संस्कृति का "संस्कृति और व्यक्तित्व" सिद्धांत - "Culture and Personality" Theory of Culture

 संस्कृति का "संस्कृति और व्यक्तित्व" सिद्धांत - "Culture and Personality" Theory of Culture


इस क्रम में 1920 के दशक के फ्रांस बोआस तथा क्रोबर के कुछ शिष्य मारग्रेट मीड, रूथ बेनेडिक्ट तथा कोराडु-बोआस आदि उद्विकासवाद, प्रसारवाद, प्रकार्यवाद, संरचना-प्रकार्यवाद तथा अन्य परंपरागत सिद्धांतों के आलोचक बन गए। इन विद्वानों का मत था कि संस्कृति तथा समाज के संबंध में स्थापित परंपरागत मानवशास्त्रीय सिद्धांत सांस्कृतिक आचरण और व्यवहार की मूल व्याख्या नहीं करते हैं। अतः उन विद्वानों के अनुसार समय की मांग सांस्कृतिक व्यवहार का विश्लेषण था। सांस्कृतिक व्यवहार का अर्थ, उन विद्वानों के अनुसार किसी सांस्कृतिक समूह के सदस्यों के आचरण, चरित्र या व्यक्तित्व से था। विभिन्न सांस्कृतिक समूह के सदस्यों का चरित्र समान नहीं था और विभिन्नता प्रस्तुत करता था। इन विद्वानों ने कुछ मूल प्रश्नों का समाधान करना चाहा। इनका प्रथम प्रश्न था कि किसी सांस्कृतिक समूह के सदस्यों के व्यक्तित्व में समानता क्यों होती है? हालांकि अपवाद स्वरूप व्यक्तिगत अंतर भी था। इनका दूसरा प्रश्न था कि क्यों एक सांस्कृतिक समूह के सदस्यों का व्यक्तित्व दूसरे सांस्कृतिक समूह के सदस्यों से भिन्न था?

इन प्रश्नों के समाधान हेतु इन विद्वानों ने संस्कृति की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया। इन विद्वानों ने पाया कि किसी एक संस्कृति संघ के सदस्यों के व्यक्तित्व में समानता है, क्योंकि उन सभी सदस्यों के समाजीकरण की प्रक्रिया समान सांस्कृतिक वातावरण में संपन्न होती है। एक समूह की संस्कृति दूसरे समूह की संस्कृति से भिन्न होती है। अतः एक समूह के सदस्यों का व्यक्तित्व, आचरण, व्यवहार आदि दूसरे समूह के सदस्यों के व्यक्तित्व, आचरण, व्यवहार आदि से भिन्न होता है। इन विद्वानों ने संस्कृति एवं व्यक्तित्व के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन मनोविश्लेषण के आधार पर करने का प्रयास किया। इन विद्वानों के अनुसार संस्कृति एवं व्यक्तित्व एक दूसरे के पूरक हैं तथा एक दूसरे से संबंधित है। इन विद्वानों में अंतर विषयक दृष्टिकोण तथा परसांस्कृतिक तुलना पर विशेष ध्यान दिया। इन विद्वानों का मानना था कि मानवविज्ञान का संबंध मनोविज्ञान, समाजविज्ञान, जीवविज्ञान इत्यादि से है। उनके अनुसार व्यक्तित्व एक व्यक्ति की आदत, मनोवृत्ति, लक्षण तथा विचार का एक ऐसा संगठित योग है, जो बाह्य रूप से विशिष्ट एवं सामान स्थिति तथा भूमिका के रूप में संगठित रहता है तथा आंतरिक रूप से उसकी आत्मा चेतना एवं स्वयं की अवधारणा, पहचान, मूल्य विचार तथा उद्देश्य के रूप में व्यवस्थित रहता है।

व्यक्तित्व मानव द्वारा सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष के अंतर्गत समाज # में अपनी संस्कृति के अनुसार किया जाने वाला व्यवहार होता है। इस रूप में कोई भी व्यक्ति अपने समाज की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। जिस संस्कृति में व्यक्ति का जन्म होता है, उसी के रीति-रिवाज, व्यवसाय, प्रथा, कला, साहित्य, भाषा, धर्म, मूल्य आदि का उस पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। अतः व्यक्तित्व, संस्कृति व समाज की अभिव्यक्ति होती है। व्यक्तित्व निर्माण का तीसरा पक्ष मनोवैज्ञानिक है। इसके अंतर्गत व्यक्ति की अभिरुचि, भावना, अभिवृत्ति, अभिज्ञान, उद्वेग, प्रेरणा, मूल्य, क्षमता, कृति, प्रकृति आदि को सम्मिलित किया जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि मानव के द्वारा विभिन्न परिस्थितियों में मानव के अंतर्मन से अथवा जीवन संघर्षों से निकलने वाली स्मृतियां मानव की अभिज्ञान का द्योतक होती हैं, जिससे संबंधित अध्ययन मीड, बेनेडिक्ट एवं कोराडु-बोआस ने किया था।


संस्कृति एवं व्यक्तित्व के अंतर्गत संस्कृति प्रतिमान की अवधारणा भी दी गयी थी। संस्कृति के अंतर्गत संस्कृति प्रतिमान की अवधारणा भी विशेष महत्व रखती है। हालांकि मानवशास्त्रियों के बीच संस्कृति प्रतिमान की अवधारणा ज्ञात थी, लेकिन रूथ बेनेडिक्ट के पूर्व मानवशास्त्रियों ने सार्वभौमिक संस्कृति प्रतिमान दर्शाने का प्रयास किया था। संस्कृति तत्व तथा संस्कृति संकुल मिलकर संस्कृति प्रतिमान का निर्माण करते हैं। संस्कृति तत्व, संस्कृति की सबसे लघु इकाई है। जब कई संस्कृति तत्व मिल जाते हैं, तब संस्कृति संकुल का निर्माण होता है। जब संस्कृति तत्व एवं संस्कृति संकुल का समाकलन प्रकार्यात्मक समग्रता में होता है, तब संस्कृति प्रतिमान का निर्माण होता है। अतः स्पष्ट है कि संस्कृति प्रतिमान कई संस्कृति तत्व तथा संस्कृति संकुलों से बना होता है।