जाति व्यवस्था की निरंतरता - continuity of the caste system
जाति व्यवस्था की निरंतरता - continuity of the caste system
जाति व्यवस्था निरंतर सभी समाजों में प्राचीन समय से ही विद्यमान रही है। हालांकि इसमें समय के साथ साथ अनेक परिवर्तन भी हुए हैं। विभिन्न विद्वानों का मत है कि बंद प्रकृति से होने के बावजूद जाति व्यवस्था जातिगत संस्तरण में जातियों के पूर्वनिर्धारित स्थान और प्रतिमानों में समय-समय परिवर्तन होते रहे हैं। कुछ विद्वानों द्वारा दी गई अवधारणाओं ने भी जातिगत संरचना की गतिशीलता तथा लचीली व्यवस्था को प्रत्यक्ष तौर पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है. जैसे- एम. एन. श्रीनिवास द्वारा प्रस्तुत की गई संस्कृतिकरण की अवधारणा। इसके अलावा ब्रिटिश आगमन ने भारतीय समाज में पश्चिमीकरण की प्रक्रिया को जन्म दिया तथा इस प्रक्रिया ने भी जाति व्यवस्था को संरचनात्मक गतिशीलता की ओर अग्रेषित करने का काम किया है। शैक्षिक। आर्थिक तथा राजनीतिक पक्षों में अनेक परिवर्तन हुए तथा उन परिवर्तनों ने भी जाति व्यवस्था को कमोबेश रूप में प्रभावित किया है। इन विविध तथा वृहत परिवर्तनों के बावजूद जाति व्यवस्था अपनी निरंतरता को बनाए रखने में सफल हुई है। हालांकि इसमें अनेक प्रकार्य बदल चुके हैं, तो कुछ पुराने प्रकार्य आज भी जीवित अवस्था में बने हुए हैं।
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