अंतरवस्तु विश्लेषण की प्रक्रिया - Content analysis process

 अंतरवस्तु विश्लेषण की प्रक्रिया - Content analysis process


विषयवस्तु विश्लेषण पद्धति का प्रयोग गुणात्मक एवं मात्रात्मक आंकड़ों के लिए सफलता पूर्वक किया जाता है। यह आगमनात्मक या निगमनात्मक रूपों में प्रचलित है। इनमें से किस विधि का प्रयोग करना है यह शोध के उद्देश्य पर निर्भर करता है। यदि परिघटना के बारे कोई विशेष पूर्व ज्ञान नहीं है या फिर तथ्य बिखरे हुए हैं तो आगमनात्मक विधि का प्रयोग करना चाहिए ( Lauri & Kyngas 2005 ) आगमनात्मक विधि में आंकड़ों से श्रेणीयां प्राप्त होती हैं। जब विश्लेषण का स्वरुप पूर्व ज्ञान के द्वारा प्रचालित होता है तथा शोध का उद्देश्य सिद्धांत की जाँच करना होता है तो निगमनात्मक विषयवस्तु विश्लेषण विधि का प्रयोग किया जाता है (Kyngas & Vanhanen 1999 ) |

आगमनात्मक आंकड़ों पर आधारित प्रक्रिया विशिष्ट से सामान्य की ओर उन्मुख होती है. इसलिए निश्चित घटना का प्रेक्षण कर उसे एक बड़े या समान कथन में संगठित किया जाता है ( Chinn & Kramer 1999). जबकि निगमनात्मक विधि सामान्य से विशिष्ट की ओर उन्मुख होती है (Burns & Grove 2005). उपरोक्त दोनों सिद्धांतों में कार्यवाही की अवस्थाएं सामान्य होती हैं,


● Preparation phase


● Organizing phase


● Reporting phase


Preparation phase


आगमनात्मक एवं निगमनात्मक दोनों ही प्रविधियों में उपरोक्त तीन चरणों को क्रमबद्ध रूप से लागू किया जाता है। तैयारी अवस्था का प्रारंभ विश्लेषण की इकाई के चयन से होता है।

यह इकाई शब्द या थीम के रूप में हो सकती है। विश्लेषण की इकाई से पूर्व क्या विश्लेषण करना है, किस रूप में और प्रतिदर्श क्या होगा सिंनिस्चित करना महत्वपूर्ण होता है (Cavanagh 1997). प्रतिदर्श को प्रतिनिधिक होना अनिवार्य होता है (Duncan 1989)। जब दस्तावेज बहुत बड़ा होता है तब संभाव्य प्रतिदर्शन या निर्णय प्रतिदर्शन विधि का प्रयोग किया जाता है। अर्थ की एक इकाई में एक से अधिक वाक्य हो सकते हैं और कई अर्थ भी हो सकते हैं। दूसरी तरफ विश्लेषण की इकाई अधिक छोटी भी सो सकती है उदा. के लिए एक शब्द, पत्र, वाक्य, पेज का कोई भाग या शब्द या फिर परिचर्चा इत्यादि।


अधिकतर शोध विशेषज्ञों ने विश्लेषण के लिए साक्षात्कार को आदर्श माना है जो अधिकतम लिखित या कम से कम स्मृति में हो सकता है। विश्लेषण के पूर्व शोधार्थी को यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है की वह किसका विश्लेषण करेगा केवल प्रकट या प्रत्यक्ष सामग्री का अथवा फिर अप्रकट या अप्रत्यक्ष सामग्री का अप्रकट विधि में प्रयोज्य के गहरी साँस आह भरने, हसने एवं मुद्रा को भी ध्यान में रखा जाता है।


आगे शोधार्थी यह जानने का प्रयाश करता है कि आंकड़े वास्तव में क्या कह रहे हैं (Moorse 1990, Burnard 1991)| Dey (1993) के अनुसार प्रदत्त को पड़ते समय निम्न प्रश्नों को ध्यान में रखना के चाहिए-


● Who is telling?


● Where is this happening?


● What did it happen ?


● What is happening?


● Why?


आंकड़ों को बार-बार पढ़ कर उसमे तल्लीन होने का प्रयास करना चाहिए जिससे पता चले की वास्तविकता क्या है


(Burnard 1991, Polit & Beck 2004)। कोई भी सूझ या सिद्धांत आंकड़ों से नहीं निकलना चाहिए जब तक की शोधार्थी थीम के साथ पूर्णतः घुलमिल नहीं जाता है (Polit & Beck 2004)। आंकड़ों को समझने के पश्चात आगमनात्मक या निगमनात्मक विधि का प्रयोग करते हुए विश्लेषण किया जाता है (Kyangas & Vanhanen 1999 ) है।