तार्किक एवं अतार्किक क्रियाओं का अवधारणात्मक विवेचन - Conceptual analysis of logical and irrational verbs

तार्किक एवं अतार्किक क्रियाओं का अवधारणात्मक विवेचन - Conceptual analysis of logical and irrational verbs


विल्फ्रेडो पैरेटो ने सामाजिक व मानवीय क्रियाओं सम्बन्धी अपने विचार अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक (माइन्ड एण्ड सोसायटी) में प्रस्तुत किये हैं। उन्होंने सामाजिक घटनाओं के अपने अध्ययन में समाज में पायी जाने वाली मानवीय क्रियाओं का वर्गीकरण दो भागों में किया है-


(1) तार्किक क्रियाएँ. 


(2) अतार्किक क्रियाएँ।


इनके मतानुसार तार्किक क्रियाओं का आधार सामान्यतः वैषयिक या वस्तुपरक होता है जबकि अतार्किक क्रियाओं का आधार प्रतीतिक या व्यक्तिपरक होता है। (यद्यपि पैरेटो ने सामाजिक क्रियाएँ के एक तीसरे प्रकार तर्क विरोधी क्रियाएँ का भी उल्लेख किया है किन्तु इन क्रियाओं के अवैज्ञानिक व तर्क विरोधी होने के कारण पैरेटो ने अपने विवेचन में इन क्रियाओं की व्याख्या नहीं की है।) जैसा कि उपरोक्त वर्णन में बताया जा चुका है कि प्रत्येक सामाजिक घटना के दो पहलू हो सकते हैं


(1) जैसा कि घटना वास्तव में है


(2) जैसा की घटना व्यक्ति विशेष के मन मस्तिष्क में है।


प्रथम को पैरेटो ने वस्तुनिष्ठ व दूसरे को व्यक्तिनिष्ठ कहा है। इनके अनुसार वस्तुनिष्ठ तथा व्यक्तिनिष्ठ आधारों का भेद महत्वपूर्ण उपयोगी तथा उचित है फिर भी इन दोनों के बीच कोई दृढ़ विभाजक रेखा खींचना सम्भव नहीं है।


पैरेटो ने वैषायिक तथा प्रतीतिक आधारों पर आधारित क्रियाओं का और भी स्पष्टीकरण इस प्रकार किया है कि प्रत्येक सामाजिक या व्यक्तिगत क्रिया के दो पक्ष होते हैं- प्रथम लक्ष्य और द्वितीय साधन। हम किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कुछ साधनों का प्रयोग करते हैं। परन्तु ये साधन किस प्रकार के होंगे या उनकी प्रकृति क्या होगी, वह उन कार्यों की प्रकृति पर निर्भर करता है जिन्हें हम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए काम में लाते हैं। 1

उदाहरणार्थ- कुछ ऐसे होते हैं जो कि लक्ष्य तथा साधन दोनों ही दृष्टि से उचित होते हैं। दूसरे शब्दों में ऐसे कार्य जो ठीक तथा अनुभव सिद्ध होते हैं एवं तार्किक आधार पर लक्ष्य और साधन के मध्य सामंजस्य करते है। इस प्रकार के यथार्थता एवं तर्कयुक्तता को वैषयिक कहते हैं। इसके विपरीत ऐसे भी कार्य होते हैं जिनमें लक्ष्य और साधन के बीच तार्किकता का अभाव होता है। अर्थात ऐसे कार्य जो कि यथार्थ, अनुभवसिद्ध तथा तर्कयुक्त नहीं होते है उनको प्रातीतिक कहते हैं। अतः स्पष्ट है कि पैरेटो के अनुसार वे क्रियाएँ (तार्किक क्रियाएँ) है जोकि तर्कपूर्ण रीति से साधन को लक्ष्य से जोड़ता है। केवल उस क्रिया को करने वाले व्यक्ति के दृष्टिकोण से नहीं वरन् उन व्यक्तियों के दृष्टिकोण से भी जिन्हें कि उनके विषय में अधिक व्यापक ज्ञान प्राप्त है को भी जोड़ता है। इसके विपरीत उन क्रियाओं को जिनमें इस विशेषता का अभाव है, अतार्किक क्रियाएँ कहा जायेगा।


इस प्रकार पैरेटो के अनुसार मानवीय क्रियाएँ तर्कसंगत हो सकती है और अतर्कसंगत भी। तर्कसंगत क्रियाएँ ही वास्तव में प्रमाणित होती है

क्योंकि इस प्रकार की क्रियाएँ प्रयोग और अनुभव के क्षेत्र के अंतर्गत होती है। ये इस अर्थ में भी वास्तविक तथा प्रमाणिक होती हैं कि ये कभी भी काल्पनिक नहीं होती और न ही ये अनुमान और अतार्किक आधारों पर आधारित होती है। इस प्रकार तर्क संगत क्रियाएँ विज्ञान के क्षेत्र के अंतर्गत आती हैं। जबकि अतर्कसंगत क्रियाएँ काल्पनिक होने तथा अनुभवसिद्ध न होने के कारण विज्ञान के क्षेत्र के अंतर्गत नहीं आती है, यद्यपि इनका भी अध्ययन विज्ञान के द्वारा ही होता है। इस संबंध में यह उल्लेखनीय है, जैसा कि उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि तर्कसंगत •क्रियाएँ वास्तविकता में तर्क सिद्ध होनी चाहिए साथ ही उन क्रियाओं की तर्क- सिद्धता केवल उस व्यक्ति के द्वारा ही मान्य न हो जो उस क्रिया को कर रहा है बल्कि अन्य विद्वानों द्वारा भी स्वीकृत होनी चाहिए। साथ ही साथ इस संदर्भ में सामाजिक क्रिया से संबंधित तीन समस्याएं भी उल्लेखनीय हैं जो कि निम्नलिखित है-


1. किसी एक सामाजिक क्रिया विशेष के तर्क संगत साधन क्या है? इसका निर्णय तभी हो सकता है जबकि वह आवश्यकता कर्ता के सामाजिक जीवन से संबंधित या संसारिक हो।

अगर वह क्रिया किसी घटना आदि से संबंधित है तो साधन और लक्ष्य दोनों के ही संबंध में ज्ञान होना आवश्यक है। उदाहरण किसी निष्चित स्थान की दूरी के निर्धारण के लिए क्या उचित साधन है और उनमें से कौन सा साधन सबसे उपयुक्त है- इनका निर्णयकर्ता या उनके लिए अन्य लोग भी कर सकते है परन्तु उस निर्धारित साधन के द्वारा किये गये कर्ता के सभी कार्य तर्क संगत है या नहीं इसको प्रमाणित करने के लिए केवल साधन के संबंध में ही नहीं वरन् अन्तिम लक्ष्य के संबंध में भी जानना आवश्यक है। समाजशास्त्रीय अध्ययन की विशेषता यह है कि यह किसी भी मानवीय क्रिया को तब तक तर्कपूर्ण और उचित नहीं मानता जब तक यह प्रमाणित न हो जाये कि जो कुछ भी वह कर रहा है उस क्रिया के अर्न्तनिहित लक्ष्य व साधन के बीच तार्किकता विद्यमान है। यही बात अर्थशास्त्र आदि अन्य विज्ञानों के अध्ययन में भी उतनी ही स्पष्ट है। अर्थशास्त्र मानवीय आवश्यकताओं को उचित और तर्कपूर्ण मानकर ही अध्ययन करता है।


2. सामाजिक या वैयक्तिक क्रियाओं में लक्ष्य और साधन के बीच तार्किक संबंध है या नहीं। इस बात का निर्धारण उस व्यवस्था में ठीक-ठाक नहीं हो पाता है, जिस व्यवस्था में क्रिया का अन्तिम लक्ष्य परलौकिक है क्योंकि उस अवस्था में कुछ भी निश्चित रूप से देखा या माना नहीं जा सकता। वास्तव में परलोक का अस्तित्व ही काल्पनिक है

जो की परीक्षण, निरीक्षण तथा अनुभव के दायरे में नहीं आता। अतः ऐसी सभी क्रियाओं का अंतर्कसंगत क्रियाओं के अंतर्गत सम्मिलित करना ही उचित होगा। यह सम्भव है कि परलौकिक लक्ष्य की एक सामाजिक परिभाषा समाज में विद्यमान हो, परन्तु उस परिभाषा का समाज के सदस्य अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार पृथक-पृथक अर्थ लगाये, यह भी समान रूप से सम्भव है। ऐसी आस्था में साधनों में भी विविधता उत्पन्न होना अस्वाभाविक न होगा। ऐसी अवस्था में लक्ष्य और साधन के बीच तर्क संगत संबंध की आशा करना व्यर्थ ही है।


3. इस संबंध में तीसरी समस्या अधिकतम उपयोगिता की धारणा है। पैरोटो के मतानुसार अधिकतम उपयोगिता के प्रश्न का उत्तर व्यक्तिगत स्तर पर तो है लेकिन सामूहिक स्तर पर विचार करने से कई कठिनाईयाँ उठती हैं। कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिनसे सभी समूहों का लाभ होता है लेकिन कुछ कार्य ऐसे भी होते हैं जिनसे समाज के कुछ समूहों का लाभ होता है परन्तु कुछ समूहों को हानी पहुँचती है। अतः ऐसी अवस्था में यह निश्चित करना कठिन होता है कि वह कार्य वास्तव में उचित है या नहीं।


पैरेटो के मतानुसार मानव-क्रियाओं के संबंध में एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि सर्वत्र और सभी कालों में तर्क संगत क्रियाओं का नहीं बल्कि अतर्कसंगत क्रियाओं का ही बोलबाला रहा है। दूसरे शब्दों में मानव • अधिकतर क्रियाएँ अतर्कसंगत होती है। ये क्रियाएँ तर्क से नहीं बल्कि एक विशिष्ट मानसिक अवस्था से उत्पन्न होती है। इसलिए उस क्रिया को करने वाला उस क्रिया के पक्ष में अनेक युक्तियाँ पेष करता है तथा उसे उचित प्रमाणित करने का प्रयत्न करता है। उदाहरण के रूप में सामाजिक निषेध को ही ले लें। इस प्रकार के निषेध एक विशिष्ट मानसिक अवस्था की ही उपज होते हैं। साथ ही वे निषेध उचित हैं. इसे प्रमाणित करने के लिए ईश्वरीय आज्ञा से लेकर पौराणिक गाथा तक का सहारा लिया जाता है। परन्तु वास्तव में इनमें से कोई निषेध तर्क संगत नहीं होता।


तार्किक रूप से इन निषेधों की व्याख्या नहीं की जा सकती परन्तु पैरेटो के मतानुसार इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि इस प्रकार के निषेध या अन्य तर्कसंगत क्रियाएँ आवश्यक रूप से बेकार तथा अनुपयोगी होती हैं।

एक निषेध का समुदाय विशेष में महत्वपूर्ण स्थान तथा कार्य हो सकता है जबकि वही निषेध दूसरे समाज या समुदाय के लिए निरर्थक और हानिकारक भी हो सकता है। एक समुदाय विशेष में कोई निषेध तब पनपता है जबकि किसी कार्य के प्रति उस समुदाय के लोगों का घृणा भाव हो और वे उस कार्य को उचित और अच्छा न मानते हो। इस कारण इस प्रकार के सामाजिक निषेधों को केवल सामूहिक अभिमति प्राप्त होती है। वे तर्कसंगत नहीं भी हो सकते हैं ओर बहुधा होते भी नहीं है। परन्तु इनको मानने वाले तथा इनको लागू करने वाले सभी लोग इनके पक्ष में अनेक तर्कों को प्रस्तुत करते हैं ताकि उसका अतार्किक रूप छिप जाये या उस विषय में लोग कुछ अनुमान न लगा सके। पैरेटो के लिए सामाजिक जीवन की संपूर्ण घटना समीकरणों की वह श्रृंखला है जिसमें की उस समाज के लोग अपनी अतर्कसंगत क्रियाओं की तर्कसंगतता सिद्ध करते रहते हैं। इस प्रकार पैरेटो के मतानुसार स्वर्गीय मैक्स हैंडमैन के शब्दों में, (मानव जाति का इतिहास तर्कसंगत दिखायी दे, यह इसके लिये किये जाने वाला प्रयासों का एक क्रम है।) 


क्रोफोर्ड ने लिखा है कि पैरेटो के मतानुसार एक प्रेरक शक्ति के रूप में तर्क इतना निर्बल है

कि उसके आधार पर कोई प्रभावशाली आचरण का निर्धारण सम्भव नहीं हो सकता। ऐसा इस कारण नहीं हो सकता क्योंकि मनुष्य का व्यवहार किसी अज्ञात मानसिक अवस्था पर निर्भर होता है तथा इस मानसिक अवस्था का कोई तर्क संगत आधार नहीं होता। मानव व्यवहार किसी तर्क की परवाह नहीं करता इनका अपना एक अलग धारा प्रवाह होता है। परन्तु जैसा पहले ही बताया जा चुका है कि अतर्कसंगत क्रियाओं को आवश्यक रूप से निरर्थक या हानिकार समझना उचित न होगा। पैरेटो ऐसी क्रियाओं को पर्याप्त महत्व प्रदान करते हैं। पैरेटो का मानना था कि अतीत के सिद्धांत निर्माताओं ने अतर्कसंगत क्रियाओं के महत्व को बहुत घटाकर बताया है क्योंकि उन लोगों ने अतर्कसंगत क्रिया के समस्त जटिल तथ्यों को समझने का तथा उसी आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने का कष्ट उठाने की अपेक्षा तर्कसंगत क्रिया के सिद्धांतों की रचना अधिक सरल पायी। इस प्रकार के विद्वानों में फुस्तेल डी कुलजेस, पॉलिबियस, मेन, अरस्तू तथा प्लेटो तक का नाम पैरेटो ने उल्लेखित किया है।


ये विद्वान मानव क्रिया के अतर्कसंगत तत्व के प्रति सन्तुलित धरणा को न पनपा सके तथा इसे निरर्थक व व्याधिकीय समझना इन विद्यानों की सबसे बड़ी भूल थी।

पैरेटो का कहना था कि इसका अर्थ यह नहीं है कि अतर्कसंगत क्रियाओं को विज्ञान की सामग्री मान ली जाये। यह गलत होगा क्योंकि ये क्रियाएँ, उपयोगी भले होती है परन्तु ये न तो सत्य होती हैं और न ही अनुभवसिद्ध और तर्कसंगत। चूंकि पैरेटो का समाजशास्त्र भी विज्ञान है. इस कारण समाजशास्त्रीय अध्ययन में अर्थात् सामाजिक घटनाओं को समझने में अतर्कसंगत तथ्यों की सहायता कभी भी नहीं जायेगी।


पैरेटो के तर्कसंगत व अतर्कसंगत क्रियाओं के वर्गीकरण का विश्लेषण करने पर कुछ तथ्य सामने आते हैं-


1. तर्कसंगत क्रियाएँ वे मानवीय क्रियाएँ हैं जो साधन और साध्य में समायोजन स्थापित करती है। 


2. अतर्कसंगत क्रियाएँ वे मानवीय क्रियाएँ हैं जिसमें साधन और साध्य के मध्य तार्किक संगति का अभाव होता है।


3. तर्कसंगत क्रियाओं का आधार सामान्यतः वस्तुनिष्ठ होता है। वस्तुनिष्ठता का तात्पर्य घटना को उसके वास्तविक रूप में देखने से है।

4. अतर्कसंगत क्रियाओं का आधार व्यक्तिनिष्ठ होता है। इस स्थिति में मनुष्य किसी भी घटना का मूल्यांकन अपने दृष्टिकोण से करता है जो वास्तविक हो भी सकता है और नहीं भी।


5. तर्कसंगत क्रियाओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अतर्कसंगत क्रियाओं का अध्ययन किया जाना नितान्त आवश्यक है।


6. अतर्कसंगत क्रिया का निर्माण कुछ तत्वों के द्वारा होता है। पैरेटो ने इन सन्दर्भों में दो तत्वों का उल्लेख किया है-


I. विशिष्ट चालक अथवा अवशेष (Residues)


II. भ्रांत तर्क अथवा प्रत्युपाद (Derivations)