुनरावृत्ति होती है, तब वह परंपरा बनती है। परंपरा में जब कुछ नियमों का समावेश होता है, तब वह प्रथा के रूप में परिवर्तित हो जाती है, और जब प्रथाओं के नियमों की एक स्पष्ट संरचना विकसित होती है, तब 'संस्था' निर्मित होती है। स्पष्ट है कि संस्था निर्माण की प्रक्रिया एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। विवाह अपने वर्तमान स्वरूप में बहुत से सोपानों के पश्चात आई संस्था है।

सामाजिक संस्था के कुछ आधारभूत तत्व हैं, जैसे धारणा, उद्देश्य, संरचना प्रतीक आदि। विवाह को निम्नलिखित विद्वानों ने इस प्रकार परिभाषित किया है -


बोगार्डस के अनुसार - "विवाह स्त्री एवं पुरुष को पारिवारिक जीवन में प्रवेश कराने वाली संस्था है। अर्थात विवाह करने वाले स्त्री-पुरूष एक नवीन परिवार का निर्माण करते हैं।”


वेस्टरमार्क के अनुसार विवाह एक या अधिक पुरूषों का एक या अधिक स्त्रियों के साथ होने वाला वह संबंध है जिसे प्रथा या कानून स्वीकार करता है और जिसमें इस संगठन में आने वाले दोनों पक्षों एवं उनसे उत्पन्न बच्चों के अधिकार एवं कर्तव्य का समावेश होता है। विवाह कहलाता है।" वेस्टरमार्क ने अपनी पुस्तक 'History of Human Marriage में विवाह को इस प्रकार परिभाषित करते हुए उसके बहु विवाह एवं समूह विवाह के स्वरूपों को इंगित किया है एवं विवाह के फलस्वरूप परिवार में सदस्यों के अधिकार एवं कर्तव्यों पर प्रकाश डाला है।


गिलिन एवं गिलिन के अनुसार “विवाह एक प्रजनन मूलक परिवार की स्थापना का समाज द्वारा स्वीकृत तरीका है।"


मजूमदार एवं मदान के अनुसार विवाह संस्था में कानूनी या धार्मिक आयोजन के रूप में उन सामाजिक स्वीकृतियों का समावेश होता है। जो विषम लिंगियों को यौन क्रिया और उससे संबंधित सामाजिक आर्थिक संबंधों में सम्मिलित करने का आधार प्रदान करती है। इस प्रकार विवाह जैविक आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक अधिकारों एवं कर्तव्यों का भी निर्धारण एवं नियमन करता है।" मैलिनोवस्की के अनुसार- "विवाह बच्चों की उत्पत्ति एवं पालन-पोषण के लिए इकरारनामा है"।


उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि विवाह समाज की वह महत्वपूर्ण संस्था है जो परिवार के नियमन को संभव बनाती है।