सामाजिक क्षेत्रों में निरंतरता - Continuity in social spheres
सामाजिक क्षेत्रों में निरंतरता - Continuity in social spheres
सामाजिक जीवन तथा व्यावसायिक जीवन में परिवर्तन होने के बाद भी व्यक्ति अपनी जातिगत विशेषताओं को बनाए रखने और उसके प्रति आस्था रखने में पूरी तन्मयता दिखाता है। मैक्स वेबर ने बताया कि जाति व्यवस्था में खान-पान संबंधी नियम पाए जाते हैं, हालांकि ए नियम समकालीन संदर्भ में मृत प्राय हो चुके हैं, परंतु आज भी अंतर्विवाही नियम गंभीरता से पालन किए जाते हैं। इसी प्रकार हेराल्ड गूल्ड ने लखनऊ के रिक्शा चालकों पर अध्ययन किया तथा बताया कि रिक्शा चालक अनेक जातियों से संबंधित रहते हैं तथा वे बिना किसी की जातीय भिन्नता को जाने /परवाह किए सभी लोगों के साथ अंतःक्रिया करते हैं। परंतु जब भी वे घर जाते थे, तो जातीय धार्मिक रीतियों के अनुपालन के दौरान वे केवल उन्हीं लोगों को आमंत्रित करते थे जो लोग उनकी जातियों के सदस्य थे। उनके सभी रिश्तेदार उनकी ही जाति से संबंधित रहते थे तथा वे अपनी ही जाति में विवाह संबंध स्थापित करते थे। आर्थिक क्षेत्रों में निरंतरता जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि जाति व्यवस्था में प्रत्येक जाति का अपना एक व्यवसाय होता है
तथा यह उनके सामाजिक संस्तरण के आधार पर पूर्व से ही निर्धारित रहता है। जाति व्यवस्था में उच्च स्थान पर स्थापित जातियों के व्यवसायों को पवित्र माना जाता था, जबकि निम्न स्थान पर काबिज जातियों के व्यवसायों को अपवित्र की श्रेणी में रखा जाता था। ब्रिटिश आगमन ने नवीन प्रकार के आर्थिक अवसरों को पैदा किया तथा नई अर्थव्यवस्था को जन्म दिया। इस प्रकार से वंशानुगत सामाजिक स्थितियों का स्थान बाजार की दशाओं ने ले लिया तथा आर्थिक सम्बन्धों को बाजार की प्रकृति के अनुरूप निर्धारित किया जाने लगा। एफ. जी. बेली ने उड़ीसा के बीसीपारा गांव का अध्ययन किया तथा बताया कि व्यवसायवाद की बढ़ती लोकप्रियता के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था बृहत राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का अंश बन चुकी है। बेली का मानना है कि ब्रिटिश शासन में परिवर्तित राजनैतिक वातावरण ने ग्रामीण परंपरागत जातिगत संस्तरण तथा भूस्वामित्व की संरचना पर गहरा आघात किया। हालांकि इसके बाद भी जाति व्यवस्था आर्थिक और राजनीतिक सम्बन्धों को निर्धारित और नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इस जातीय निरंतरता को इस प्रकार से भी समझा और विश्लेषित किया जा सकता है। ब्रिटिश औपनिवेश से आजाद होने बाद भारतीय समाज में अनेक सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, राजनीतिक परिवर्तन हुए और एक नई शक्ति तथा सत्ता का निर्माण हुआ. जो इन नव निर्मित पक्षों द्वारा परिभाषित होती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि इन परिवर्तनों का लाभ उठाने में ज़्यादातर जातीय व्यवस्था की उच्च जातियां सम्मिलित हुई। इन जातियों में ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य शामिल थे तथा ए जातियां पहले से ही शक्तिशाली तथा समर्थवान थीं। इस प्रकार से शक्ति तथा सत्ता में पुनः उन्हीं जातियों का आधिपत्य हो गया, जिनका आधिपत्य पूर्व में था। इस प्रकार से सामाजिक जातीय व्यवस्था का केवल रूपांतरण हुआ और जातियों ने अपनी स्थिति व व्यवस्था को बनाए रखा। इसे हम जातिगत व्यवसायों के विस्तारिकरण के रूप में भी देख सकते हैं।
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