राजनीतिक क्षेत्रों में निरंतरता - continuity in the political sphere
राजनीतिक क्षेत्रों में निरंतरता - continuity in the political sphere
ग्रामीण भारत की सत्ता संरचना के निर्धारण तथा नियंत्रण में सदैव से ही प्रभुत्वशाली जातियां केंद्र में रही हैं। यहां इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि सभी प्रभुत्वशाली जातियां अनुष्ठानिक तौर पर श्रेष्ठ/उच्च पायदान पर स्थापित नहीं थीं, अपितु कुछ जातियां राजनीतिक शक्ति. संख्या तथा भूमि पर स्वामित्व के आधार पर प्रभुत्वशाली थीं। हालांकि अधिकतर जातियों का संबंधित क्षेत्रों में उक्त तीनों कारकों पर आधिपत्य स्थापित था। हालांकि बाजार की अर्थव्यवस्था के फलने-फूलने के बाद तथा परंपरागत निर्धारित जातिगत व्यवसायों के हास होने से जातियों की पारंपरिक राजनीतिक भूमिका प्रभावित हुई और साथ ही विभिन्न जाति समूहों के सक्रिय होने के कारण भी राजनीतिक स्वरूप परिवर्तित हुआ। इसके बावजूद राजनैतिक तौर पर जाति एक महत्वपूर्ण इकाई है।
स्वतंत्र भारत में अधिकांश अछूत जातियां स्थानीय प्रभुत्वशाली तथा उच्च जातियों (विशेषकर ठाकुरों/राजपूतों के विरुद्ध) के विरोध में एकजुट हो गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ठाकुर पारंपरिक जमींदार थे तथा वे ही निम्न जातियों के भूतपूर्व मालिक थे। जातीय संस्तरण की निम्न जातियों की एकजुटता मात्र राजनीतिक लाभ तक ही सीमित नहीं था, अपितु यह भौतिक कल्याण और सामाजिक प्रस्थिति के नजरिए से भी महत्वपूर्ण था।
इस प्रकार से यह कहा जा सकता है कि भारत में परिवर्तन की प्रक्रिया जातिगत गतिशीलता के साथ-साथ क्रियाशील रही है। परिवर्तन के साथ अनुकूलन तथा निरंतरता को बनाए रखना जाति व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण विशेषता मालूम पड़ती है।
वार्तालाप में शामिल हों