अंतर्वस्तु विश्लेषण शोध की समस्याएं - Content Analysis Research Problems

 अंतर्वस्तु विश्लेषण शोध की समस्याएं - Content Analysis Research Problems


सामाजिक शोध की एक अप्रत्यक्ष विधि है। सामान्यतः इसका प्रयोग ऐसे विषयों के अध्ययन में ही किया जाता है जहां अन्य विधियों का प्रयोग संभव नहीं होता। इस विधि की सबसे बड़ी कठिनाई संचार सामग्री की गुणात्मक प्रकृति है जिसके कारण विश्वसनीयता यथार्थता और वस्तुपरकता प्रभावित होती है। यह सोच है कभी-कभी तब सामने आती है जब समान दस्तावेजों के अध्ययन में दो शोधकर्ताओं के निष्कर्षों में भिन्नता प्रकट होती है। इसके अतिरिक्त, इस विधि को सभी प्रलेखों की अध्ययन के लिए भी एक उपयुक्त विधि नहीं कहा जा सकता है। कहां तक सही है या किसी कविता में कौन सा सौंदर्यात्मक गुण है इनका निर्धारण इस विधि से ठीक-ठीक प्रकार नहीं किया जा सकता है। इस है


विधि की प्रमुख समस्या वस्तुपररकता से जुड़ी हुई है जिस का संक्षेप में वर्णन नीचे किया गया है। वस्तुपरकता की समस्या- चूँकि संचार की विषय वस्तु का विश्लेषण किसी व्यक्ति विशेष द्वारा किया जाता है, ऐसी अवस्था में वस्तुपरकता बनाए रखना. अर्थात उसके विचार मूल्य आदि निष्कर्षों को प्रभावित नहीं करेंगे इसकी क्या गारंटी है। यह सही है कि इस विधि में संचार सामग्री का विधिवत प्रतिचयन वर्गीकरण और गणना की जाती है, तथापि यह समस्त कार्य अकेले शोधकर्ता द्वारा किया जाता है, अतः अंतर्वस्तु विश्लेषण की समस्त प्रक्रिया में पग-पग पर अभिनति (bias) आने का भय बना रहता है।


बर्लसन (1952) ने अंतर्वस्तु विश्लेषण में वस्तुपररकता को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित पांच बातों को अपनाए जाने का सुझाव दिया है-


1. नियम आधारित प्रक्रिया


2. व्यवस्थित प्रक्रिया


3. परिमाणन


4. गुणात्मक विश्लेषण को पर्याप्त महत्व


5. केवल व्यक्त संचार की विषय वस्तु का मूल्यांकन


कुछ समाज वैज्ञानिकों ने इस विधि को विभिन्न समस्याओं के समाधान हेतु अंतर्ज्ञान (Intution) के उपयोग का भी सुझाव दिया है। द्वारा अंतर्ज्ञान को मानव की छठी इंद्री के रूप में स्वीकार किया गया है किंतु अंतर्ज्ञान की अपनी सीमाएं हैं। इसे वस्तुपररकता तथा साक्ष्य का विकल्प नहीं माना जा सकता है। इसके द्वारा व्यक्तिपरकता की ही अधिक संचार होने की संभावना रहती है। अं

तर्ज्ञान के प्रयोग में एक अन्य बड़ी कठिनाई भाषा की जटिलता की है। एक कुशल अंतरदृष्टा तथा प्रशिक्षित शोधकर्ता के समक्ष भी अपनी शोध सामग्री का अधिकाधिक उपयोग करने की कठिनाई रहती है, यदि वह व्यवस्थित विधियों का प्रयोग नहीं करता।


उपरोक्त कठिनाइयों के कारण, निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि अंतर्वस्तु विश्लेषण विधि का प्रयोग तभी किया जाना चाहिए जब अध्ययन की समस्या इस विधि की ही अपेक्षा रखती है. अर्थात जब शोध की प्रत्यक्ष विधि या किसी विषय के अध्ययन में विफल रहती हैं या जब अन्य विधियों की अपेक्षा किसी शोध विषय के लिए यही एकमात्र सर्वाधिक उपयुक्त विधि हो।