विन्यास प्रकारांतर - Configuration variant

विन्यास प्रकारांतर - Configuration variant


सभी क्रिया प्रणालियों की विशेषताओं को प्रतिबिंबित करने वाली अवधारणओं के विकास के लिए पारसन्स ने अवधारणाओं के ऐसे समुच्चय का प्रतिपादन किया, जो इन प्रणालियों की परिवर्तनशील प्रकारांतर विशेषताओं को प्रदर्शित कर सकें। इन अवधारणाओं को विन्यास प्रकारांतर कहा गया।


भूमिका सामाजिक प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। इसके निष्पादन से तनाव (बल) पैदा होते हैं। तनाव की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि भूमिका-अपेक्षाओं को समाज में किस प्रकार संस्थागत किया गया है और यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि सामाजिक व्यक्तियों (पात्रों) द्वारा किस हद तक भूमिका-अपेक्षाओं के मूल्यों को आत्मसात् किया गया है। अभिप्रेरणात्मक उन्मुखता और मूल्यपरक उन्मुखता के संबंध में अपनी भूमिकाओं के निष्पादन में हर व्यक्ति को कई दुविधाओं का सामना करना पड़ता है। ये दुविधाएँ आवश्यकताओं और मूल्यों से संबंधित उन्मुखताओं के क्षेत्र में व्यक्ति की पसंद या अभिरुचि से होने वाले तनावों से पैदा होती है।

यद्यपि इन दुविधाओं को द्विभाजित रूप में देखा जाता है। वास्तव में, उन्हें अविच्छिन्न रूप से रखा जाता है। लेकिन यहाँ सरलता को ध्यान में रखते हुए हम यह मानकर चलते हैं कि इन दुविधाओं का स्वरूप द्विभाजित यानी दो भागों में बंटा हुआ है। इससे पहले कि पात्र (व्यक्ति) स्थिति के संबंध में आगे कार्य करे, उसे दो विकल्पों में से एक को चुनना होता है। उदाहरण के लिए ऐसी स्थिति में जब व्यक्ति को सार्वभौम मूल्यों और विशिष्ट मूल्यों में से चुनाव करना हो तो व्यक्ति इनमें से किसी एक को ही चुन सकता है। हमारे पास कुल पाँच विन्यास प्रकारांतर है। इनमें से प्रत्येक विन्यास प्रकारांतर दूसरे का पूरी तरह से उलटा है। ये विन्यास प्रकारांतर है। 


• भावात्मकता बनाम भावात्मक तटस्थता


• आत्म उन्मुखता बनाम सामूहिक उन्मुखता


• सार्वभौमवाद बनाम विशिष्टावाद


• प्रदत्त बनाम अर्जित


• विनिर्दिष्टता बनाम प्रसरणता


• भावात्मकता बनाम भावात्मक तटस्थता