प्रकार्यवाद या प्रकार्यात्मक विश्लेषण की समालोचना - Criticism of Functionalism or Functional Analysis

प्रकार्यवाद या प्रकार्यात्मक विश्लेषण की समालोचना - Criticism of Functionalism or Functional Analysis


प्रकार्यवाद और प्रकार्यात्मक विश्लेषण की अनेक दृष्टियों से आलोचना की गई है. उनमें से प्रमुध निम्नलिखित हैः


(1) घटना के समकालीन स्परूप परहीवल के कारण अध्ययन अपूर्ण Study Incomplete Due to Emphasis on Contemporary Form of Social Phenomena प्रकार्यवाद केवल घटना का समकालीन या वर्तमान स्वरूप ही अध्ययन करता है और उनके इतिहास का कोई प्रभाव घटना पर होगा तो वर्तमान स्वरूप में ही लक्षित हो जाएगा। यह मान्यता उचित नहीं है क्योंकि हर घटना उद्विकास का परिणाम है और उसका वर्तमान स्वरूप अतीत पर आधारित है। वर्तमान को पूर्ण रूप से समझने के लिए अतीत का ज्ञान अनिवार्य है। इतिहसा की इस उपेक्षा के कारण प्रकार्यात्मक अध्ययन अपूर्ण ही होते हैं क्योंकि वे घटना की उत्पत्ति, विकास और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर कोई प्रकाश नहीं डालते। हर वैयक्तिक अध्ययन के लिए पूर्ण का ज्ञान आवश्यक होता है। सामाजिक घटनाएँ इसका अपवाद नहीं है। प्रत्येक सामाजिक घटना ऐतिहासिक घटनाक्रम की कड़ी होती है। प्रकार्यवाद अतीत और वर्तमान के बीच के संबंध की व्याख्या नहीं कर पाता।


(2) परिणाम का अध्ययन, कारण का नहीं Study of Consequences but not of Causes प्रकार्यवादी परिणाम अर्थात् प्रकार्यों का अध्ययन तो करते हैं परंतु कारण का अध्ययन नहीं करते। प्रकार्यवाद सामाजिक घटना के योगदान पर प्रकाश डालता है, पर यह व्याख्या नहीं करता कि किस कारण सामाजिक घटना योगदान करती या किस कारण योगदान नहीं करती।


(3) संतुलन को पूर्वनिश्चित मानते हैं (Accept Equilibrium as Precertain) प्रकार्यवादी यह मानकर चलते हैं कि समाज में संतुलन निश्चित रूप से है ही। इसी आधार पर वे विश्लेषण करते हैं। पर वह यह सिद्ध नहीं कर पाते कि समाज में संतुलन निश्चित रूप से है ही।


(4) पद्धतिशास्त्रीय दोष (Methodological Defects) -अर्नेस्ट नगेल (Ernest Nagel) ने अनेक दोष प्रकार्यवाद की पद्धतियों में निकाले हैं। उसका मत है कि प्रकार्यात्मक विश्लेषण और अप्रकार्यात्मक विश्लेषण (non-functional analysis) में कोई विशेष अंतर नहीं है।

उसने इसे एक उदाहरण के द्वारा समझाने का प्रयत्न किया है। निम्न कथनों पर विचार कीजिए धर्म का प्रकार्य एक समूह में चिंता से मुक्त करना है (The function of religion is to relieve anxiety in a group), समूह में चिंता से मुक्ति हो जाती है यदि वह धर्म का उपयोग करता है (Anxiety in a group is relieved of it practices religion.)। एक समूह में चिंता से मुक्ति की शर्त है धर्म का उपयोग (A condition for relief of anxiety in a group is the practice of religion.)। प्रथम कथन प्रकार्यात्मक है और शेष दोनों अप्रकार्यात्मक। इनमें किसी में भी मूल तथ्य में कोई अंतर नहीं है, केवल कथन का अंतर है। इससे स्पष्ट है कि प्रकार्यवाद कुछ विशेष ऐसा योगदान नहीं करता. जो कि अन्य पद्धतियाँ या सिद्धांत न करते हों।


(5) प्रकार्यवाद में प्रयुक्त किए जाने वाले प्रत्यय (Concepts used in Functionalism are Unclear) - प्रकार्यवाद में पुयुक्त किए जाने वाले प्रत्यय अस्पष्ट है जैसे- अस्तित्व (survival), (निरंतरता ) (continuity) आदि। इनके कारण विश्लेषण दोषपुर्ण होता है।


(6) केवल संरचना और प्रकार्यों का अध्ययन (Study of only Structure and Function) -

यह केवल संरचना और उसके प्रकार्यों का ही अध्ययन करता हैं. जोकि सीमित क्षेत्र है। 



( 7 ) रूढ़िवादी विचारधारा (Conservative Ideology ) प्रकार्यवाद समस्थिति (status quo ) का समर्थ माना जाता है। प्रकार्यवाद की प्रचलित मान्यताएँ यह मानती हैं कि हर तथ्य प्रकार्यात्मक है, इसलिए वह अपरिहार्य है। इसके कारण लोग इन तथ्यों को रखना चाहेंगे और उनके प्रति सहानुभूति रखेंगे। इस प्रकार वे रूढ़िवादिता से चिपके रहेंगे। मिरडल (Myrdal) का कहना है कि प्रत्येक तत्व को प्रकार्यात्मक मान लेने का अभिप्राय है कि वह अच्छा ही है, क्योंकि वह प्रकार्य करता है। यह मान्यता रूढ़िवादिता की पोषक एवं प्रेरक है। उसने लिखा है- “प्रकार्यों के आधार पर सामाजिक संस्थाओं का वर्णन अवश्य ही रूढ़िवादी विचारधारा की ओर ले जाएगी।"


(8) प्रगतिवादी विचारधारा (Radical Ideology) - कुछ लोग जहाँ प्रकार्यवाद को रूढ़िवादी मानते हैं, वहीं कुछ लोग इसे प्रगतिवादी विचारधारा मानते हैं। लेपियर (Lapiere) का मत है कि प्रकार्यवाद प्रकृति से ही प्रगतिवादी है, क्योंकि यह प्रकार्य पर भी बल देता है और केवल संचना के आधार पर व्याख्या नहीं करता। संरचना स्थिर तत्त्व है, परंतु प्रकार्य गतिमान प्रकार्यवाद अपनी पद्धति में आलोचना को महत्त्व देता है. इसलिए यह प्रगतिवाद का चिन्ह है।


( 9 ) प्रकार्यवाद की प्रचलित मान्यताओं की आलोचना (Criticism of the Prevailing Postulates of Functionalism) प्रकार्यवाद की प्रचलित मान्यताओं की भी तीव्र आलोचना ही गई है।