तलाक के प्रथागत स्वरुप - Customary form of Divorce

तलाक के प्रथागत स्वरुप - Customary form of Divorce


मुस्लिम समाज में साधारणतः तलाक बिना अदालत की सहायता के होते हैं। पुरुष को इस दृष्टि से व्यापक अधिकार प्राप्त हैं। तलाक के प्रथागत स्वरुप ये हैं -


1. तलाक (Talak) :- मुस्लिम कानून के अनुसार काई भी स्वस्थ मस्तिष्क वाला मुसलमान, जो वयस्क है (15 वर्ष की आयु प्राप्त है), कारण बतलाए बिना भी अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है। यह तलाक केवल शब्दों के उच्चारण मात्र से ही पूर्ण हो जाता है। यदि पति दबाव या नशे की हालत में या पत्नी की अनुपस्थिति में ‘तलाक' का उच्चारण कर देता है, तो भी तलाक वैध माना जाता है। शिया में कानून के अनुसार तलाक के लिए दो योग्य गवाहों की उपस्थिति में तलाक का उच्चारण आवश्यक है. परंतु सुन्नी कानून के अन्तर्गत गवाहों की कोई जरूरत नहीं है। तलाक की घोषणा स्वयं या अपने किसी प्रतिनिधि द्वारा की जा सकती है। तलाक लिखित रूप में भी हो सकता है और अलिखित रूप में भी। अलिखित तलाक के तीन प्रकार हैं


(क) तलाक अहसन (Talak Ahasan) :- तलाक के इस प्रकार में पति पत्नी के 'तुहर' (मासिक) धर्म) के समय एक बार तलाक की घोषणा कर देता है। इसके बाद इद्दत' की अवधि में वह पत्नी के साथ यौन संबंध स्थापित नहीं करता और इस अवधि के समाप्त होने पर तलाक हो जाता है। इद्दत तलाक की घोषणा के बाद चार मासिक धर्मों के बीच की अवधि को कहते हैं। यह अवधि प्रायः तीन महीने की होती है। इस अवधि में यदि पति पत्नी के साथ सहवास नहीं करता तो अवधि की समाप्ति कर तलाक हो जाता है। इद्दत की अवधि का प्रमुख लक्ष्य यह ज्ञात करना होता है कि स्त्री गर्भवती तो नहीं हैं। साथ ही इस अवधि में पति को अपने तलाक संबंधी निर्णय पर पुनः विचार करने का अवसर मिल जाता है। इस अवधि में यदि वह अपने निर्णय को बदलना चाहे तो पत्नी के साथ सहवास कर लेता है और ऐसी दशा में तलाक की घोषणा वापस ले ली जाती है।


(ब) तलाक हसन (Talak Hasan) :- तलाक के इस प्रकार में पति को तीन तुहरों के अवसर पर तलाक की घोषणा को दोहराना पड़ता है। इन तीनों की अवधि के बीच वह स्त्री के साथ सहवान भी नहीं करता। इस अवधि के बाद तलाकपूर्ण हो जाता है।


(स) तालक-उल-बिद्दत (Talak-ul-biddat) : यह तलाक का अत्यन्त सरल तरीका है किसी भी मासिक धर्म के अवसर पर पति पत्नी या उसके किसी गहवा की अनुपस्थिति में भी तलाक की एक बार स्पष्ट घोषणा कर देता है और तालक हो जाता है। कभी-कभी एक ही मासिक धर्म के अवसर पर थोड़े थोड़े समय के बाद तलाक की तीन बार घोषणा की जाती है और फिर तलाक पूर्ण हो जाता है। तुहर के अवसर पर तलाक की घोषणा का उद्देश्य यही है कि यह ज्ञात हो जाए कि तलाक के समय स्त्री गर्भवती तो नहीं है।


2. इला (Illa or Vow of Continence) :- जब पति कसम खाकर चार महिने या इससे अधिक समय तक, पत्नी के साथ यौन संबंध नहीं रखने की प्रतिज्ञा करता है तो इसे 'इला' कहते हैं। इस अवधि के पश्चात् विवाह-विच्छेद हो जाता है। यदि इस काल में वह पत्नी के साथ यौन संबंध कर लेता है तो इला टूट जाता है और ऐसी दशा में विवाह-विच्छेद नहीं होता है। विवाह-विच्छेद की यह रीति अब अधिक प्रचलित नहीं है।


3. जिहर (Zihar or Illegal Comparison) :- जिहर का तात्पर्य है- गैर कानूनी तुलना के द्वारा विवाह-विच्छेद। यदि पति अपनी पत्नी की तुलना किसी ऐसी स्त्री संबंधी से करता है, जिसके साथ विवाह संबंध वर्जित है. तो पत्नी ऐसी तुलना के लिए पति को प्रायश्चित करने को कहती है। पति यदि प्रायश्चित नहीं करता, तो ऐसी दशा में पत्नी अदालत में विवाह-विच्छेद की माँग कर सकती है। अदालत ऐसी दशा में विवाह-विच्छेद की आज्ञा दे देती है।


4. खुला (Khulla or Redemption): खुला विवाह-विच्छेद का वह प्रकार है, जिसमें पत्नी पति से विवाह-विच्छेद के लिए प्रार्थना करती है और पति के वैवाहिक अधिकारों की समाप्ति के बदले में प्रतिफल के रुप में प्राप्त मेहर को वापस लौटाकर क्षतिपूर्ण का वादा करती है। यदि पति इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है तो विवाह-विच्छेद मान लिया जाता है।


5. मुबारत (Mubarrat or Mutual Separation ) : यही विवाह-विच्छेद पति-पत्नी की पारस्परिक सहमति (Mutual Consent) के आधार पर होता है।

इसमें दोनों ओर से तलाकी इच्छा प्रकट की जाती है। 'खुला' में पत्नी पति को कुछ धन देती है, परंतु यहाँ उसे कुछ भी देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। ऐसे विवाह-विच्छेद के लिए पत्नी को 'इद्दत' करना होता है और पति को इस अवधि में उसे अपने घर ही रखना पड़ता है।


6. लियान (Lian or False charge of Adultery) :- इसमें पति पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाता है। पत्नी इस आरोप का खण्डन करती है। और अदालत से प्रार्थना करती है कि या तो पति इस आरोप को वापस ले या खुदा को हाजिर नाजिर समझकर घोषणा करे कि यह आरोप सत्य है यदि पति का आरोप झूठा सिद्ध होता है तो पत्नी को विवाह-विच्छेद का अधिकार मिल जाता है। और वह अदालत की सहायता से विवाह-विच्छेद कर सकती है। यदि पति अपना आरोप वापस ले लेता है तो मुकदमा नहीं चलता है। 


7. तलाके तफबीज (Talak Thafabeej) :- विवाह-विच्छेद के इस प्रकार में पत्नी द्वारा तलाक की माँग की जाती है। यह माँग विवाह के समय पति द्वारा पत्नी को दिए गए अधिकार के आधार पर की जाती है।